इन्द्रधनुष से कम नहीं हैं जयपुर पर्यटन

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जयपुर के 290 स्थापना दिवस पर विशेष

जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोहर (अनदेखा भारत) -34

गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठकों के लिये इतिहास के झरोखें से नाम से एक विशेष कॉलम बनाया हैें जिसमें पाठकों को देश की ऐतिहासिक धरोंहर जैसे- 250 साल से अधिक पुराने ऐतिहातिक दुर्ग , विभिन्न धर्मो के धार्मिक स्थल इत्यादी की जानकारियां दी जाती हैं। आज के इस विशेष कॉलम में हमने जयपुर के बारे में बताया हैं जयपुर  का उल्लेख करती गीतांजलि पोस्ट के  कोटा लेखक एवं पत्रकार डॉ. प्रभात कुमार सिंघल  की रिपोर्ट…….

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पर्यटन एवं मेहमान नवाजी के लिए राजस्थान की राजधानी और गुलाबी नगर के नाम से विश्व में मशहूर सबसे बड़ा नगर जयपुर सैलानियों की खास पसन्द है। यह पहला ऐसा प्राचीन नियोजित शहर है जहां चौड़ी सड़कें, चौपड़, प्राचीन ऊँचे-ऊँचे कलात्मक गुलाबी द्वार, महल, किले, राजाओं की छतरियां, मंदिर एवं बाग-बगीचे आदि अपने समय के वैभव की कहानी सुनाते हैं। जयपुर शहर को महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 ई. में बसाया था और इस नगर का निर्माण एक बंगाली वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य ने किया था। देशी एवं विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में पूरे वर्ष जयपुर में चहल-कदमी करते हुए नजर आते हैं। जयपुर को बसे हुए 290 वर्ष पूरे हो चूके हैं। जयपुर पर्यटन की दृष्टि से किसी इन्द्रधनुष से कम नहीं हैं।

सिटी पैलेस- पुराने शहर के हृदय स्थल में राजस्थानी एवं मुगल शैली में निर्मित शासकों का महल जिसे ”सिटी पैलेस“ कहा जाता है स्थित है। यहां संगमरमर के स्तम्भों पर नक्काशीदार मेहराब, सोने व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों के अलंकृन दर्शक को अचम्भित कर देते हैं। प्रवेश द्वार पर दो नक्काशीदार हाथी पहरेदार के रूप में खड़े नजर आते हैं। सिटी पैलेस में एक दर्शनीय संग्रहालय बनाया गया है। जहां राजस्थानी पोशाकों तथा मुगलों व राजपूतों के अस्त्र-शस्त्रों का बेहतरीन संग्रह किया गया है। विभिन्न रंगों व आकार वाली तराशी गई मूठ वाली तलवारें जिनमें मीनाकारी का जड़ाऊ कार्य एवं जवाहरतों से अलंकृत हैं। संग्रहालय में शाही कालीनों, साज-सामान, लघु चित्र, अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ ज्योतिश एवं खगोल विज्ञान की रचनाओं के उत्कृष्ट संग्रह देखने को मिलते हैं। सीटी पैलेसे खुलने का समय प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक है। प्रवेश के लिए निर्धारित शुल्क देना पड़ता है।

जंतर-मंतर- सिटी पैलेस के समीप ही स्थित ”जंतर-मंतर“ एक पत्थरों से बनाई गई खूबसूरत वेदशाला है। सवाई जयसिंह द्वारा देश में पाँच स्थानों पर बनाई गई वेदशालाओं में जयपुर की वेदशाला सबसे बड़ी और आकर्शक है। जंतर-मंतर के सभी यंत्रों का आकार और विन्यास वैज्ञानिक आधार पर किया गया है। सबसे बड़ा यंत्र है सूर्य घड़ी एवं प्रभावशाली यंत्र है राम यंत्र। सूर्य घड़ी से समय मालूम किया जाता है कि जबकि राम यंत्र ऊँचाई नापने के लिए बना है। यहां तारों की गणना करने वाले कई यंत्र तथा बारह राशियों के यंत्र देखते ही बनते हैं। जंतर-मंतर खुलने का समय प्रातः 9 बजे से सायं 4.30 बजे तक है।

hawa-mahal1हवामहल – शीतल हवा के लिए बनवाया गया हवामहल जंतर-मंतर के पीछे की ओर बड़ी चौपड़ के समीप मुख्य मार्ग पर स्थित है। हवामहल जाने का रास्ता पीछे की ओर बना है। इसका निर्माण 1799 ई. में करवाया गया था। पाँच मंजिला हवामहल अपने अनेक खिड़कियों एवं झरोखों के साथ अद्भुत कारीगरी के लिए गुलाबी रंग में अपनी पहचान बनाता है। बताया जाता है कि इन झरोखों से रानियां सड़क पर निकलने वाले जुलूस एवं शोभा यात्राओं को देखा करती थी। यहां एक संग्रहालय भी स्थित है। हवामहल प्रातः 9 बजे से सायं 4.30 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

गोविन्द देव जी मंदिर – सिटी पैलेस से जुड़ा जय निवास गार्डन के मध्य स्थित गोविन्द देव जी का मंदिर धार्मिक आस्था का बड़ा केन्द्र है। मंदिर भगवान कृश्ण को समर्पित है। जय निवास उद्यान के उत्तर में चन्द्र महल तथा दक्षिण में तालकटोरा तालाब स्थित है। मंदिर एवं ताल कटोरा के मध्य कई मंदिर, सरोवर, उद्यान आदि बनाये गये है। तालकटोरा में दर्शक नौकायन का आनन्द भी ले सकते हैं। बताया जाता है कि कृश्ण की मूर्ति को सवाई जय सिंह द्वितीय वृन्दावन से लाये थे और उस समय चन्द्र महल में ही पधराया गया तथा आगे चलकर वर्तमान स्थान पर स्थापित की गई। मंदिर के गर्भगृह में विशाल चाँदी के पाट पर श्याम वर्ण गोविन्द, राधा उनकी सखियांे और लड्डू गोपाल की प्रतिमाएं है। जेश्ठ माह में भगवान की जलविहार, नोकाविहार, फूल बंगला और फूल श्रंृगार झांकियां सजाई जाती है। मंदिर की आन्तरिक सज्जा देखते ही बनती है, जहां यूरोपियन शैली के झूमर लगे है और भारतीय कला व संस्कृति को दर्शाने वाले चित्र लगाये गये है। मंदिर की छत चमकदार सोने की जडाई से बनी है। यह ऐसी जगह पर है जिसके चन्द्र महल से सीधे दर्शन किये जा सकते है। मंदिर में कृश्ण जन्माश्टमी, होली एवं वैश्णव पर्व धूम-धाम से मनाये जाते हैं, जिसमें विदेशी सैलानी भी बड़ी संख्या में भाग लेते है।
सरगासूली – सरगासूली अथवा ईसर-लाट त्रिपोलिया बाजार के पश्चिम की ओर आसमान को छूती हुई इमारत है। इसका निर्माण सवाई ईश्वरी सिंह ने 1749 ई. में करवाया था। यह लाट विजय प्राप्ति को मनाने के लिए बनवाई गई थी। त्रिपोलिया बाजार से गुजरते समय यह दूर से ही नजर आती है।

रामनिवास बाग – यह उद्यान अलबर्ट संग्रहालय, चिड़ियाघर, वनस्पति संग्रहालय, रवीन्द्र मंच, आधुनिक कला दीर्घा तथा ओपन थियेटर तथा खूबसूरत बगीचे अपने में समेटे हुए है। अलबर्ट संग्रहालय भारतीय वास्तु कलाशैली का एक सुन्दर नमूना है जिसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1868 ई. में करवाया था। यहां उत्कृष्ट मूतियां, चित्र, प्राकृतिक विज्ञान के नमूने, इजिप्ट की ममी, फारस के कालीन, दीवारों पर बने बड़े-बड़े प्राचीन चित्र, अस्त्र-शस्त्र तथा विभिन्न प्रकार की मनोरम झांकियां देखी जा सकती है। चिड़ियाघर अत्यन्त समृद्ध है जहां वनमानुश चिमपांजी की अठखेलियां विशेश रूप से लुभाती हैं। रवीन्द्र मंच सांस्कृतिक गतिविधियों तथा कलादीर्घा चित्रकारों को बड़ावा देने का माध्यम है। यहां के सुन्दर बाग-बगीचे हर समय विशेश कर प्रातः एवं सायं दर्शकों की चहल-पहल से आबाद रहते हैं।

गुड़िया संग्रहालय – पुलिस स्मारक के समीप स्थित छोटी गुड़ियाओं का संग्रहालय विशेश रूप से दर्शनीय है। यह संग्रहालय मूक एवं बंधिर विद्यालय परिसर में बनाया गया है। यहां विभिन्न देशों की छोटी-छोटी विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी गुड़ियाएं देखने को मिलती हैं। यह संग्रहालय प्रातः 8 बजे से सायं 6 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

तारामण्डल – सचिवालय के समीप निर्मित आधुनिक बी.एम.बिड़ला तारामण्डल खगोल विज्ञान की जानकारी प्राप्त करने का एक अच्छा माध्यम है। कम्प्यूटर युक्त प्रक्षेपण व्यवस्था के साथ यहां श्रव्य एवं दृश्य कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षा व मनोरंजन साधनों की अच्छी व्यवस्था उपलब्ध है। विद्यार्थियों को विद्यालय की ओर से समूह में आने पर रियायत प्रदान की जाती है। प्रत्येक माह के अन्तिम बुधवार को यह बंद रहता है। भवन की कलात्मकता एवं आस-पास के उद्यान की सुन्दरता देखते ही बनती है।

मोती डूंगरी एवं बिड़ला मंदिर – जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर स्थित मोती डूंगरी का प्राचीन गणेश मंदिर तथा इसके समीप ही बिड़ला समूह द्वारा पिछले वर्शों में निर्मित आधुनिक बिड़ला मंदिर जिसे लक्ष्मी नारायण मंदिर भी कहा जाता है दर्शनीय हैं। गणेश मंदिर के बाहर कुछ ओर मंदिर भी बने हैं। बुधवार के दिन यहां विशेश रूप से दर्शनार्थियों का ताता लगा रहता है। यहां गणेश जी की दिव्य प्रतिमा में सूंड दांई ओर है जिस पर सिंदूर का चौला चढ़ाकर श्रृंगार किया जाता है। गणेश जी के मस्तश्क पर चांदी का मुकुट और छत्र लगा है। बिड़ला मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित अत्यन्त कलात्मक मंदिर है। यह मंदिर एक आकर्शक उद्यान के बीच स्थित है। गर्भगृह में विश्णु एवं लक्ष्मी जी की विशालकाय प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के तोरण द्वार व मूर्तिकला का सौन्दर्य अद्भुत है। बिना स्तम्भों का 4 हजार वर्ग फीट का सभा मण्डप एवं दीवारों पर बेल्जियम काँच में उत्कीर्ण धार्मिक चित्रों की शोभा देखते ही बनती है। उद्यान परिसर में कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी लगी है। रात्री में बिजली की रोशनी में नहाया पूरा परिसर अत्यन्त रमणीक प्रतीत होता हैं। दक्षिण भारत भवन निर्माण शैली में बना यह मंदिर 55 हजार वर्ग फीट क्षेत्रफल में निर्मित है।

गलताजी – शहर की पूर्वी पहाड़ियों के मध्य स्थित गलताजी का धार्मिक एवं प्राकृतिक परिवेश देखते ही बनता है। यहां पहुँचने के लिए पहाड़ी पर दो कि.मी. की चढ़ाई तय करनी होती है। दूसरा रास्ता आगरा रोड़ से जाम डोली होकर जाता हैं। यह स्थल जयपुर से करीब 15 कि.मी. दूर आज विश्व के मानचित्र पर अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां के मंदिरों में दक्षिणी मुखी हनुमान जी, संतोशी माता मंदिर, राम रामेश्वर मंदिर, कल्याण जी मंदिर, पंचमुखी हनुमान जी मंदिर, सिद्धी विनायक मंदिर, वीर हनुमान मंदिर, पापड़ा मंदिर तथा पहाड़ी की चोटी पर सूर्य मंदिर प्रमुख मंदिर है। यहां )शि गालव मंदिर एवं पवित्र कुण्ड बन है। महिला एवं पुरूशों के स्नान के लिए अलग-अलग कुण्ड बनाये गये है। यहां बने सात कुण्डों में सूर्य कुण्ड एवं गोपाल कुण्ड प्रमुख है। बताया जाता है कि अठारवीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई सिंह द्वितीय के दीवान कृपा राम ने यहां हवेलीनुमा भव्य मंदिर तथा कुण्डों का निर्माण कराया था। सावन एवं कार्तिक मास में यहां स्नान कर दान पुण्य करना पवित्र कार्य माना जाता है। इस तीर्थ पर बड़ी संख्या में बन्दरों की अठखेलियां देखते ही बनती है।

gadh-ganeshगढ़ गणेश मंदिर – जयपुर में नहार गढ़ की पहाड़ी के समीप चोटी पर स्थित गढ़ गणेश के मंदिर में गणेश जी बाल रूप में विराजित है। यह स्थल जयपुर के लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में है। मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह द्वारा अश्वमेध यज्ञ के साथ करवाया गया था। यहां रिद्धि-सिद्धि और उनके दो पुत्र शुभ-लाभ की मूर्तियां भी स्थित है। बुधवार के दिन यहां विशेश रौनक रहती है। मंदिर का रास्ता ब्रह्मपुरी के समीप से पहाड़ी पर जाता है।
चूलगिरी जैन मंदिर – घाट की गूणी के पास जयपुर-आगरा राश्ट्रीय राजमार्ग 11 पर ऊँची पहाड़ी पर स्थित चूलगिरी जैन मंदिर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित है, जहां महावीर स्वामी की बहुमूल्य रत्नों से जड़ित 7.5 फीट ऊँची खड़गासन मुद्रा की प्रतिमा स्थापित है साथ ही नेमिनाथ एवं महावीर स्वामी की छोटी प्रतिमाएं भी मूल नायक के समीप वेदियों मंे स्थापित हैं, जो पदमासन मुद्रा में है। परिसर में चौबिसी एवं एक कक्ष में देवी पदमावति की प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर पहुँचने के लिए सड़क मार्ग एवं पहाड़ी मार्ग बने है। मंदिर के भव्य द्वार की कारीगरी लुभावनी है। जैन धर्मावलम्बियों का यह एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है।

आमेर –जयपुर के समीप ही राजा मानसिंह, मिर्जा राजा जय सिंह एवं सवाई जय सिंह द्वारा बनाया गया आमेर का महल अपनी अद्भुत वास्तुकला एवं दीवारों पर बनाई गई कलाकारी के लिए व्याख्यात हैं। महलों के साथ-साथ यहां बने उद्यान और मंदिर इसकी शोभा को बढ़ाते हैं। महल की तलहटी में स्थित मावटा झील के मध्य स्थित मोहन बाड़ी अथवा केसर क्यारी तथा पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग महल की बाहरी सुन्दरता में चार चाँद लगाते हैं। महल में बने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, दो मंजिला चित्रित गणेश पोल प्रवेश द्वार, प्रवेश द्वार के पीछे बांई ओर जस मंदिर तथा दांई ओर सुख निवास महल बने हैं। महल राजपुत एवं मुगल कला शैली के सम्मिश्रण से बनाये गये है, जिनकी नक्काशीदार जाली, बारिक शीशों का कार्य, चित्रित एवं नक्काशीदार अलंकरण देखते ही बनते हैं। महल के पहले मंजिल पर बने महल भी आकर्शक है। महल से पूर्व जलेब चौक में बना शीतला माता का मंदिर दर्शनीय है।
बताया जाता है कि आमेर सात शताब्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाह शासकों की राजधानी थी। महलों के पीछे की ओर इस शहर के कुछ अवशेश ही बचे है। यहां खूबसूरत शिल्पकला लिए जगत शिरोमणी मंदिर, मीरा बाई से जुड़ा कृश्ण मंदिर, नरसिंह जी का पुराना मंदिर, सीढ़ियों वाला कुआं तथा कुछ जैन मंदिर अतीत के साक्ष्य के रूप में दर्शनीय है।

जयगढ़ किला –मध्ययुगीन भारत के सैनिक किलों में जयगढ़ किले का नाम प्रसिद्ध है। आमेर से ही चढ़ाई पर इस किले तक पहुँचा जा सकता है। यहां महल, बगीचें, पानी जमा करने के बड़े-बड़े टांके, अन्न भण्डार, तोप एवं शस्त्र संग्रहालय, तोप ढलाई घर, मंदिर, एक ऊँचा बुर्ज और दुनियां की विशालकाय तोप ”जय बाण“ प्राचीन वैभव की कहानी सुनाते है। किले के फैले हुए परकोटे, बुर्ज और प्रवेश द्वार इसे भव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।

नाहरगढ़ किला –जयगढ़ के पीछे ही पहाड़ियों पर बना नाहरगढ़ किले में सवाई मानसिंह द्वितीय एवं सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा बनाई गई इमारतें दर्शनीय हैं। यहां से जयपुर का खूबसूरत विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। किले पर एक वैक्स मॉडल संग्रहालय भी बना है।
अन्य स्थल –
आमेर मार्ग पर रामबाग मार्ग के चोराहें के पास रानियों की स्मृतियों में बनी आकर्शक महारानियों की छतरियां स्थित है। मानसागर झील के मध्य स्थित जलमहल की आभा निराली है। कनक वृन्दावन भवन, मंदिरों एवं सुन्दर बगीचों के लिए कनक वृन्दावन उद्यान अपनी पहचान बनाता है। इस सड़क के पश्चिम की ओर ब्रह्मपुरी में पहाड़ियों की तलहटी में स्थित गैटोर की छतरियां यहां के शासकों का कब्रिस्तान है। यहां अनेक कलात्मक छतरियों में बारिक नक्काशी व खूबसूरत शिल्पकला की मूर्तियां तथा अलंकृत स्तम्भ देखने को मिलते हैं। सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी अपनी कलात्मकता के कारण विशेश रूप से दर्शनीय है। इन्हीं के पास से एक रास्ता पहाड़ियों पर चढ़कर गढ़ गणेश तक पहुँचता है। आगरा मार्ग पर घाट की घूणी में हनुमान मंदिर, रानी सिसोदिया एवं विद्याधर पार्क, दर्शनीय हैं।
आस-पास-
जयपुर से 12 कि.मी. दूर टोंक मार्ग पर सांगानेर एवं पदमपुरा में उत्कृष्ट नक्काशीदार जैन मंदिर दर्शनीय है। करीब 34 कि.मी. दूर अजमेर मार्ग पर बगरू का किला, 32 कि.मी. उत्तर-पूर्व में स्थित वनस्पति से आच्छादित पहाड़ियों के बीच रामगढ़ झील, 40 कि.मी. पर सामोद के महल, शाहपुरा-अलवर मार्ग पर जयपुर से 86 कि.मी. दूर पुरातत्व महत्व का स्थल बैराठ, पश्चिम में 14 कि.मी. पर नमक बनाने की सांभर झील, 80 कि.मी. उत्तर-पूर्व में आगरा रोड़ के समीप आभानेरी के मंदिर प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।