खनखना उठी चूडियाँ

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सुन उनके कदमौ की आहट , खुले स्वत: ही द्वार सभी ।
तन अकडा मन सिकुडा , चटक उठे श्रंगार सभी ।
खनक उठीं पायजेब बालियाँ , खडे हो गये रोम सभी ।
कदम मचल कर लगे तोडने , लोक लाज बन्धन सभी ।
लेने लगा हिलोरै मन भी , खिलने लगी कली कली ।
मावस की रात लगी तब , पूर्णिमा सी खिली खिली ।
तन के बढते ताप को , चाँद चिढा़ता घडी घडी ।
शिल्पी देखे सूने नभ को , रातै जाती चढ़ी चढ़ी ।
पलकै थोडी झपकी ही थी , आभास हुआ स्पर्श तभी ।
खनखना उठी थी जो चूडियाँ , दिखी बाद में तुडी मुडी ।
टूटा तन मुस्करा रहा था , भोर खडी हो गयी तभी ।
‘शिल्पी’ डूब प्रेम भँवर में , देखे उनको घडी घडी ।
✍©शैलेन्द्र अवस्थी ‘शिल्पी’

शैलेन्द्र अवस्थी, जयपुर
शैलेन्द्र अवस्थी, जयपुर