शिल्प सौन्दर्य में बेजोड़ देलवाड़ा के मन्दिर

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GEETANJALI POST ……. जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर-24
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार, कोटा
मन्दिर की छतों पर झूमते, लटकते कमल आकृति के गुम्बज, गुम्बज का पेंडेंट नीचे की ओर आते हुए संकरा होता हुआ एक बिन्दु बनाता है जो कमल की तरह प्रतीत होता है, जगह-जगह पर अम्बिका, पद्मावती, शीतला, गढ़ी सरस्वती, नृत्य करती नायिकाऐं, हाथी-घोड़े, हंस, वाद्य बजाते वादक, स्तम्भों एवं तोरण द्वारों पर बनी कलात्मक कृतियां छत पर बनी 16 विद्या की अलंकृत देवी मूर्तियां तथा चमकदार और संगमरमर की कोमलता से की गई शिल्पकारी की पारदर्शी उत्कृष्टता देलवाड़ा के जैन मन्दिरों में देखते ही बनती है। यहां की नैनाभिराम शिल्प एवं मूर्तिकला किसी भी प्रकार रणकपुर के जैन मन्दिरों से कम नहीं है, साथ ही ये मन्दिर किसी अजूबे से भी कम नहीं है। मन्दिरों के कला वैविद्य के दर्शन हमें छत, द्वार, तोरण एवं सभा मण्डप में होते हैं जिनका अद्भुत शिल्प एक दूसरे से भिन्न है। दर्शक इनकी बेजोड़ कारीगरी देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है और मन्दिरों की जादुई कला के सम्मोहन में खो जाता है। इन मन्दिरों में हमें जैन संस्कृति का वैभव एवं भारतीय संस्कृति के दर्शन होते हैं।

 विश्व में विख्यात देलवाड़ा के कलात्मक जैन मन्दिर

दिल्ली-अहमदाबाद बड़ी रेलवे लाईन पर आबू रेलवे स्टेशन से करीब 28 किलोमीटर दूर राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित हैं। संगमरमर से 11वीं और 13वीं सदी के बीच बने नक्काशीदार जैन मन्दिरों के समूह में पांच मन्दिर बनाये गये हैं। इनमें दो मन्दिर विशाल एवं भव्य हैं तथा तीन मन्दिर उनके अनुपूरक मन्दिर हैं।
कलात्मक जैन मन्दिरों के समूह में सबसे बड़ा मन्दिर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित विमल वसाही है। इस मन्दिर का निर्माण गुजरात के चालुक्त राजा भीमदेव के मंत्री और सेनापति विमल शाह ने 1031 ई. मंे पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने पर करवाया था। बताया जाता है कि मन्दिर का निर्माण 14 वर्षाें में पूर्ण हुआ और 13 हजार शिल्पियों ने निर्माण को अंजाम दिया। यह मन्दिर करीब 98 फीट लम्बा एवं 42 फीट चौड़ाई में है। जैनियों के 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ की करूणा बिखेरती श्याम वर्णीय प्रतिमा की प्रतिष्ठा चैत्र कृष्ण तृतीया संवत् 1287 को आचार्य श्री विजयसेन सूरी के करकमलों से हुई। बताया जाता है कि इस मन्दिर के निर्माण पर उस समय करीब 19 करोड़ रूपये खर्च किये गये। मन्दिर के स्तम्भ, दीवार, तोरण, छत एवं गुम्बज की बारीक नक्काशी और मूर्ति शिल्प आश्चर्यचकित करता है। विशाल गोल गुम्बज में 11 गोलाकार पंक्तियों में उकेरी गई मूर्तियां दर्शनीय हैं। प्रत्येक स्तम्भ पर ऊपर की ओर कई प्रकार के वाहन पर आरूढ़ 16 विद्या देवियों की प्रतिमाएं नजर आती हैं। मन्दिर में देवरानी और जेठानी के गोखड़े अत्यन्त कलात्मक रूप से बनाये गये है जिनमें भगवान आदिनाथ और शान्तिनाथ की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मन्दिर में 57 देवरियां स्थापित हैं जिनमें तीर्थंकरों एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

dilwaraयहां का मन्दिर लून वसाही भी कला के उत्कृष्ट नमूना है। इस मन्दिर का निर्माण सोलंकी शासक तेजपाल और वास्तुपाल ने करवाया था। बाहर से सादे दिखने वाले इन मन्दिर की भीतरी कारीगरी शिल्पकला का कमाल है। संगमरमर पत्थर से इतनी बारीक कारीगरी की गई है कि संगमरमर पूरा पारदर्शी नजर आता है। पच्चीकारी इतनी जीवंत और सजीव है कि दर्शक को एक टक अपलक निहारने को मजबूर कर देती है। यह मन्दिर भी विमल वसाही मन्दिर के सदृश्य है। मन्दिर का नाम तेजबाल के भाई लून के नाम पर रखा गया जिसकी बचपन में मृत्यु हो गई थी। मन्दिर का निर्माण करीब 1500 वर्गमीटर में किया गया है। मन्दिर के रूप मण्डप का गुम्बद विमल वसाही के गुम्बद से अधिक बड़ा और आकर्षक है। गुम्बद के किनारे वृत्ताकार पट्टियों में 72 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बैठी हुई मुद्रा में हैं। मन्दिर के गलियारों में तीर्थंकर नेमीनाथ के जीवन की प्रमुख घटनाओं को पाषाण में खूबसूरती से तराशा गया है।
इन दो प्रमुख भव्य एवं कलात्मक मन्दिरों के साथ पीतलहर मन्दिर, चतुर्भुज मन्दिर भी दर्शनीय हैं। पीतलहर मन्दिर में 40 क्विंटल पंचधातु से बनी ऋषभदेव की प्रतिमा होने से इस मन्दिर का नाम पीतलहर दिया गया। 15वीं शताब्दी में इस मन्दिर का निर्माण भीमशाह महाजन ने करवाया था। चतुर्भुज मन्दिर को खरतार वसही भी कहा जाता है, जो तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है और बलवा पत्थर से निर्मित है। तीन मंजिलें इस मन्दिर की चारों दिशाओं में बने मण्डपों के आगे पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित की गई है।
आबू पर्वत पर देलवाड़ा के ये खूबसूरत जैन मन्दिर जहां जैन धर्म की कला, आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं वहीं पूरे विश्व के कोने-कोने से आने वाले सैलानियों को अपनी कला के सम्मोहन में बंाध लेते हैं।