सशक्त बने महिलाए

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नीरा जैन
लेखिका और एंकर , जयपुर

महिला नीति है लेकिन क्या उसका क्रियान्वयन गंभीरता से हो रहा है। यह देखा जाना चाहिए कि क्या उन्हें उनके अधिकार प्राप्त हो रहे हैं।

आज के समय में जब हम महिला या नारी की बात करते हैं तो सत्य हैं कि आज समाज और देश में महिलाओं की स्थिति में पहले से बहुत परिवर्तन और सुधार आया हैं। लेकिन महिलाओं का वास्तविक सशक्तीकरण तो तभी होगा जब महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी। और उनमें कुछ करने का आत्मविश्वास जागेगा।
यह महत्वपूर्ण है कि महिला दिवस का आयोजन सिर्फ रस्म अदायगी भर नहीं रह जाए। वैसे यह शुभ संकेत है कि महिलाओं में अधिकारों के प्रति समझ विकसित हुई है। अपनी शक्ति को स्वयं समझकर, जागृति आने से ही महिला घरेलू अत्याचारों से निजात पा सकती है।
मनु स्मृति में स्पष्ट उल्लेख है कि जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है वहाँ देवता रमण करते हैं, वैसे तो नारी को विश्वभर में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है किंतु भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में देखें तो स्त्री का विशेष स्थान सदियों से रहा है। एक तरफ एकदम से दबी, कुचली, अशिक्षित और पिछड़ी महिलाएँ हैं तो दूसरी तरफ प्रगति पथ पर अग्रसर महिलाएँ। कई मामलों में तो पुरुषों से भी आगे नई ऊँचाइयाँ छूती महिलाएँ हैं।जहाँ एक तरफ महिलाओं के शोषण, कुपोषण और कष्टप्रद जीवन के लिए पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराया जाता है, वहीं यह भी कटु सत्य है कि महिलाएँ भी महिलाओं के पिछडऩे के लिए जिम्मेदार हैं। यह भी सच है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों ने ही स्त्री शक्ति को अधिक सहज होकर स्वीकार किया है, न सिर्फ स्वीकार किया अपितु उचित सम्मान भी दिया, उसे देवी माना और देवी तुल्य मान रहा है, जिसकी वह वास्तविक हकदार भी है।
अत्याचार करने वाले किसी भी पुरुष के कारण संपूर्ण पुरुष जमात को दोष देने की होड़ से भी बचना हितकर रहेगा क्योंकि अत्याचार, व्यभिचार, दुराचार करने वाला सिर्फ अत्याचारी है, अपराधी है और उसे उसकी सजा मिलना चाहिए। महिलाओं को समान अधिकार।समान अवसर और ससम्मान स्वतंत्रता का पूर्ण अधिकार है। इसमें किसी संदेह की गुंजाइश भी नहीं है।
प्रत्येक नारी का जीवन मानव जीवन के लिए प्रेरणा का स्रोत है। एक पढ़ी-लिखी सुसंस्कृत माँ सौ स्कूलों के बराबर होती है। अत: नारी अपनी शक्ति को पहचाने और आजाद, भयमुक्त और नरम बने ताकि पुरुष प्रधान समाज में नारी की पहचान उसके अंदर की शक्ति से हो और स्वच्छ-सुंदर समाज का निर्माण हो।
महिला के लिए राहें आसान नहीं होतीं किंतु महिलाएँ संकल्प कर लें तो स्वयं के लिए समाज में उपयुक्त स्थान बनाकर अन्य महिलाओं के लिए भी मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। महिलाओं में कार्य के प्रति ईमानदारी, समर्पण एवं अनुशासन भी अधिक रहता है और जिस घर में महिलाओं का सम्मान नहीं होता वहाँ शांति भी नहीं रहती है। अपना लक्ष्य पाने के लिए संघर्षरत महिलाओं ने काफी कुछ पा लिया है और काफी कुछ पाना बाकी है किंतु ऐसे में अपने पारंपरिक विवाह और परिवार जैसी परंपरा को स्वतंत्रता के नाम पर नकारने लगे तो सामाजिक ताना-बाना बिखर सकता है। अपनी सादगी, संस्कृति और परंपराओं को अक्षुण्ण रखने के कर्तव्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
महिला शक्ति, सुंदरता और विनम्रता का ऐसा सामंजस्य है जो निश्चित ही बेहद आकर्षक है, अद्भुत है और उसका भविष्य सुनहरा है जब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिलाओं में जागरूकता को बढ़ाया जाए।