आपा नहीं तो कुण, आज नहीं तो कद

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महावीर पारिक,लाडनू
आपने कभी सुना है कि किसी शिक्षा या चिकित्सा अधिकारी ने किसी पटवार घर का निरीक्षण किया है ? नहीं न.
तो कोई कलेक्टर, तहसीलदार या उपखंड अधिकारी किसी स्कूल का निरीक्षण किस अधिकार या योग्यता के आधार पर करता है ?कोई योग्यता नहीं, कोई आधार नहीं, यूं ही नव सामंतवाद के आधार पर !
मेरा यह स्पष्ट मानना है कि राजस्व विभाग के अधिकारियों को अन्य विभागों का निरीक्षण नहीं करना चाहिए। वे अपने स्वयं के विभाग का ध्यान रखें। दूसरे विभागों के निरीक्षण से तो यही लगता है कि केवल राजस्व अधिकारी ही योग्य है और अन्य अयोग्य हैं।
यही लगता है कि सिर्फ राजस्व अधिकारी विश्वास के लायक हैं, भरोसेमंद हैं, अन्य नहीं हैं। और क्या कारण हो सकता है ? और अगर ऐसा क्रोस चेक करने के लिए ही करना है तो फिर सभी अधिकारी दूसरों के विभाग चेक करें, तब तो कोई शिकायत नहीं। फिर जिला शिक्षा अधिकारी या स्वस्थ्य अधिकारी या कोई अधीक्षण अभियंता किसी तहसील का निरीक्षण कर लेंगे !
कैसे शुरू यह कुप्रथा
दरअसल राजाओं जब राजाओं और अंग्रेजों के जमाने में राज का रूतबा रखने और तब के महत्वपूर्ण राजस्व-भू राजस्व को इकट्ठा करने के लिए कलक्टर को बड़ा महत्वपूर्ण अधिकारी बनाकर रखा हुआ था। उनके जाने के भारत में लोकतंत्र के नाम पर ढोंग होने लगा तो नए नेताओं ने अपने आपको राजा-महाराजा मान लिया और ये साहब लोग नव सामंत बन गए ! लोकतंत्र में अप्रशिक्षित जनता, जागरूकता के अभाव में फिर इन्हीं लोक सेवकों को मालिक मान बैठी। समस्या यहीं है, राजस्व अधिकारियों की गलती नहीं है- गलती जनता की है जो इस नई व्यवस्था को अपने हिसाब से चला नहीं पा रही है और वोट देने को महान काम मानकर पांच साल के लिए चुप बैठ जाती है और लुटती हैं।
तो फिर ये किसे अधिकार से स्कूलों या अस्पतालों का निरीक्षण करते हैं ? वास्तव में इनको विभिन्न विभागों के बीच समन्वय यानि कारडिनेटर का काम दिया हुआ हैं। ये लोग चतुराई से इस समन्वय को प्रभुत्व में बदल देते हैं और अन्य विभागों को  subordination में ले आते हैं ! राजनेता भी इनको अपने राज के औजार मानकर यह करने देते हैं।
बड़ा भाई-छोटा भाई! राज के लिए
इस दखल के नशे में राजस्व अधिकारीयों का खुद का मूल काम बुरी तरह से पिट रहा हैं। राजस्व के मुकदमों का अम्बार लगा हुआ हैं। राजस्थान में तीन लाख से ज्यादा मुक़दमे पेंडिंग पड़े हैं, लोग जमीन के विवादों में मर रहे हैं और साहब को स्कूलों की ज्यादा चिंता है !
और यही कारण है कि समाज के प्रतिभाशाली युवा IAS-RAS बनने के लिए मरे जा रहे हैं। वहाँ क्या मिलेगा ? झूठा रौब ! सामंती अंदाज ! वरना कोई प्रतिभावान युवा शिक्षक-व्याख्याता-चिकित्सक-अभियंता बनने से ज्यादा इस बाबूगिरी में रुचि क्यों लेता है ?जागरूकता के आभाव में अच्छे भले पढ़े लिखे लोग भी मुझे कहते हैं- अरे ! ऐसे कैसे कह सकते हो, कलेक्टर या एस डी एम तो मालिक हैं ! मैं आज उनकी बुद्धि पर तरस खाने के सिवा क्या कर सकता हूँ ? उनसे क्या बहस करूँ जो लोकतंत्र का क ख….. भी नहीं जानते ?
अभिनव राजस्थान में किसी भी स्तर पर एक विभाग दूसरे विभाग के काम में दखल नहीं देगा। सभी विभागों के उच्च अधिकारी ही निरीक्षण करेंगे, सबको भरोसे लायक माना जायेगा। अभी हमने इस सम्बन्ध में एक जनहित याचिका तैयार की है, जिसे हम जल्द ही उच्च न्यायलय में दाखिल कर रहे हैं। राजस्थान के हित में ईश्वर और न्यायविदों की मदद हो गई तो राजस्थान राज के रास्ते से हटकर सेवा के रास्ते पर चल पड़ेगा।

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