श्री कृष्ण के वरदान से बर्बरीक पूजे जाते है शीशदानी श्याम नाम से

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जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर-21

गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठकों के लिए इतिहास के झरोखे नाम से एक विशेष कॉलम बनाया है जिसमे पाठको को देश की ऐतिहासिक धरोहर जैसे:-250 साल से अधिक पुराने ऐतिहासिक दुर्ग,विभिन्न धर्मों के धार्मिक स्थल इत्यादि की जानकारिया दी जाती है।आज के इस विशेष कॉलम में हम आपको बताने जा रहे है  शेखावटी जनपद और सीकर जिले में स्थित खाटूधाम के बारे में , लेखक एवं पत्रकार डॉ.प्रभात कुमार सिंघल की स्पेशल रिपोर्ट…….

शेखावटी जनपद और सीकर जिले में स्थित खाटूधाम के प्रति लाखों करोड़ो लोगो के मन में श्रृद्धा, आस्था एवं विश्वास की भावना प्रबल है।इतिहास के पन्नों में जाएं तो खाटू के पुराने जागीदार केसरी सिंह के वंशज बताये जाते है। कहते है कि यहां के ठाकुर बाघसिंह को पुरस्कार में दस गांव प्राप्त हुए थे जिनमें से एक खाटू भी था। यहां का वर्तमान मंदिर वि.सं. 1777 में बना था। यह तथ्य मंदिर में लगे एक शिलालेख से ज्ञात होता है। लेखक एवं पत्रकार  डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

इस धाम में श्री श्याम बाबा के दर्शन कर श्रद्धालु आत्मविभोर हो जाते हैं। वे जिस असीम आस्था और उमंग के साथ खाटू धाम आते हैं उसी उत्साह के साथ वापस प्रस्थान करते है। खाटू के श्याम बाबा, यह सुविख्यात नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है क्योंकि देश का ऐसा कोई हिस्सा नही है जहां बाबा की कीर्ति पताका नहीं फहराती हो। प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार महाभारत काल में पाण्डु पुत्र भीम पर अज्ञातवास के दौरान हिडिम्बा नामक एक राक्षसी आशक्त हुई जिसको घटोत्कच नाम का पुत्र हुआ। इसी घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था जो कुशाग्र बुद्धि और बाहुबल का धनी था। इस बालक ने कठोर तप के बल पर अमोद्य शक्ति प्राप्त कर ली थी।

श्री कृष्ण के श्याम नाम को धन्य करने वाले खाटूधाम जाने के लिए आगरा-बीकानेर राष्ट्रीय उच्च मार्ग संख्या 11 से सम्पर्क सड़के बनी हुई हैं। इनमें से एक सम्पर्क सड़क रींगस से तथा दूसरी पलसाना के निकट मंढा मोड से खाटू जाती है। रींगस से खाटू की दूरी लगभग 15 किमी तथा मंढा मोड से करीब 12 किमी हैं। इसके अलावा जयपुर से लगभग 80 किमी तथा सीकर से करीब 45 किमी की दूरी पर खाटूश्याम स्थित है जो प्रशासनिक दृष्टि से जिले की दांतारामगढ़ पंचायत समिति का एक ग्राम पंचायत मुख्यालय हैं। कहने का यह ग्राम है किन्तु श्रद्धालुओं की आस्था ने इस गांव को एक भव्य लघु नगर का स्वरूप दे दिया है। धर्मशालाऐं, विश्राम गृह, अच्छा-खासा बाजार व तमाम जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता ने खाटूधाम को एक मिनी सिटी जैसा बना दिया है।

यूं तो खाटूश्यामजी में श्रद्धालुओं का आवागमन प्रायः रोज ही बना रहता है किन्तु हर माह शुक्ल पक्ष की एकादाशी को यहां आगन्तुकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती हैं। वर्ष में दो बार इस आस्था स्थल पर मेला भरता है। एक कार्तिक मास में और दूसरा फाल्गुन में। इनमें फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी व द्वादशी को भरने वाला मेला विराट होता है जिसमें हर वर्ष लगभग 15-20 लाख श्रद्धालु आते हैं। खाटू एक प्राचीन स्थान है। हर्ष के शिलालेख, जो विक्रमी संवत् 1030 का बताया जाता है, में इस स्थान का उल्लेख खट्टकूप के नाम से किया गया है।

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एक बार वीर बालक ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की और वह रणभूमि की ओर चल पड़ा। श्री कृष्ण ने कदाचित इस बालक की वीरता और अदम्य शक्ति से युद्ध को अप्रभावित रखने का उदेश्य से उसे रास्ते में ही रोक लिया और एक ब्राह्मण के रूप में इस अपराजेय बालक को अपने मोह पाश में लेकर उसे शीश का दान मांग लिया। वीर बर्बरीक ने शीश तो दान कर दिया लेकिन महाभारत युद्ध देखने की अपनी तीव्र इच्छा प्रकट कर दी। श्री कृष्ण ने बालक की इच्छा पूरी करते हुए उसके शीश को एक पहाडी शिखर पर स्थापित कर दिया जहां से महाभारत युद्ध के सम्पूर्णा दृश्य उस शीशदानी बालक ने देखे। अन्ततः श्री कृष्ण ने शीश को वरदान दिया कि कलयुग में मेरे श्याम नाम से तुम्हारे यश व कीर्ति की पताका फहरेगी और तुम कोटि-कोटि जन आराध्य बनोगे।

शीशदानी की दन्तकथा

 कहते है, श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के पश्चात वीर बर्बरीक के शीश को नदी के प्रवाह में बहा दिया और कालान्तर में यही शीश खाटू में एक खुदाई के दौरान प्रकट हुआ। चारागाह में जाने वाली गायों में एक गया रोज शाम को गोधुलि के समय रास्ते में रूक जाति जहां उसके उसकी दूध की धारा स्वतः जमीन के अन्दर जाती देखी गई। गाय के मालिक ने उस स्थान की खुदाई की तो उससे यह शीश प्रकट हुआ। कुछ दिन इस शीश की पूजा उस गाय के मालिक द्वारा अपने घर पर की गई तत्पश्चात खाटू के तत्कालीन शासकों को सपने में मंदिर बनाकर इस शीश को विग्रह स्वरूप् में स्थापित करने का दृष्टान्त हुआ। इस प्रकार खाटू में श्याम बाबा विराजित हुए। इस लघु नगरी में खुदाई वाले स्थान पर आज श्याम कुण्ड स्थित है जहां कहते है, पवित्र स्नान के बाद श्रद्धालुओं के सभी कष्टों का निवारण होता है।

आज देश भर में लाखों -करोड़ो श्याम भक्त है। श्याम बाबा की महिमा का वर्णन करने वाले सैकड़ो गीत व लघु फिल्में सुनी व देखी जा सकती है। इनके ऑडियो-वीडियो कैसेट, सीडी आदि भी उपलब्धी है। मेले के समय श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है। वे श्याम भक्ति में आकंठ डूबे रहते हैं। कई श्रृद्धालुओं पेट के बल पर तो कई लम्बी पद यात्रा करके खाटू धाम पहुंचते हैं। जिला प्रशासन, मेला व मन्दिर कमेटी और ग्राम समन्वित रूप से इन श्रद्धालुओं की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखती हैं और सभी के मिले जुले प्रयासों से या यूं कहें श्याम बाबा की असीम कृपा से हर वर्ष फाल्गुन माह में यह लक्खी मेला सम्पन्न होता है।