ऊंची आवाज में बोलने और धौंस जमाने वाले वकीलों की खैर नहीं-SC

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अदालत में सनवाई के दौरान धौंस जमाने और ऊंची आवाज में बोलने वाले वकीलों की अब खैर नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे वकीलों के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार कर लिया है. शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह का आचरण बेहद शर्मनाक है और इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हाल के दिनों में कुछ बेहद महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के दौरान कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ ऊंची आवाज में बोलने और न्यायाधीशों पर कथित रूप से धौंस जमाने की घटनाएं देखने को मिली थीं. इससे सुप्रीम कोर्ट बेहद खफा हो गया है और वकीलों को सख्त लहजे में चेतावनी दी है.

बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वकीलों का ऐसा आचरण बेहद शर्मनाक है और इसको कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. दरअसल, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल के मालिकाना हक और दिल्ली-केन्द्र के बीच विवाद जैसे मामलों की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा ऊंची आवाज में बोलने की बढ़ती घटनाओं से नाराज है.

इन मामलों की सुनवाई के दौरान हुई उद्दंडता

शीर्ष अदालत ने कहा कि बुधवार को जो कुछ दिल्ली-केन्द्र प्रकरण में हुआ, वह उद्दंडता थी और जो इससे एक दिन पहले अयोध्या प्रकरण में हुआ, वह तो और भी बड़ी उद्दंडता थी. चीफ जस्टिस के अलावा संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं. यह संविधान पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ विवाह करने पर पारसी महिला की अपनी धार्मिक पहचान खत्म हो जाती है?

अयोध्या मामले में इन  वकीलों ने दी ऊंची आवाज में दलीलें

अयोध्या मामले में पांच दिसंबर को कपिल सिब्बल, राजीव धवन और दुष्यंत दवे सहित अनेक वरिष्ठ वकीलों ने इसकी सुनवाई जुलाई 2019 तक टालने का अनुरोध करते हुए बहुत ही ऊंची आवाज में दलीलें पेश की थीं और इनमें से कुछ ने तो वाकआउट करने तक की धमकी दे डाली थी. इसी तरह बुधवार को दिल्ली-केन्द्र के बीच विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान राजीव धवन ने कुछ दलीलें दीं, जिनकी पीठ ने सराहना नहीं की.

ऊंची आवाज में बोलना सिर्फ अयोग्यता को दर्शाता

बृहस्पतिवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि अब कुछ भी हो जाए, न्यायालय में ऊंची आवाज में बोलना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. वकीलों को परंपरागत रूप से न्याय के मंत्री कहा जाता है. दुर्भाग्य से वकीलों का एक छोटा समूह सोचता है कि वे अपनी आवाज तेज कर सकते हैं और अधिकार के साथ बहस कर सकते हैं. इस तरह से आवाज बुलंद करना सिर्फ अयोग्यता और अक्षमता ही दर्शाता है.

ऊंची आवाज में बहस संवैधानिक भाषा के अनुरूप नहीं

चीफ जस्टिस ने कहा कि बार के कुछ वरिष्ठ सदस्य ऊंची आवाज में बहस करते हैं. न्यायलय ने कहा कि जब वकील इस तरह से बहस करते हैं, जो संवैधानिक भाषा के अनुरूप नहीं है, तो हम बर्दाश्त करते हैं. परंतु अगर बार काउंसिल खुद को नियंत्रित नहीं करेगा, तो हम कब तक कदम नहीं उठाएंगे? उन्होंने कहा कि हमें इसे नियंत्रित करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.

गोपाल सुब्रमणियम ने  उठाया मुद्दा

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब पारसी धर्मान्तरण मामले में पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमणियम ने न्यायालय में वकीलों के ऊंची आवाज में बोलने का मसला उठाया. उन्होंने कहा कि वरिष्ठ वकीलों द्वारा जोर-जोर से बोलने की प्रवृात्ति बेहद गंभीर है और वकीलों को संयम बरतने के साथ ही न्यायिक संस्थान के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए.

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