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सड़े गले सिस्टम ने ले ली संतोषी की जान

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GEETANJALI POST

अब अपनी लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए एक महिला शिकायतकर्ता  के खिलाफ लामबंद हुआ प्रशासन
एक सड़े गले सिस्टम ने पहले तो संतोषी की जान ले ली और अब उसकी मौत को भूख से हुई मौत ना मान कर एक महिला शिकायतकर्ता को ही प्रताड़ित किया जा रहा है। झारखंड राज्य सरकार की एक जांच एजेंसी ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि संतोषी भूख से नहीं बल्कि बीमारी से मरी थी और इस मामले को बेवजह तुल दिया जा रहा है। एजेंसी ने राशन डीलर के गुनाहों पर पर्दा डालते हुए इस पूरे मामले को सबसे पहले उजागर करने वाली स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता तारामणि साहू को ही कसूरवार ठहराया जा रहा है। कहा है कि तारामणि साहू अपनी आपसी पारिवारिक रंजीश के चलते राशन डीलर को फंसा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कारीमाटी के राशन डीलर भोला साहू और सामाजिक कार्यकर्ता चंदा देवी उर्फ तारामणि साहू के बीच पारिवारिक झगड़ा है। इस कारण तारामणि साहू ने ही इस मामले को इतना तूल दिया। हालांकि जांच रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख तो है कि संतोषी के परिवार को फरवरी के बाद से राशन नहीं मिला था पर यह नहीं माना है कि उसकी मौत भूख से हुई।

गौरतलब है कि राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं होने के कारण झारखंड के सिमडेगा के जलडेगा प्रखंड स्थित कारीमाटी गांव की संतोषी के परिवारवालो को राशन नहीं मिल सका था जिससे 11 साल की संतोषी आठ दिनों से भूख से तड़पती रही और पिछले 28 सितंबर को उसकी मौत हो गई। संतोषी ने आठ दिन से कुछ भी नहीं खाया था। उसके घर में मिट्टी का चूल्हा था और जंगल से चुन कर लाई गई कुछ लकड़ियां भी। अगर कुछ नहीं था तो सिर्फ राशन। अगर होता, तो संतोषी आज जिंदा होती। लेकिन, लगातार भूखे रहने के कारण उसकी मौत हो गई। वह अपने परिवार के साथ कारीमाटी गांव मे रहती थी। करीब 100 घरों वाले इस गांव में कई जातियों के लोग रहते हैं। संतोषी पिछड़े समुदाय की थीं। गांव के डीलर ने पिछले आठ महीने से उन्हें राशन देना बंद कर दिया था। क्योंकि, उनका राशन कार्ड आधार से लिंक्ड नहीं था। 28 सितंबर की दोपहर संतोषी ने पेट दर्द होने की शिकायत की। गांव के वैद्य ने कहा कि इसको भूख लगी है। खाना खिला दो, ठीक हो जाएगी। पर संतोषी के घर में चावल का एक दाना नहीं था। वह भात-भात कहकर रोने लगी थी। उसके हाथ-पैर अकड़ने लगे। वह भूख से छटपटा रही थी। देखते ही देखते उसने दम तोड़ दिया। तब रात के दस बज रहे थे।

अब इस मामले से जुड़ी जलडेगा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता तारामणि साहू को राज्य सरकार और पूरा स्थानीय प्रशासन झूठा साबित करने में तुला है जबकि इन आरोपों को तारामणि साहू नकार रही है। तारामणि से इस लेखक ने विस्तृत बात की। उन्होंने बताया कि वह 20 अगस्त को कारीमाटी गांव गई। इसी दौरान संतोषी के परिवार से मिली। उस दिन संतोषी की मां कोयली देवी ने बताया कि हमें राशन डीलर भोला साहू कई महीनों से राशन नहीं दे रहा है। तब मैंने उपायुक्त के जनता दरबार मंे 21 अगस्त को इसकी शिकायत की। 25 सितंबर के जनता दरबार में मैंने दोबारा यही शिकायत कर राशन कार्ड बहाल करने की मांग की। तब संतोषी जिंदा थी लेकिन उसके घर की हालत बेहद खराब हो चुकी थी। मैं लगातार प्रशासन से संतोषी के परिवार का राशन कार्ड बहाल करने की मांग कर रही थी लेकिन मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया गया। और इसके महज एक महीने के बाद संतोषी की मौत हो गई। इस घटना के बाद राइट टू फूड कैंपेन कीपांच सदस्यीय टीम ने कारामाटी जाकर इस मामले की जांच की। तब संतोषी की मां कोयली देवी ने बताया कि संतोषी ने आठ दिन से भुखी थी और अंतिम समय में भी भूख के मारे तड़प रही थी और भात….भात कहते-कहते मर गई। सरकारी जांच रिपोर्ट में संतोषी की मौत भूख की बजाय मलेरिया से होने का दावा किया गया है। तारामणि साहू ने इस जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए सिमडेगा के उपायुक्त (डीसी) पर तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया हैं। तारामणि ने बताया कि एएनएम माला देवी ने 27 सितंबर को संतोषी को देखा, तब उसे बुखार नहीं था। ऐसे में मलेरिया कैसे हो गया और जिस डॉक्टर ने डीसी को यह बात बताई उसकी योग्यता क्या है। तारामणि का कहना है कि इस जांच रिपोर्ट में संतोषी की मां कोयली देवी का बयान तक नहीं लिया गया। ऐसे में यह जांच रिपोर्ट ही संदेह के घेरे में है। पूरा प्रशासन अपनी लापरवाही व काले कारनामों को छुपाने के लिए जांच रिपोर्ट के नाम पर तारामणि को झूठा साबित करने में तुला है।

इस पूरे प्रकरण में झारखंड राज्य सरकार व प्रशासन की साफ लापरवाही दिखाई दी। संतोषी के परिवार के रद्द राशन कार्ड को बहाल करने की मांग तारामणि ने घटना के एक महीने पहले ही जनता दरबार में जाकर उपायुक्त को आवेदन दिया दे दिया था। इसके बाद भी संतोषी के परिवार का राशन कार्ड नहीं बन पाया और ना ही आधार कार्ड से लिंक हुआ। आज भले ही झारखंड के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सरयू प्रसाद ये दावा कर रहे हो कि राशन के लिए आधार कार्ड की किसी भी तरह की कोई अनिवार्यता नहीं है पर आज से सवा साल पहले जून 2016 में इन्हीं मंत्री जी ने कहा था कि जिनका आधार कार्ड नहीं है, वे इस महीने अपना आधार कार्ड बनवा लें, नहीं तो सरकार ऐसे लोगों के बने राशन कार्ड को रद्द करेगी। कम से कम राशन कार्ड में दर्ज परिवार के किसी व्यक्ति का आधार कार्ड बनवा लें नहीं तो उन्हें राशन देना भी बंद कर दिया जाएगा। आज संतोषी की भुखमरी से मौत की खबरों के बीच आधार-कार्ड से वंचित परिवारों के राशन-कार्ड रद्द करने की झारखंड सरकार की कवायद पर सवाल उठ रहे हैं और मंत्री सरयू प्रसाद अपने ही पूर्व में दिए हुए बयान को नकार रहे हैं जबकि झारखंड सरकार की वेबसाइट में दिखाया गया है कि कम से कम 10 प्रतिशत परिवार अपने भोजन राशन खरीदने में असमर्थ है। चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता व अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का कहना है कि झारखंड की 80 प्रतिशत राशन दुकानों में आधार आधारित राशन वितरण व्यवस्था लागू कर दी गई है। इसके कई दुष्परिणाम निकले हैं। उनके मुताबिक कहीं इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण लोगों को राशन नहीं मिल रहा तो कहीं लाभार्थी परिवार के मुखिया का अंगूठा बायोमेट्रिक सिस्टम में स्कैन नहीं हो पा रहा। राज्यों में जब लोग राशन की दुकान पर जाते हैं, तब वे अपने उंगलियों के निशान को स्कैन करके खुद को प्रमाणित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संतोषी की मौत भी इसी व्यवस्था का नतीजा है।

बहरहाल, इन सब के बीच संतोषी की मौत के बाद झारखंड सहित पूरे देश में सियासत तेज हो गई है। झारखंड सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय संतोषी की मौत को बीमारी के हुई बताकर अपनी साख बचाने में लगी है। वहीं दूसरी तरफ सरकार व प्रशासन के इन झूठे हथकंडो के खिलाफ तारामणि साहू जैसी बुलंद हौसलों वाली महिला कार्यकर्ता संघर्ष कर रही हैं। और भला करें भी क्यों नहीं। आखिर संतोषी कुमारी को न्याय जो दिलाना है।

 (लेखक बाबूलाल नागा  जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार व फीचर सेवा विविधा फीचर्स के संपादक हैं)

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17 Comments to सड़े गले सिस्टम ने ले ली संतोषी की जान

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