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कितना सार्थक हैं अन्तराष्ट्रीय वृद्वावस्था दिवस मनाना

GEETANJALI POST

एक अक्टूबर अन्तराष्ट्रीय वृद्वावस्था दिवस-विशेष

अक्टूबर की पहली तारीख को अन्तराष्ट्रीय वृद्वावस्था दिवस मनाया जाता हैं, बुजुर्गो के सम्मान में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, वरिष्ठ नागरिकों, वृद्व स्त्री-पुरूषों को सम्मानित किया जाता हैं।

ओल्ड इज गोल्ड यह कहावत एक हद तक सही हैं सोना जितना पुराना होता है उसकी उतनी ही कीमत बढ जाती है। उसी प्रकार व्यक्ति जितना अनुभव लेता हैं उसका ज्ञान उतना ही बढ जाता हैं यही कहावत वृद्व इंसान पर लागू होती हैं क्योकि उनके पास जीवन जीने का अनुभव होता हैं और व्यक्ति अनुभवों से ही सीखता है। बुजुर्गो के पास उनके द्वारा बिताये हुए अच्छे और बुरे समय का अनुभव होते हैं जो हमें बहुत कुछ सीखा देते हैं। परिवार में वृद्व व्यक्ति का अहम स्थान होता है।

बुजुर्ग अपने अनुभवों से किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं , बुजुर्गो की अहमियत पर राजस्थान का एक किस्सा मशहूर हैं। एक बार किसी लड़के की शादी में लड़की वालों ने कहा कि बारात में कोई बुजुर्ग नही आयेगा तो लड़के वाले बारात के साथ एक बुजुर्ग को छिपा कर ले गये शादी की रस्मों के पश्चात लड़की के चाचा ने कहा- धूल/मिट्टी की जेवड़ी बाटों।तब लड़के वालों में से कोई भी इसे नहीं समझ पाया और इस काम को कोई भी नही कर सका, तो उन्होने बारात के साथ छिपा कर लाये बुजुर्ग से इसका जवाब पूछा तो बुजुर्ग ने कहा -कि लड़की वालो से कहो की आप धूल की पूजंली देओगे तभी हम जेवड़ी बाटेंगे। जब लड़के वालों ने ये जवाब दिया तो लड़की वाले ने कहा की आप जरूर कोई किसी बुजुर्ग को लेकर आये हो । इसी प्रकार दिवस की तरह संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में राष्ट्रीय ग्रांडपेरेन्टस ड़े , चीन में डबल नौवी महोत्सव और जापान में रेस्पेक्ट फोर एजेड डे के रूप में वृद्वदिवस को मनाया जाता हैं, लेकिन हमारे देश में वृद्व स्त्री-पुरूषों के सम्मान के लिये कोई विशेष दिन नही हैं क्योकि हमारे यहा बुजुर्ग स्त्री-पुरूषों को रोजाना ही सम्मान दिया जाता है उनको परिवार में विशेष सम्मान दिया जाता हैं, वृद्वों को घर की शान मानते हैं। बडें-बूढों से परिवार में एक दहशत होती हैं आज भी हमारे यहा संयुक्त परिवार होते है जहा घर की बागडोर घर के बुजुर्ग के हाथ में ही होती हैं जीवन भर काम करने के पश्चात इंसान थक जाता है उसे आराम की जरूरत होती हैं, वृद्वावस्था आराम का जीवन व्यतित करता हैं वो अपने पोते-पोती के साथ जीवन जीता है। वृद्व के कारण ही नीषादराज गुह कि गलतफहमी दूर हुई जब भरतजी राम को मनाने के लिये बनवास जा रहे थे तब उनका भरत से होने वाला युद्व टल गया जिसका तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में वर्णन किया हैं

बूढु एकु कह सगुन बिचारी , भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ।

रामही भरतु मनावन जाही , सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।

वर्तमान समय में शहरीकरण होने के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ हैं एंव एकल परिवारों का चलन होने लगा है। सामान्यतया समाज में वृद्वों को अपेक्षित व्यवहार सहना पडता है। वृद्वों के सम्मान के लिये मनाया जाने वाला वृद्वावस्था दिवस तभी सार्थक सिद्व होगा जब हम हमारे घर, पडोस में रहने वाले वृद्वों को सम्मान देगे। जहा भी कोई कमर झुका कर, कमजोर नजर वाला दुबले-पतले ढाचे वाला इंसान दिखाई दे उसे झुक कर नमन करे ये वृद्व स्त्री-पुरूष को देखे उनके प्रति श्रद्वा से नमन करे।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र






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