हजारों वीरांगनाओं के जौहर की याद दिलाने वाला दुर्ग

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जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर (अनदेखा भारत) -33

गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठकों के लिये इतिहास के झरोखें से नाम से एक विशेष कॉलम बनाया हैें जिसमें पाठकों को देश की ऐतिहासिक धरोंहर जैसे- 250 साल से अधिक पुराने ऐतिहातिक दुर्ग , विभिन्न धर्मो के धार्मिक स्थल इत्यादी की जानकारियां दी जाती हैं। आज के इस विशेष कॉलम में हमने चित्तौडगढ़़ जिले के चित्तौडगढ़़ दुर्ग के बारे में बताया हैं चित्तौडगढ़़ दुर्ग का उल्लेख करती गीतांजलि पोस्ट के संवाददाता अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट, अश्विनी शर्मा, जयपुर

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राजस्थान का गौरव , वीरता और बलिदान का प्रतिक चित्तौडगढ़़ दुर्ग को मौर्य राजा चित्रांग ने सातवीं शताब्दी में अरावली पर्वतमाला पर बनवाया जो स्थापत्य की दृष्टि से भी निराला दुर्ग हैं जो चित्तौडगढ़़ के शानदार इतिहास को बताता है। यह हमीर सांगा, कुम्भा जैसे वीर राजाआों की राजधानी भी रहा है। 1303ई0 में महारानी पद्मनी, 1535 ई0 में महारानी कर्मावती तथा 1588 ई0 में महारानी फूल कंवर के नेतृत्व में 46 हजार से भी ज्यादा वीरांगनाओं ने जौहर कर शौर्य वीरता और पराक्रम का परिचय दिया है। पन्नाधाय ने 1530ई0 में अपने पुत्र चंदन का बलिदान कर स्वामी भक्ति की मिसाल कायम की है। वहीं मीरा ने भक्ति की रसधारा बहाकर शक्ति भक्ति और मुक्ति की ऐतिहासिक धरोहर बनाया है।

चित्तौड़ दुर्ग की विशेषतायें

गढ़ तो चित्तौडगढ़़ और सब गढ़ैया यह यही भी हैं क्योकिं यह किला शानदार संरचना 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और लगभग 700 एकड में फ़ैली हुई हैं जो कई विध्वंसों के बाद भी बचा हुआ है। किले तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं हैं किले तक पहुँचने के लिए एक खड़े और घुमावदार मार्ग से एक मील चलना होगा। इस किले में सात नुकीले लोहे के दरवाज़े हैं जिनके नाम हिंदू देवताओं के नाम पर पड़े। इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ साथ रानी पद्मिनी और महाराणा कुम्भ के शानदार महल हैं। किले में कई जल निकाय हैं जिन्हें वर्षा या प्राकृतिक जलग्रहों से पानी मिलता रहता है।

जौहर की याद दिलाता गढ

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अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर रानी पद्मावती पर थी और इसके लिए उसने चित्तौड़ को नष्ट कर दिया था। रानी पद्मावती के पति राणा रतन सिंह अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए थे। स्वंय रानी पद्मावती ने हजारों उन स्त्रियों के साथ जिनके पति वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जीवित ही स्वंय को आग के हवाले कर जौहर कर लिया था।

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एक किंवदन्मत के अनुसार पाण्डवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था। इस संबंध में प्रचलित कहानी यह है कि एक बार भीम जब संपत्ति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट होती है। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग का निर्माण करवा दे। भीम ने अपने शौर्य और देवरुप भाइयों की सहायता से यह कार्य करीब-करीब समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ दक्षिणी हिस्से का थोड़ा-सा कार्य शेष था। योगी के ऋदय में कपट ने स्थान ले लिया और उसने यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा, जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी, जिससे वहाँ एक बड़ा सा गड्ढ़ा बन गया, जिसे लोग भी-लत तालाब के नाम से जानते है। वह स्थान जहाँ भीम के घुटने ने विश्राम किया, भीम-घोड़ी कहलाता है। जिस तालाब पर यति ने मुर्गे की बाँग की थी, वह कुकड़ेश्वर कहलाता है।

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