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सरकार और डॉक्टर की सोची समझी चाल तो नहीं डॉक्टर की हडताल

गीतांजलि पोस्ट ……. रेणु शर्मा जयपुर

राजस्थान में अपनी 33 मांगों को लेकर पिछले पांच दिनों से चल रही डॉक्टर की हडताल पर ना सरकार झुक रही हैं नाही डॉक्टर पसीज रहे हैं सरकार और डाक्टर दोनों अपनी जिद पर अडिग हैं, जिसका खामियाजा मरीजो और उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है । सरकारी अस्पतालों में ईलाज के अभाव में मरीजों की मौते हो रही हैं तो शवों के पोस्टमार्टम नहीं होने से शव सड रहे हैं। हडताल का फायदा उठा कर निजी अस्पताल वाले और झोला छाप डॉक्टर अपना पैसा बना रहे हैं।

चिकित्सा मंत्री कालीचरण सर्राफ कहते हैं वार्ता के द्वार खुले हुए हैं लेकिन वार्ता क्यो नहीं हो रही ये सोचने वाला सवाल हैं ? जिस प्रकार सरकार और डॉक्टर अपनी जिद पर अडिग हैं उसे देखकर लगता हैं, डॉक्टर की हडताल सरकार और सरकारी डॉक्टर की सोची समझी चाल हैं। सरकार मेडिकल को निजी करने का विचार बनाने में लगी हैं क्योकि सरकारी अस्पताल में मरीजों का ईलाज, दवाईया, जांच निशुल्क होती हैं जिसका खर्चा सरकार द्वारा दिया जाता है इसके अलावा डॉक्टर्स की तनख्वाह, अस्पताल का रख-रखाव भी सरकार द्वारा किया जाता हैं वहीं दूसरी ओर सरकारी डॉक्टर्स अपनी तनख्वाह से ज्यादा पैसा नीजि प्रेक्टिस करके कमा लेते हैं। यदी सरकार सरकारी अस्पतालों को बन्द करके निजी कर देती हैं तो इससे सरकार का अस्पताल पर होने वाला खर्चा नहीं होगा वहीं दूसरी ओर सरकारी डॉक्टर प्राईवेट अस्पतालों में या निजी क्लिनिक में मुंह मागां पैसा लेकर मरीजों का ईलाज करेगे। इससे सरकार और डॉक्टर्स दोनो को फायदा होगा जेब कटेगी तो सिर्फ ईलाज करवाने वालों की कटेगी।

गौरतलब हैं कि राजस्थान में डॉक्टर सामूहिक अवकाश पर हैं, क्योकि डॉक्टर हड़ताल नहीं कर सकते इसलिये उन्होने सामूहिक अवकाश ले लिया हैं। सामूहिक अवकाश हो या हड़ताल हो बात एक ही हैं क्योकि दोनो ही स्थिति में कार्य नहीं किया जाता। सेवारत डॉक्टरों के सामूहिक अवकाश या हड़ताल पर चले जाने से प्रदेशभर के करीब 2800 अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सा सेवाएं गड़बड़ा गई है, बड़े अस्पतालों में गंभीर ऑपरेशन टाले जा रहे हैं वहीं आउटडोर भी आयुष चिकित्सकों के भरोसे चल रही हैं। सरकार की ओर से अस्पताल में पहुंचने वाले मरीजों के लिए किए गए वैकल्पिक इंतजाम भी नाकाफी साबित हो रहे हैं, लेकिन हमारी असंवेदनशील सरकार के कानों पर जू तक नहीं रैंग रही। सरकार की अनदेखी के चलते अस्पतालों में मरीजो की हालत बद से बदतर हो गयी है , हालात ये है कि राज्य के बहुत से अस्पतालों में शवो का पोस्टमार्टम तक नहीं हो रहा है । जेब में पैसा हो या ना हो मरीजों का ईलाज करवाने के लिए मरीजों को लेकर प्राइवेट अस्पतालों , झौला-छाप डॉक्टरों की तरफ भागना पड़ रहा है जो उनकी जेब काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नॉन प्रैक्टिस अलाउंस (एनपीए) दिए जाने के बावजूद भी सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रेक्टिस करते दिखाई दे रहे है।

देखा जाए तो मरीज भगवान के बाद चिकित्सक को ही दूसरा भगवान मानता है और चिकित्सक भी अपनी नौकरी से पहले अपने मरीज की सच्चे मन से इलाज करने की शपथ भी खाते हैं लेकिन आज ईलाज के अभाव में मरीजों की मौतों का उन पर कोई असर नहीं हैं उनको तो सिर्फ अपनी जिद की पडी हैं । सरकार और चिकित्सों का यह अडीयल रवैया आमजन के लिए घातक सिद्ध हो रहा है सरकार ने एक बार भी डाक्टर्स से बातचीत कर उनकी मांगो का समाधान नहीं निकाला है इस मामले मे सरकार और  स्वास्थय मंत्री कालीचरण सर्राफ फैल होते दिख रहे हैं। डॉक्टरो की हडताल  कोई आम हडताल नहीं है जिससे केवल अव्यवस्था ही हो डॉक्टरो की हडताल मरीज की जिंदगी और से जुडी हुई है जिसका खामियाजा मरीजो के साथ साथ उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है, यह जिंदगी ओर मौत से संबधित हैं ।जिसे जनता बर्दाश्त नहीं कर सकती , राजस्थान की जनता सरकार और डॉक्टरो से जवाब माग रही हैं ” पिछले 5 दिनों से डाक्टरों की हडताल के कारण, ईलाज के अभाव में होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन हैं” ?

सरकार को चाहिये कि डॉक्टर्स से बात करके समाधान निकाले और भविष्य मे ऐसी क्रियान्वित दुबारा ना हो इसके लिये पुलिस ओर सेना की तरह चिकित्सको पर भी हड़ताल करने पर पूर्णतया पाबंदी लगाये ।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

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