कैसे हुआ ज्वाला माता का अवतार

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गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठ को के लिए इतिहास के झरोखे से एक विशेष कॉलम बनाया हैं। जिसमें पाठकों को देश की ऐतिहासिक धरोहर जैसे:- 250 वर्ष पुराने ऐतिहासिक दुर्ग, विभिन्न धर्मों के धार्मिक स्थल इत्यादि पौराणिक चीजों के बारे में जानकारी दी जाती है। इसी कड़ी में हम आज राजस्थान के जयपुर जिले के जोबनेर क़स्बे में स्थित ज्वाला माता के बारे में अपने पाठकों को जानकारी दे रहे हैं। ज्वाला माता के मंदिर का उल्लेख कराती गीतांजलि पोस्ट के पत्रकार विनय शर्मा की यह विशेष रिपोर्ट…………
 
पौराणिक दृष्टि- राजस्थान के जयपुर के जोबनेर में स्थित ज्वालामाता का यह मन्दिर राजस्थान का एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जिसकी शताब्दियों से लोक में बहुत मान्यता है । यह धाम जयपुर से लगभग 45 कि. मी. पश्चिम में ढ़ूंढ़ाड़ अंचल के प्राचीन कस्बे जोबनेर में स्थित है । यह स्थान अत्यन्त प्राचीन है। साहित्यिक ग्रन्थों और शिलालेखों से जोबनेर की प्राचीनता प्रकट होती है जिसमें इसे जब्बनेर ,जब्बनकार ,जोवनपुरी ,जोबनेरि ,जोबनेर आदि विविध नामों से उल्लेखित किया गया है । कूर्मविलास में उसका एक अन्य नाम जोगनेर (योगिनी का नगर) मिलता है जो इसका प्राचीन नाम प्रतीत होता है ।
जालपा या ज्वालामाता देवी या  शक्ति का ही रूप है। जोबनेर के इस पूर्व नाम जोगनेर का उल्लेख कूर्मविलास नामक ऐतिहासिक काव्य में हुआ है ,जो हमारी इस धारणा की पुष्टि करता है । कूर्मविलास में कवि ने जोगनेर के लिए ही जोबनेर का भी प्रयोग किया है,जिससे दोनों की अभिन्नता सिद्ध है । जोबनेर अरावली पर्वतमाला के जिस विशाल पर्वत शिखर की गोद में बसा है ,उसकी पर्वतीय ढलान पर पहाड़ के बीचोंबीच उसके ह्रदय स्थल पर ज्वालामता का भव्य मन्दिर बना है । सफेद संगमरमर से बना ज्वालामता का यह मन्दिर बहुत सुन्दर और आकर्षक लगता है और दूर से ही दिखाई दे जाता है । ज्वालामता जोबनेर नगर की अधिष्ठात्री देवी है ,मनोहरदासोत खंगरोतों की आराध्या है ।
 “सुन्‍दर शैल शिखर पर राजे, मन्दिर ज्‍वाला माता का।
अनुदिन ही यात्रीगण आते, करने दर्शन माता का।।
इसी भवानी के पद तल में, नगर बसा एक अनुपम सा।
जोबनेर विख्‍यात नाम से, पद्रेश में सुन्‍दरतम् सा।।”
कैसे हुआ ज्वाला माता का अवतार- पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने सती के शव को कंधे पर उठाकर ताण्डव नृत्य किया था । उस समय सती का शरीर छिन्न-भिन्न होकर उनके अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे जो ,शक्तिपीठ बने । जोबनेर पर्वत पर उसका जानु-भाग (घुटना) गिरा,जिसे उसका प्रतीक मानकर ज्वालामता या जालपा देवी के नाम से पूजा जाने लगा ।
क्या कहता है इतिहास- इस मन्दिर के सभामण्डप के स्तम्भ पर प्रतापी चौहान शासक सिंहराज का विक्रम संवत् 1022 (965 ई.) की माघ सुदी 12 का एक शिलालेख हमारे देखने में आया है । दुर्भाग्यवश शिलालेख काल प्रभाव से भग्न होने के कारण पूरा नहीं पढ़ा जा सका है । सम्भवतः इस शिलालेख में मन्दिर के जीर्णोद्धार या पुनर्निर्माण सम्बन्धी घटना का उल्लेख हो । जोबनेर के इस पर्वतशिखर पर जहाँ ज्वालामाता का मन्दिर है ,उसके ऊपरी भाग पर इस क्षेत्र के चौहान शासकों द्वारा निर्मित प्राचीन दुर्ग के भग्नावशेष आज भी वहाँ विद्यमान हैं । जोबनेर शाकम्भरी के चौहान राज्य का एक अंग था और उसके सपादलक्ष साम्राज्य के प्रमुख नगरों में इस गणना होती थी । वंशभास्कर में शाकम्भरी नरेश मणिक्यराज चौहान द्वारा जिन नगरों एवं गाँवों को जीतने का उल्लेख हुआ है । प्रतिवर्ष नवरात्र में (विशेषतःचैत्र मास में) यहाँ एक विशाल मेला भरता है,जिसमें दूर – दूर से तीर्थयात्री एवं श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं । इस मंदिर में एक अखंड ज्योति भी हमेशा प्रज्वलित रहती है।
जोबनेर पर चौहानों के बाद पहले हमीरदेका कछवाहों तथा फिर खंगारोत कछवाहों का आधिपत्य रहा । इस शाखा के पूर्व पुरुष जगमाल कछवाहा (आम्बेर नरेश पृथ्वीराज के पुत्र) और उनके पुत्र खंगार ने पहले बोराज और फिर जोबनेर पर अधिकार कर लिया ।
लोक कहावतें- जनश्रुति है कि ज्वालामाता ने राव खंगार की जोबनेर पर आधिपत्य स्थापित करने में अप्रत्यक्ष मदद की थी । अजमेर के शाही सेनापति मुहम्मद मुराद (लालबेग) ने 1641 ई. के लगभग जब यहाँ के शासक जैतसिंह के शासनकाल में जोबनेर पर आक्रमण किया तब जोबनेर पर्वतांचल से मधुमक्खियों का एक विशाल झुण्ड आक्रान्ता पर टूट पड़ा तथा इस तरह देवी ने प्रत्यक्ष रूप में सहायता कर जैतसिंह को विजय दिलाई । इस युद्ध में आक्रांता से छीनी हुई नोबत ज्वालामाता के मन्दिर में आज भी विद्यमान है । रावल नरेन्द्रसिंह ने अपने राजप्रासाद के पार्श्व से मन्दिर को जाने वाले प्रवेश मार्ग पर ज्वालापोल नामक एक विशाल प्रवेश द्वार का निर्माण करवाया।