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विश्व प्रसिद्ध सोनीजी की नसियां-चैत्यालय

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पर्यटन स्थल  जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर-22

गीतांजलि पोस्ट ….(डॉ.प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार, कोटा) अजमेर में आगरा गेट व दौलत बाग के बीच विख्यात सोनीजी की नसियां स्थित है। देखने पर यह लाल प्रस्तर कमल जैसी नजर आती है। करौली के लाल पत्थर से निर्मित यह विशाल मंदिर अपने शिल्प सौन्दर्य एवं कलात्मक चित्रकारी-पच्चीकारी के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण अजमेर के जाने माने सोनी परिवार ने कराया है। सोनीजी की नसियां को मूलतः सिद्धकूट चैत्यालय कहते हैं। इस चैत्यालय के दो भाग हैं। मंदिर और नसियां । सिद्धकूट चैत्यालय का निर्माण राय बहादुर सेठ स्व. मूलचन्द सोनी ने कराया था। दस अक्टूबर 1864 से मई 1865 तक की अवधि में मंदिर बनकर तैयार हो गया। 26 मई 1865 को मंदिर में मूलनायक आदिनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित की गई। मंदिर का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है। किसी किले के तोरण द्वार जैसा विशाल ऊंचा कलात्मक यह द्वार करौली के लाल पत्थर से निर्मित है। मंदिर और इस द्वार के बीच में 84 फीट ऊंचा मान स्तंभ है। संगमरमर में निर्मित इसका निर्माण सेठ स्व. भागचन्द सोनी ने कराया। जून 1953 में मान स्तंभ की स्थापना हुई, इस स्तंभ के चारों तरफ ऐरावत हाथी हैं। मंदिर की मूल वेदी में आदिनाथ भगवान की छोटी बड़ी चार प्रतिमाएं हैं। इस वेदी का अब जीर्णोद्वार हो चुका है। मान स्तंभ के ऊपर भगवान आदिनाथ, चन्द्रप्रभु, शांतिनाथ एवं महावीर स्वामी की प्रतिमाएं हैं।

मान स्तंभ के सामने मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार है। द्वार के ऊपर कलात्मक मेहराब, बालकनी, कलश व झरोखे हैं। तलघर मंे बांई तरफ सरस्वती भवन और दांहिनी तरफ प्रतिमाओं का संग्रह है। संगमरमर की सीढ़ियां चढ़ते ही सिद्धकूट चैत्यालय का विशाल प्रांगण आ जाता है। यहां संगमरमर के अनेक कलात्मक स्तंभ हैं। प्रांगण की दीवारें चित्रकारी और कांच के काम से अलंकृत हैं। मंदिर के तीनों प्रवेश द्वार भी कांच जड़ित कलात्मक कार्य से सुसज्जित हैं। सामने दीवार पर भक्ताम्बर के पाठ अंकित हैं। चारों तरफ कांच में सुरक्षित अनेक रंगीन तस्वीरे हैं जो जैन धर्म से ही सम्बद्ध हैं। चार बड़े दर्पण लगे हुए हैं। प्रत्येक दर्पण में मूल चंवरी का प्रतिबिम्ब नजर आता हैं। चारांे तरफ चौबीस तीर्थकारांे की नयानाभिराम सुनहरी पेंटिंग बनी हैं। छत पर भी सुनहरी चित्रकारी हुई है। चंवरी के दोनों तरफ चार-चार प्रतिहार हैं। मंदिर में कुल तीन वेदियां हैं। मूल वेदी में प्रतिमा मूलनायक, भगवान आदिनाथ की हैं। इस चंवरी में एक पाषाण चौबीसी, पीछे की तरफ पांच अन्य चार प्रतिमाएं काले पाषाण की व सप्त धातु की तीन प्रतिमाएं हैं। वे कलात्मक स्वर्णिम चित्रकारी मंे सुसज्जित हैं। बांयी तरफ वाली वेदी में श्वेत-श्याम संगमरमर की 13 प्रतिमाएं हैं, जिनमें कुछ खड़गासन मुद्रा में हैं। दांहिनी वेदी में तीन खड़गासन प्रतिमाएं हैं। मंदिर में 12 भावों का कलात्मक चित्राकंन है। बाहर चारों तरफ पंचकल्याणक के चित्र हैं। मंदिर की पिछली दीवार पर एक तरफ देवाराम स्त्रोत लिपीबद्ध है और अष्ट प्रतिहार के चित्र कांच में जडे़ हुए हैं। पास में ही भारत का बड़ा सा रंगीन नक्शा है जिसमें प्रमुख जैन तीर्थ अंकित हैं। इसके बाद सम्मेद शिखर का विशाल नयानाभिराम चित्र है। एक अन्य तरफ भगवान आदिनाथ के दस भाव चित्रित हैं। यह तेरापंथी आमनाथ का मंदिर है।

मंदिर के तलघर में सरस्वती भवन है। इसका उद्धघाटन 6 दिसम्बर 1974 के दिन विद्यासागर महाराज ने किया था। यहंा अनेक हस्तलिखित ग्रंथ हैं। ताड़ पत्रों पर लिखित ग्रंथ भी हैं। रजत-स्वर्ण की स्याही से लिखे हुए ग्रंथ भी हैं। अनेक ग्रंथ मासिक वेतन पर लिखवायेें हुए हैं। सौ वर्ष पुराने गं्रथों की स्याही और कागज आज भी अच्छी हालत में हैं।
सरस्वती भवन के उद्धाटन अवसर पर, सेठ स्व. मूलचंद सोनी के समय दक्षिण भारत से प्रतिलिपी कराये गये तीर्थ ग्रंथ धवल, जयधवल और महाधवल सेठ साहब की हवेली से जुलूस के साथ यहां लाये गये। इस शास्त्र भण्डार में करीब 900 हस्तलिखित एवं 3000 मुद्रित ग्रंथ हैं।

नसियां
जैन धर्म से जुड़ी हुई सोनी जी की नसियां अजमेर का कलात्मक गौरव है। स्थापत्य की दृष्टि से यह बेजोड़ है और विश्व विख्यात है। करौली के लाल पत्थरों से निर्मित यह 89 फीट लम्बा और 64 फीट चौड़ा और 92 फीट ऊंचा दो मंजिला भवन है। इसके चारों और कलात्मक छतरियां, स्वर्ण कलश और भव्य गुम्बद हैं।

नसियां में अयोध्या नगरी और भगवान ऋषभदेव के कल्याणक और कलात्मक अनुकृतियां हैं। जैनियों के अनुसार ऐसी अनूठी रचना भारत में अन्यत्र नहीं है। उस भवन के ऊपर वाली मंजिल में सुमेरू पर्वत, तेरह समुद्रों की रचना, अयोध्या नगरी व पंच कल्याणकों की अनुकृतियां हैं। छत से लटके हुए देवताओं के विमान ऐसे लगते है मानो वे आकाश मार्ग में विचरण कर रहे हैं। इसके चारों तरफ मंदिर दर्शाये गये हैं, समुद्र नीले रंग में दिखाये गये हैं। तीसरे द्वार से स्वर्णमय अयोध्या नगरी की रचना दिखाई देती है। यहां भगवान के तीन कल्याणकों का भी दिग्दर्शन है। अयोध्या नगरी के माउल्स पर सोने की पॉलिश की हुई है। भगवान ऋषभदेव का महल, उनके माता-पिता का महल, भगवान की माता के सोलह स्वप्न आदि की अनुकृतियां स्थापत्य, कटाई, जड़ाई एवं पच्चीकारिता की दृष्टि से बेजोड़ हैं।

ये सारे दृष्यांकन सुनहरे हैं और सोने की नगरी का आभास देते हैं। भगवान की माता के सोलह स्वप्न एक ही भव्य प्लेट पर अंकित हैं। नसियां के मध्य भाग में ऋषभदेव जी की राजसभा का अंकन है। नीचे के हॉल में हस्तिनापुर की रचना का दृश्याकंन है जहां तपस्या के बाद भगवान ने प्रथम आहार किया था। इसी हॉल में कैलाश पर्वत पर 72 जिनालय भी दिखाये गये हैं। इसके बाद 225 स्वर्ण कमल हैं जिनकी रचना इन्द्र ने तीर्थकर भगवान के लिए की थी। इसके पास ही समवशरण रचना है। जहां स्वर्णमयी कुटी में भगवान विराजमान है तथा देव, मानव आदि उनके उपदेश सुन रहे हैं।

इस भवन के नीचे वाली मंजिल में शोभायात्रा की सवारियां रखी हुई हैं। दो श्वेत अश्वों का स्वर्णिम रथ, दो बैलों का रथ, गजरथ, ऐरावत हाथी व अन्य सपाटियों की रचनाएं जिस कक्ष में रखी हुई हैं उसके चारों तरफ दस गुणा छः फीट के कलइदार कांच के दरवाजे लगे हुए हैं।
इस दिव्य, अप्रतिम और अद्वितीय नसियां के निर्माण में पच्चीस वर्ष लगे थे। सन् 1870 से 1895 तक जयपुर में इसका निर्माण कार्य चला। वहीं अलबर्ट हॉल में दस दिन तक इस भव्य रचना का प्रदर्शन किया गया था। इसके बाद 1895-96 मंे इसे यहां सिद्धकूट चैत्यालय के पीछे नसियां भवन में स्थापित किया गया। इस भव्य रचना का निर्माण स्वर्गीय सेठ मूलचंद सोनी कराया था। उनके बाद सेठ नेमीचंद सोनी ने चारों तरफ बारहदरी का निर्माण करवाया। उनके पुत्र टीकमचंद सोनी ने भीतर कक्षों का स्वर्णमय कराया। यह नसियां हर दृष्टि से अद्वितीय है।

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  • 23 Comments to विश्व प्रसिद्ध सोनीजी की नसियां-चैत्यालय

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