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इंसान को इंसान समझे उसे बुत ना बनाये

गीतांजलि पोस्ट……. रेणु शर्मा (जयपुर) बदलते समय के साथ हमारे शादी-ब्याह के तरीकों में भी बदलाव आया हैं। शादी के लिए तैयार हर नया जोड़ा अपने खास दिन को यादगार बनाना चाहता हैं, वह अपनी शादी कुछ अलग, खास और एकदम ग्रैंड अंदाज में करना चाहता है। शादी से जुड़ी हर छोटी- बड़ी रस्म को वे खास अंदाज में मनाना चाहते हैं। कुछ अलग करने की चाह में कभी-कभी ऐसी व्यवस्था कर देते हैं जो मानवीयता के नाते हमें सोचने को मजबूर कर देता हैं की क्या हम सही रास्ते पर जा रहे हैं ?

क्या हैं वेडिंग प्लानर्स ? शादी की तारीख फिक्स होते ही घर वालो को शादी की चिन्ता होने लगती हैं-शादी का मंडप कैसा होगा, पंडाल कैसा सजेगा, रिसेप्शन कहां और कैसे होगा, दूल्हा-दुल्हन कौन-सी ड्रेस पहनेंगे, वे कैसे तैयार होंगे इत्यादी । क्योकि ये सभी चीजें वे अलग तरीके से, विशेष माहौल में करना चाहते हैं, शादी के दिन को न सिर्फ अपने लिए बल्कि सभी मेहमानों के लिए भी यादगार बना देना चाहते हैं। इन सभी व्यवस्थाओं को संभालने का काम आजकल वेडिंग प्लानर्स ने ले लिया है। इंडस्ट्री-एक्सपर्ट्स का मानना है कि वर्तमान समय में भारत में वेडिंग प्लानिंग इंडस्ट्री का बाजार 1,90,000 करोड़ रुपये का है। देश-भर में वेडिंग प्लानिंग इंडस्ट्री विकसित हो गयी है जो शादी-ब्याह में दूल्हा-दुल्हन से लेकर मेहमानों के मंनोरजन के लिये भी नये-नये तरीके तलाशते रहते हैं।

वेडिंग प्लानर्स द्वारा किये जाने वाले नये प्रयोग देखने में आकर्षक लगने के साथ-साथ आयोजन की शोभा बढा देते हैं आयोजन में चार चॉद लगा देते हैं लेकिन जरा विचार करीये क्या मानवीय दृष्टिकोण से यह उचित हैं ? क्योकि एक तरफ पशु अत्याचार कानून के तहत भारत के पारम्परिक खेल जैसे- घुडदौड, बैल दौड, तांगा दौड पर पांबदी लगायी जा रही हैं वहीं दूसरी ओर वेडिंग प्लानर्स द्वारा मानवों पर अत्याचार किया जा रहा हैं । मानवीय अत्याचार का ऐसा उदाहरण आजकल की शादीयों में देखा जा सकता हैं।

आयोजनों के रोचक प्रयोग– ऐसा ही कुछ दिल्ली, जयपुर की कुछ शादीयों में देखने को मिला। शादी के विभिन्न प्रकार की सजावट के साथ मेहमानों के मनोंरजन करने के लिये लडके लडकीयों को काम में लिया जाने लगा हैं, विवाह स्थल पर विशेष जगह लडकीयो को विशेष मुद्रा में बुत बनाकर खडा कर दिया जाता हैं, या बैठा दिया जाता हैं जो अपनी विभिन्न मुद्राओं से मेहमानों के आकर्षण का केन्द्र होती हैं। ऐसी ही कुछ मुद्राये हैं जैसे- पानी के पोण्ड में एक कोने पर लडकी को खडा कर देते हैं जिसके सिर और हाथों की अंगुलियों से पानी की धार गिर रही होती हैं, जिसे अधिक आकर्षक बनाने के लिये लडकी अपने हाथों की अंगुलियों ओर सिर को घूमाती हैं और मुस्कराती हैं तो किसी कोने में लडकी को मछली की पोशाक पहना कर, पानी की रानी यानि जल परी बनाकर एक निश्चित मुद्र में बैठा दिया जाता हैं तो कही सर्कस के खिलाडी के जैसे करतब दिखाने वाला बना कर लडकी को रस्से पर झूला दिया जाता हैं। ये सारे प्रयोग आयोजन को रोचक और विशेष बनाने के लिये किये जाने लगे हैं।

मानवीय दृष्टिकोण– मानवीयता के दृष्टिकोण से देखा जाये तो आकर्षक और मनोंरजन के लिये कि गयी गतिविधियों में मानवाधिकारेां का हनन किया जा रहा हैं। विभिन्न करतब दिखाने वाली लडकीया और बुत बनाकर बैठायी गयी लडकीया लगातार एक ही मुद्रा में बिना खाये-पिये 4-5 घण्टे तक रहती हैं, झरने में खडी लडकी जिसके हाथों मे दस्ताने पहनाये गये हैं जिनसे पानी गिरता रहता हैं, जरा सोचिये यदी उसकी आखों में कुछ गिर जाये तो वो कैसे निकालेगी ? यदी उसे टॉयलेट जाना हो तो वो कैसे जायेगी क्योकि जिस प्रकार उन्हे सजाया जाता हैं वो बिना किसी की सहायता के चल भी नही सकती।

वेडिंग प्लानर्स को चाहिये कि आयोजन को रोचक बनाने में मानवीय संवेदनाओं, मानवीय जरूरतों का ध्यान रखते हुए आयोजन को कार्यान्वित करे। इंसानों को बुत नही बनाये क्योकि सभी इंसान में जान होती हैं वो जिन्दा होता हैं, सबको जीने का अधिकार हैं। आयोजन को रोचक, मनोंरजक और खाश बनाने के और भी तरीके हैं यदी उपरोक्त प्रयोग ही करने हैं तो इसके लिये इंसान नही रोबोट या बुत का प्रयोग किया जा सकता हैं।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र

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  • 12 Comments to इंसान को इंसान समझे उसे बुत ना बनाये

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