” महिला दिवस “

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लोक लाज देखा देखी में ,
हम कितने दिवस मनाते हैं ।
मातृ दिवस , पितृ दिवस ,
कभी हिन्दी दिवस मनाते हैं ।
सच कहना मित्रो क्या उनको ,
हम सही मान दे पाते हैं ?
जो आज यहाँ महिलाओं पर ,
सद्भाव लुटाते दिखते हैं ।
घर में घुसते ही उनके ,
सद्भाव भंग हो जाते है ।
पौरुष आडे आ जाता है ,
रूडियाँ जकड लेती हैं मन ।
फिर कथा शुरु होती है वहीं से ,
सिसके जिसमें हर नारी का मन
यदा-कदा सम-अधिकारौ की ,
जब बात उठाई जाती है ।
आक्रोशित भावौ से जब ,
व्यथा बताई जाती है ।
हैं कितने वो शूरवीर ,
जो खडे साथ मिल पाते हैं ?
धिक्कारे मन लाख मगर ,
वह साथ नहीं दे पाते हैं ।
‘शिल्पी’ कहता बदलो ये सब ,
तब ही कुछ हो पायेगा ।
वर्ना तो ये दिवस मनाना ,
आडम्बर ही रह जायेगा ।
✍©शैलेन्द्र अवस्थी ‘शिल्पी’

शैलेन्द्र अवस्थी(कवि व राजनीतिज्ञ)जयपुर
शैलेन्द्र अवस्थी                              (कवि व राजनीतिज्ञ )                  जयपुर