लोकतन्त्र के प्रहरी की सुरक्षा क्यों नहीं ?

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गीतांजलि पोस्ट……..(रेणु शर्मा,जयपुर) शनिवार को पंजाब के मोहाली में वरिष्ठ पत्रकार केजे सिंह और उनकी मां गुरुचरन कौर की हत्या कर दी, दोनों का शव उनके आवास में मिले हैं। दोनों शव देखकर साफ है कि हमलावरों ने घर में घुसकर हत्या की है। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। हत्या के कारणों का फिलहाल पता नहीं चल पाया है। केजी सिंह इंडियन एक्सप्रेस के न्यूज एडिटर रह चुके हैं। साथ ही उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया और द ट्रिब्यून में भी काम किया है।

सबसे पहले कन्नड़ भाषा की पत्रकार गौरी लंकेश की बेंगलुरु में हत्या की गई, उसके बाद त्रिपुरा में शांतनु भौमिक का रिपोर्टिंग के दौरान अपहरण कर हत्या कर दी इसके बाद आज पंजाब के केजे सिंह की हत्या कर दी गयी । पत्रकारिता के लिहाज से देखा जाये तो पत्रकारिता एक जोखिम भरा काम है खबर बनाने वाला पत्रकार खुद सबसे बड़ी खबर है, लेकिन उसकी अपनी खबर, किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनती, वो दूसरों को सुखिऱ्यों में लाता हैं। पत्रकारों की हत्या करवाने के मामले में सीरिया और लीबिया के बाद तीसरे स्थान पर भारत का नम्बर आता हैं, बात आंकड़ों की किया जाएं तो विश्व के दस खतरनाक पैशे मे से एक हैं पत्रकारिता, फिर भी पत्रकारों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हैं । कार्य करते हुए कोई पत्रकार अपाहिज हो जाता हैं या किसी बिमारी से पीडित हो जाता हैं तो कौन आता है पत्रकार की सहायता करने ? मतलब कि दुनियां हैं ये , मेंने ऐसे कई मामले देखे हैं जब पीडित पत्रकार का साथ उन मीडिया घरानों ने भी साथ नहीं दिया जिनके लिये वो दिन-रात काम करता रहा।

एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी लोकतंत्र के लिए पत्रकारिता को महत्वपूर्ण बताते हैं वहीं दूसरी ओर लगातार हो रही पत्रकारों की हत्या स्वस्थ लोकतंत्र के लिये बहुत गंभीर खतरा है। पिछले एक माह में तीन पत्रकारों की हत्या कर दी । जब तक लोकतंत्र के प्रहरी पत्रकार/मीडियाकर्मी की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती तब तक किस तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना की जा सकती है ? किस तरह भारत विश्व में निष्पक्ष भयहीन और स्वतंत्र मीडिया होने का दम्भ भर सकता है ?

हमारे देश कि विडम्बना हैं इतना होने के बाद भी महाराष्ट्र के अलावा किसी भी राज्य में पत्रकार सुरक्षा कानून को लागू नहीं किया गया। दुनिया के कई देशों में पत्रकार सुरक्षा कानून बने हैं, जो पत्रकारों को सही और सच्ची खबर लाने के लिये प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन अफसोस हमारे देश में आज भी पत्रकार सुरक्षा कानून से वंचित है। यदी ऐसे ही पत्रकारों की हत्याएं होती रही तो आने वाले समय में पत्रकार पत्रकारिता करना ही छोड देगें फिर आराम से अपनी लालफीताशाही चलाते रहना क्योकि तब कोई नही होगा उनके काले कारनामे उजागर करने वाला। यह सही है कि किसी की अभिव्यक्ति पर आपकी असहमति हो सकती है परन्तु आप उसे मानने या न मानने के लिए भी तो स्वतंत्र है, लेकिन विरोधी स्वर को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश कर देने की या दूसरों पर अपनी सोच जबरन थोपने की इजाजत किसी भी धर्म में नहीं है, परंतु सब हो रहा हैं कुछ दलाल, ब्रोकर व लाइजनिंग में जुटे पत्रकारों को छोड़ दे तों ऐसे पत्रकारों की संख्या एक-दो नहीं बल्कि हजारों में है, जो हर तरह के असामाजिक तत्वों की पोल अपनी कलम के जरिए उजागर करते है और हर वक्त लालफीताशाही से लेकर नेता, माफिया व पुलिस के निशाने पर रहते है।

वर्तमान समय में पत्रकार की खबर ही उसकी जान की दुश्मन बन चुकी हैं, अपनी जान की परवाह ना करते हुए, घपले-घोटाले, अवैध-खनन, बलात्कार, हत्या, असंवैधानिक गतिविधियों को उजागर कर, आरोपियों को जनता के सामने लाकर बेनकाब करना हैं, तो उस पत्रकार को अकसर पैसा देकर खरीदने की कोशिश की जाती हैं, जब पत्रकार नही बिकता तो उसे यातनाये दी जाती हैं कि मजबूर होकर पत्रकार उनकी बात मान लेगा। लेकिन कुछ ईमानदार और साहसी पत्रकार उनकी बातों को नहीं मानते तो उनको मरवा दिया जाता हैं, क्योकि असंवैधानिक गतिविधियां, हत्या, बलात्कार, घपले-घोटाले, अवैध खनन जैसे मामले में पुलिस अधिकारियों से लेकर राजनेताओं की मिली भगत होती हैं और ये अपनी पहुंच एंव पॉवर के चलते ऐसे घपलों को उजागर कर उनके काम में व्यवधान करने वालो पत्रकारों को पैसा देकर खरीदने की कोशिश करते हैं, जब पत्रकार नही बिकता तो उसे यातनाये देने लगतें हैं कि मजबूर होकर वो उनकी बात मान लेगा कुछ ईमानदार और साहसी पत्रकार उनकी बातों को नहीं मानते तो उनको मरवा दिया जाता हैं या परेशानियों से दुखी होकर उन्हे खुद अपनी मौत को गले लगाना पड़ता हैं, इसी कारण पत्रकारों की सिलसिलेवार हत्याएं तथा मारपीट जैसी घटनाएँ घट रही हैं।

आखिर इन घटनाओं की छानबीन क्यों नहीं होती ? आखिर क्यों इन घटनाओं में संलिप्त अरोपियों के आरोपों की जांच में लगे आफिसरों की ही रिपोर्ट को सही मान लिया जाता है ? जिसके बारे में जगजाहिर है कि वह अपने दोषी अधिकारियों तथा सत्ता पक्ष के नेताओं के खिलाफ रिपोर्ट देना तो दूर अपना मुंह तक नहीं खोलतेे, फिर इन्हीं अधिकारियों से क्यों दोषियों की जांच कराई जाती हैं ? अब तक हर साल कितने पत्रकारों की हत्या कि गयी या उन्होने आत्महत्या कर ली उन्में से कितने मामलों की जांच की गयी हैं ? जांच के उपरान्त कितने दोषी व्यक्यिों को दण्डित किया गया ? ये ऑकडा क्या सरकार के पास उपलब्ध हैं ?

पत्रकार होने के नाते हम मांग करते हैं कि जब लोकतन्त्र के तीन स्तम्भ कार्यपालिका, न्यायपालिका एंव विद्यायिका को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं तो फिर लोकतन्त्र का चोथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता को भी सरकार की तरफ से सुरक्षा दी जानी चाहिये,जल्द से जल्द पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किया जाए। यदी कोई मीडिय़ाकर्मी आत्महत्या करता हैं या उसकी हत्या करवा दी जाती हैं तो उसकी जॅाच विशेष जॉच ऐजेन्सी से करवायी जानी चाहिये ऐसा करने से पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता कर पायेगा।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट