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सरकार की मजबूरी समझिए,बजट को मत कोसिए इनके कर्मों को कोसिए

GEETANJALI POST…….. (सुबोध चंसौरिया) बजट में हर वर्ग कि नापसंदगी का पूरा ध्यान रखा गया है किसी को कुछ नहीं दिया गया पर मोदी और जेटली जी देते तो तभी न जब कुछ जेब में होता, पैसा तो संबित पात्रा के पिताजी ने कुकर्मों में उड़ा दिया तो किसी भी वर्ग को राहत कैसे मिलती।

ये चिंदी चोरी का बजट है जिसे उसी रूप में समझिए और एक उदाहरण लीजिए,कल पेट्रोल डीज़ल की कीमत में एक्साइज ड्यूटी में कमी की बदौलत 2 रू की कमी का शगूफा दिनभर चला और शाम को पता चला कि इतने ही रू का सेस बढ़ा दिया गया। इस एक निर्णय से सरकार की माली स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। एक्साइज ड्यूटी में केन्द्र और राज्य का हिस्सा होता है मतलब उस 2 रू में से राज्य को भी आर्थिक हिस्सा मिल रहा था जबकि सेस का पूरा कर संग्रह केन्द्र सरकार के पास रहता है जब सरकार मात्र 1 रू के लिए इस स्तर पर उतर आए तो उस सरकार की जेब की हालत का सहज अंदाज़ लगाया जा सकता है।

इस सरकार ने बड़ी ही बदनीयत से पेट्रोल डीजल पर 7 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा कर जनता को लूटा था परिणामत: उससे भी ज्यादा पैसा सरकार की जेब से नोटबंदी के घोटाले को दबाने में निकल गया,रही सही कसर जीएसटी के कुप्रबंधन ने पूरी कर दी।वास्तव में सरकार की जेब में कुछ है ही नहीं जो जनता को दिया जा सके।सरकार ने इनकम टैक्स स्लैब में कोई छूट नहीं दी,स्टैंडर्ड डिडक्शन भी बेमानी है क्योंकि 1% सेस बढ़ा दिया गया है। किसानों की आमदनी लागत का डेड गुना करने की बात कही गई है जबकि हकीकत ये है कि पिछले चार वर्ष में मिनिमम सपोर्ट प्राइस में मात्र 6 से 10% तक की ही वृद्धि हुई है।
ये पूरी सरकार निहायती कुप्रबंधन में फंसी है और ऊपर से इनके आका को तानाशाही की हद तक अहंकार विद्यमान है।

(लेखक के अपने विचार है)

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