जैन कला एंव स्थापत्य के उच्चतम प्रतीकों का दर्शन करना हो तो चले आइये जैसलमेर

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GEETANJALI POST ……. जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर-26

-डॉ. प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार
भारत में जैन कला एंव स्थापत्य के उच्चतम प्रतीकों का दर्शन करना हो तो चले आइये जैसलमेर। राजस्थान की मरूधरा के जैसलमेर शहर में बने विश्व प्रसिद्ध सोनार किले में जैन एवं हिन्दु मंदिरों का एक ऐसा भव्य समूह है जो कारीगरी में अपनी सानी नहीं रखता। हाल ही में इन मंदिरांे के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आइये आप भी जानिए इन मंदिरों की कलात्मक पराकाष्ठा को।
राजस्थान के जैसलमेर स्थित सौनार किले में कलात्मक मंदिरों का एक भव्य समूह श्रद्धालुओं की आस्था का प्रबल केन्द्र है। इस मंदिर समूह में अधिकांश मंदिर जैन धर्म से सम्बंधित है जबकि एक लक्ष्मीनाथ मंदिर हिन्दु धर्म से सम्बंधित है। इस दुर्ग के मंदिरों की विशेषता इस प्रकार है।
मंदिर समूह में शामिल पार्श्वनाथ जैन मंदिर में वद्धिरत्नमाला के अनुसार 1257 मूर्तियां बनाई गई है। जिस शिल्पकार ने इनकी रचना की उसका नाम धत्रा हैै। मंदिर का मुख्य द्वार पीले पत्थर से निर्मित अलंकृत तोरण द्वार है। तोरण द्वार के खंभो में देवी-देवताओं, वादकों, वादिकाओं को नृत्य करते हुए, हाथी, सिंह, घोडे पक्षी उकेरे गये है जो सुन्दर बेलबूटों से सजे हैं। तोरण द्वार के उपरी शिखर के मध्य पार्श्वनाथ की ध्यानमुद्रा की प्रतिमा बनी है। दूसरे प्रवेश द्वार पर मुख मण्डप के नीचे तीन तोरण एवं इनमें कारीगरी पूर्ण छत विभिन्न प्रकार की कलात्मक आकृतियों से अलंकृत हैं। इनमें बनी तीर्थंकरो की मूर्तियां सजीव प्रतीत होती है।
यह मंदिर गुजरात मंदिर निर्माण शैली के अनुरूप निर्मित है, जिसमें सभा मण्डप, गर्भगृह, गूढ मण्डप, छः चौकी तथा 51 कुलिकाओं की व्यवस्था है। कुलिकाओं में बनी मूर्तियां अत्यन्त मनोहारी है। सभा मण्डप की गुम्बदनुमा छत को सुन्दर प्रतिमाओं से सजाया गया है। अग्र भाग के खंभे व उनके बीच के कलात्मक तोरण स्थापत्य कलां के सुन्दरतम प्रतीक है। इस मण्डप मंे 9 तोरण बनाये गये है।
मंदिर के सभा मण्डप में 8 सुन्दर कलात्मक तोरण बने है। स्तंभो के निचले भाग मंे हिन्दु देवी-देवताओं की आकृतियां बनी है। दूसरी और तीसरी मंजिल पर भगवान चन्द्र प्रभु चौमुख रूप में विराजित है। मंदिर में गणेश प्रतिमाओं को भी विभिन्न मुद्राओं में प्रदर्शित किया गया है। यहां तीसरे मंजिल पर एक कोठरी में धातु की बनी चौबीसी तथा पंच तीर्थी मूर्तियां संग्रहित की गई है।
मंदिर परिसर में शान्तिनाथ एवं कुन्थूनाथ जी के मंदिर जुडवां हैं। इस मंदिर की नक्काशी, मूतिकलां जैन धर्म की अमूल्य धरोहर मानी जाती है। दुमंजिले मंदिर में नीचे बना मंदिर कुन्थूनाथ को तथा ऊपर का मंदिर शान्तिनाथ को समर्पित है। मंदिर में लगे शिलालेख के मुताबित मंदिर का निर्माण 1480 ईस्वीं में जैसलमेर के चौपडा एवं शंखवाल परिवारों द्वारा किया गया था। मंदिर के कुछ हिस्सों में बदलाव व कुछ निर्माण कार्य 1516 ईस्वीं में कराये गये।
यह मंदिर शिखरयुक्त है तथा शिखर के भीतरी गुम्बदों में वाद्य यंत्र बजाती हुई व नृत्य करती हुई अप्सराओं को उंकेरा गया है। इनके नीचे गंधर्वों की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के सभा मण्डप के चारों ओर खंभो के मध्य सुन्दर तोरण बनाये गये है। गुढ़ मण्डप में एक सफेद आकार की तथा दूसरी काले संगमरमर की कायोत्सर्ग मुद्रा में मूर्तियां प्रतिष्ठित है, इनके दोनों पिछवाडें में 11-11 अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बनी है। इस कारण इसे चौबीसी की संज्ञा की गई है। हिन्दुओं की दो प्रतिमाएं दशवतार एवं लक्ष्मीनारायण भी मंदिर में विराजित है। मंदिर का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है जहां तक्षणकार ने अपनी हथोडी और छेणी से कल्पनाओं को पाषाण में साकार नहीं किया है। मानव प्रतिमाएं श्रंृगारित एवं अलंकृत हैं।
मंदिर समूह संभवनाथ जी से लगा हुआ मंदिर शीतलनाथ जी का है। मंदिर का रंग मण्डप तथा गर्भगृह सटे हुए है। मंदिर में नौ खण्डा पार्श्वनाथ जी एक ही प्रस्तर में चौबीस तीर्थंकर की प्रतिमाएं दर्शनीय है। चन्द्र प्रभु के मंदिर के समीप ऋषभ का कलात्मक शिखर युक्त मंदिर है। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां मुख्य सभी मण्डप के स्तंभो पर हिन्दु देवी-देवताओं का रूपांकन नजर आता है। कहीं राधा-कृष्ण और कहीं अकेले कृष्ण को बंशी वादन करते हुए दिखाया गया है। एक स्थान पर गणेश, शिव-पार्वती एवं सरस्वती की मूर्तियां बनी है। इन्द्र व विष्णु प्रतिमाएं भी उर्त्कीण है। मंदिर में पद्मावती, तीर्थंकर, गणेश, अम्बिका, यक्ष एवं शालभंजिका की प्रतिमाएं भी उर्त्कीण है। किले के चौगान में महावीर स्वामी का मंदिर का निर्माण 1493 के समय का बताया जाता है। यह अन्य मंदिरों की तुलना में एक साधारण मंदिर है।
जैन मंदिर समूह के मध्य पंचायतन शैली का लक्ष्मीनाथ मंदिर हिन्दुओं का महत्वपूर्ण मंदिर है। इसका निर्माण राव जैसल द्वारा दुर्ग निर्माण के समय ही किया गया था। मंदिर का सभा मण्डप किले की अन्य इमारतों के समान है। मुस्लिम आक्रांताओं के समय मंदिर का बड़ा भाग ध्वस्त हो गया था। आगे महारावल लक्ष्मण ने 15वी शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार कराया। सभा मण्डप के खंभों पर घट पल्लव आकृतियां बनी है। मंदिर के दो किनारे दरवाजों पर जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी बनी है। गणेश मंदिर की छत में सुन्दर विष्णु की सर्प पर विराजमान मूर्ति है। समूह में टिकमजी से त्रिविकर्मा भी कहते है तथा गौरी मंदिर भी बने हैै।

लौद्रवा जैसलमेर
राजस्थान के पश्चिमी जिलों में जैसलमेर जैन संस्कृति के उन्नयन का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। यहां के मंदिर न केवल अपनी बेजोड़ शिल्प कला के सुंदर उदाहरण हैं, वरन् जैन शास्त्रों तथा प्राचीन शैली के चित्रों का अकूत खजाना भी मंदिरों में सुरक्षित है। लौद्रवा का जैन मंदिर 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। गर्भगृह में सहसत्रफणी पार्श्वनाथ की साढ़े तीन फीट ऊंची श्याम वर्णीय कसौटी पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य श्री जिनपति सूरी द्वारा संवत् 1263 में कराई गई थी। इस मूर्ति के ऊपर हीरा जड़ा हुआ है जो मूर्ति के अनेक रूपों का दर्शन कराता है।
मंदिर का तोरण द्वार, प्रत्येक स्तम्भ, प्रवेश द्वार एवं शिखर पर शिल्पकारों की कल्पना अद्वितीय रूप में दिखाई देती है। शिल्प कला के दर्शन मात्र से ही आनन्द की अनुभूति होने लगती है। चीनी शैली में निर्मित मंदिर का शिखर, भगवान की प्राचीन प्रतिमा तथा प्रवेश द्वार का ऊपरी भाग देखकर ही देलवाड़ा, रणकपुर और खजुराहो मंदिरों की याद ताजा हो उठती है। मंदिर के चारों कोनों पर एक-एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर के दक्षिण-पूर्वी कोनें पर आदिनाथ, दक्षिण-पश्चिमी कोनें पर अजीतनाथ, उत्तर-पश्चिमी कोनें पर संभवनाथ एवं उत्तर-पूर्व में चिन्तामणी पार्श्वनाथ का मंदिर स्थापित है। मूल देवालय का शिखर आर्कषक है। इस मंदिर में एक प्राचीन कलात्मक रथ रखा गया है जिसमें चिन्तामणी पार्श्वनाथ स्वामी को गुजरात से लाया गया था।
जैसलमेर से 13 किमी दूर लोद्रवा या लौद्रपुर भाटी राजपूतों की राजधानी रहा। बताया जाता है कि प्राचीन समय में सगर नामक राजा हुआ, जिसके दो पुत्र श्रीधर और राजधर थे। उन्हीं के द्वारा लौद्रपुर में चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर बनवाया गया। यद्यपि यह मंदिर कई बार आक्रमणों से ध्वस्त हुआ, परंतु आज भी मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। मंदिर जैसलमेर के पीले पत्थर से निर्मित है। स्तम्भों पर फूल-पत्तियों की बारीक खुदाई, मंदिर के पास निर्मित समोशरण के ऊपर अष्टापद गिरी तथा मंदिर परिसर में कलात्मक तोरण द्वार एवं कल्पवृक्ष की कोरणी अत्यन्त मनोहारी है।