कुछ अलग से देखने के लिए कर्नाटक घूमें

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GEETANJALI POST ………. (डॉ. प्रभात कुमार सिंघल – लेखक एवं पत्रकार, कोटा)

भारत के दक्षिण भाग में स्थित कर्नाटक राज्य के उत्तर में महाराष्ट्र, उत्तर-पश्चिम में गोवा, आन्ध्र प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में तमिलनाडु, दक्षिण-पश्चिम में केरल, पश्चिम में अरब सागर एवं लक्षद्वीप समुद्र से जुड़ा हुआ हैं। कर्नाटक राज्य की स्थापना 1 नवम्बर 1956 को की गई तथा बैंग्लोर को इसकी राजधानी बनाया गया। राज्य का क्षेत्रफल 191791 वर्ग कि.मी. तथा जनसंख्या 61095297 है। राज्य की साक्षरता दर 85 प्रतिशत है। कर्नाटक को पहले मैसूर राज्य कहा जाता था जिसका नाम 1973 में बदलकर कर्नाटक कर दिया गया। यहां कावेरी, शरावती, मालाप्रभा एवं तुंगभद्रा प्रमुख नदियां हैं। बांदीपुर वन्यजीव अभ्यारण्य, नागरहोल एवं मुदुमलई राष्ट्रीय उद्यान प्रमुख हैं। राज्य का सबसे ऊँचा पर्वत मुलयानगरी पहाड़ है जो चिक्कमगलुर जिले में स्थित जिसकी ऊँचाई 6329 फीट है। प्रशासनिक दृष्टि से राज्य को 30 जिलों में बांटा गया है। कन्नड़ यहां की अधिकारिक भाषा है। अन्य भाषाओं में कोंकणी, कोडव टक तथा उर्दू भी बोली जाती हैं।
आर्थिक रूप से यह राज्य कृषि के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योगों रूप में अपना योगदान प्रदान करता है। राज्य की 56 प्रतिशत जनसंख्या कृषि सम्बन्धित गतिविधियों में लगी है। खेती अधिकांश दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। राज्य में चावल, रागी धान, ज्वार, मक्का, दाल, तिलहन, कपास, गन्ना, तम्बाकू एवं मिर्च आदि फसलें की जाती हैं। यहां काजू, नारियल एवं सुगन्ध इलायची के बागान पाये जाते हैं। इन पर आधारित खाद्य प्रसंस्करण ईकाईयां स्थापित हैं। कर्नाटक राज्य जैव प्रौद्योगिकी में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य से भारत के कुल फूल उत्पादन का 75 प्रतिशत से भी अधिक योगदान है। यहां से सजावटी पौधे और फूल विश्व के कई देशों को निर्यात किये जाते हैं। देश की 350 से अधिक जैव प्रौद्योगिकी संस्थाएं यहां संचालित हैं। राज्य का सबसे महत्वपूर्ण उद्योग रेशम का है। भारत के लगभग 4 हजार करोड़ रेशम उद्योग का अधिकांश भाग इस राज्य से आता है। बैंग्लोर सिल्क और मैसूर सिल्क विश्व प्रसिद्ध है।
अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले राजधानी बेंगलूर में हिन्दुस्तान मशीन टूल्स, हिन्दुस्तान ऐयरोनाटिक्स लि., भारत हैवी इलेक्ट्रीकल्स लि., नेशनल एरोस्पेस लेबोरेट्रीज, इण्डिय टेलीफोन इण्ड्रीज एवं भारत अर्थ मूवर्स लि. आदि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग स्थापित हैं। यहां भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, केन्द्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान, केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, भारत इलेक्ट्रोनिक्स लि., मैंग्लोर रिफाइनरी एण्ड पेट्रोल केमिकल्स लि. जैसे प्रमुख विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र बेंगलूर की पहचान बन गये हैं। वर्ष 1980 के दशक से बेंगलूर में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष रूप से उन्नति हुई। एक अनुमान के आधार पर कर्नाटक से करीब 4 हजार आईटी फर्म संचालित हैं। इनमें विप्रो एवं एमफोसिस जैसी कई बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय राज्य में स्थित हैं। भारत के कई प्रमुख बैंकों के कार्यालय भी राज्य में स्थापित हैं।
सांस्कृतिक दृष्टि से कर्नाटक बहुविध सांस्कृतिक क्षेत्र है। नृत्य, संगीत, नाटक एवं घुमक्कड़ कथावाचक यहां की सांस्कृतिक विशेषताएं हैं। शास्त्रीय नृत्य की अपनी विशिष्ट शैली है। मैसूर नृत्य शैली के भरतनाटयम यहां जत्ती तयम्मा जैसे लोगों के प्रयासों से आज विश्व पटल पर पहुँच चुकी हैं। वीरागेस, कमसेल, कोलाट एवं डोलुकुनिता यहां की अन्य प्रचलित नृत्य शैलियां हैं। पुरन्दरदास को कर्नाटक संगीत पितामह की उपाधी दी गई है। संगीत के अनेक प्रसिद्ध कलाकार भीमसेन जोशी, बसवराज राजगुरू, गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर एवं सवाई गंधर्व इस धरती की शान हैं, जिसमें से कुछ को पद्मविभूषण एवं कालीदास सम्मान अलंकरणों से सुशोभित किया गया है। मैसूर चित्रकला शैली प्रमुख चित्र शैली है जिसने देश को तंजावुर कोंडव्य, सुंदरैया, बी. वेंकटप्पा जैसे सुनामधन्य चित्रकार दिये हैं। राजा रवि वर्मा के बनाये धार्मिक चित्र पूजा अर्जना के लिए न केवल भारत में वरन् विश्व में प्रयोग में लाये जाते हैं। धार्मिक दृष्टि से आदि शंक्राचार्य, रामानुजाचार्य, सामाजिक क्षेत्र के बसव, अक्का महादेवी और अलाम प्रभु की राज्य को महत्वपूर्ण देन रही। यहां इस्लाम, बौद्ध एवं पुर्तगाली संस्कृति भी देखने को मिलती है। कर्नाटक में मैसूर का दशहरा उत्सव अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। कर्नाटक राज्य का राज्योत्सव नाड हब्बा प्रमुख उत्साह से बनाया जाता है। कर्नाटक में प्रमुख त्यौहार उगादि (कन्नड़ नववर्ष) मकर संक्रान्ति, गणेश चतुर्थी, नाग पंचमी एवं दीपावली आदि मनाये जाते हैं।
मैसूर
बैंगलोर से 140 कि.मी. दूर वोदयार राजाओं की राजधानी मैसूर ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक सुन्दरता के लिए पहनी पहचान बनाता है। यहां कर्नाटक राज्य का गौरवपूर्ण अतीत महलों, मीनारों, गुम्बदों, मंदिरों में झलकता है। यहां सुन्दर बाग-बगीचे, रंग-बिरंगे फूल, गुलाब, चमेली, कस्तूरी, जैसमिन की महक एवं चंदन के वृक्ष सैलानियों को आकर्षित करते हैं। मैसूर में कई स्थल दर्शनीय हैं।
महाराजा पैलेस-मैसूर का महाराजा पैलेस द्रविड़, पूर्वी और रोमन स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। यह महल दुनिया के दस प्रसिद्ध महलों में गिना जाता है। बताया जाता है कि पहले यह महल चन्दन की लकडिय़ों से बना था जो एक घटना में क्षतिग्रस्त हो गया और वर्तमान महल का नया निर्माण कराया गया। पहले के महल को ठीक कराकर उसे संग्रहालय में बदल दिया गया। महल एक बड़े दुर्ग के समान नजर आता है। जिसके गुम्बद सोने के पतरों से सजे हैं। महल में बने कल्याण मण्डप अर्थात् विवाह मण्डप छतें रंगीन शीशे से बनी हैं और फर्श पर चमकदार पत्थर के टुकड़े लगे हैं। महल में दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास बने हैं। बहुत से कक्षों में चित्र और राजसी हथियार रखे गये हैं। लकड़ी की बारिक कारीगरी वाले बड़े-बड़े दरवाजे और छतों में लगे खूबसूरत झाड़-फानूस महल की शोभा का बढ़ाते हैं। यहां 200 किलो शुद्ध सोने का बना राज सिंहासन दशहरे के अवसर पर प्रदर्शनी के लिए रखा जाता है। महल में एक खूबसूरत गुडिय़ा घर दर्शनीय है जिसमें गुडिय़ों का विशाल संग्रह देखने को मिलता है। यह महल प्रात: 10 बजे से सायं 5.30 बजे तक खुला रहता है। अवकाश के दिनों में महल को शाम 7 से 9 बजे तक रोशनी से सजाया जाता है।
जग मोहन महल
महल का निर्माण 1861 ई. में महाराजा कृष्ण राज बोदयार ने करवाया था। यह मैसूर की सबसे पुरानी इमारतों में माना जाता है। तीन मंजिलें महल को आर्ट गैलेरी का रूप दे दिया गया है। यहां अनेक पेन्टिंग मूर्तियां, वाद्य यंत्र व प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा के चित्रों का खूबसूरत संग्रह देखने को मिलता है। यह महल सिटी बस स्टेशन से 10 मिनट की दूरी पर स्थित है। महल प्रात: 8.30 बजे से सायं 5.30 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।
चामुण्डा पहाड़ी -मैसूर से 13 कि.मी. दूर नैसर्गिक सौन्दर्य के बीच स्थित चामुण्डा पहाड़ी मैसूर का एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है। 12 वीं शताब्दी में निर्मित चामुण्डेश्वरी मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। यह मंदिर देवी दुर्गा की राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। देवी की प्रतिमा शुद्ध सोने से बनी हुई है। द्रविड़ शैली में बना यह मंदिर सात मंजिला है, जिसकी ऊँचाई 40 मीटर है। मुख्य मंदिर के पीछे महाबलेश्वर का एक हजार साल पुराना छोटा सा मंदिर बना है। पहाड़ की चोटी से मैसूर का दृश्य मनोरम नजर आता है। पहाड़ी के रास्ते में काले ग्रेनाईट पत्थर से बने विशाल नन्दी के दर्शन होते हैं। चामुण्डा हिल्स के नीचे की ओर बने ललित महल को अब होटल में तब्दील कर दिया गया है।
सेंट फिलोमेना चर्च-यह चर्च भारत के सबसे बड़े एवं प्रमुख चर्चो में गिना जाता है। इसका निर्माण 1933 ई. में करवाया गया था। मैसूर से 3 कि.मी. दूरी पर कैथ्रेडल रोड़ पर स्थित चर्च का निर्माण गौथिक शैली में किया गया है। यहां संत इन संत की तीसरी शताब्दी की प्रतिमा स्थापित है। चर्च की 175 फीट जुड़वा मीनारें दूर से ही दिखाई देती हैं। दीवारों पर ईसा मसीह के जन्म से लेकर पुर्नजन्म तक के जीवन की विभिन्न घटनाओं पर आधारित काँच की पेन्टिंस लगी हुई हैं। अब इस चर्च को सेंट जोसेफ चर्च के नाम से जाना जाता है। चर्च दर्शकों के लिए प्रात: 5 बजे से सायं 8 बजे तक खुला रहता है।
जीआरएस फैंटेसी पार्क -करीब 30 एकड़ क्षेत्रफल में फैला जीआरएस पार्क मैसूर रेलवे स्टेशन से 5 कि.मी. दूरी पर स्थित है। यह मैसूर का एक मात्र अम्यूजमेंट वॉटर पार्क है। यहां पानी के खेल, रोमांचक सवारी और बच्चों के लिए तालाब आकर्षण का केन्द्र हैं। पार्क सोमवार से शुक्रवार प्रात: 10.30 बजे से सायं 6.00 बजे तक खुला रहता है। अवकाश के दिन सायं 7.30 बजे तक खुलता है।
चिडिय़ाघर-विश्व के प्राचीन चिडिय़ाघरों में मैंसूर के चिडिय़ाघर का नाम आता है। इसका निर्माण राजकीय संरक्षण में 1892 ई. में करवाया गया था। चिडिय़ाघर में 40 देश-विदेशों से लाये गये जानवर रखें गये हैं। शेर यहां का प्रमुख आकर्षण है। इसके अलावा हाथी, दरियाई घोड़ा, सफेद मोर, गैंडे और गोरिल्ला भी यहां देखने को मिलते हैं। यहां के बगीचे बहुत खूबसूरत हैं। चिडिय़ाघर परिसर में बनी करंजी झील में बड़ी संख्या में सर्दीयों में प्रवासी पक्षी आते हैं। यहां एक जैविक उद्यान भी है जहां भारतीय और विदेशी करीब 80 से अधिक प्रजातियां देखने को मिलती हैं। चिडिय़ाघर प्रात: 8 बजे से सायं 5.30 बजे तक खुला रहता है। मंगलवार के दिन यहां अवकाश रहता है।
दशहरा उत्सव-मैसूर का दशहरा पूरे भारत वर्ष में अपनी पहचान बनाता है। करीब 10 दिनों तक चलने वाला उत्सव चामुण्डेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक एवं विविध आयोजन के किये जाते हैं। उत्सव के अन्तिम दिन बैंड बाजे के साथ सजे हुए हाथी देवी की प्रतिमा को पारम्परिक रूप से विधि के अनुसार बन्नी मंडप तक ले जाते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को देखने के लिए देश-विदेश के लोग बड़ी संख्या में यहां आते हैं।
श्रवणबेलगोला -मैसूर से 84 कि.मी. दूरी पर इन्द्रागिरी पर्वत स्थित श्रवणबेलगोला जैनियों का एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां मोक्ष प्राप्त करने वाले बाहुबली प्रथम तीर्थंकर थे। यहां पर उनकी 983 ई. में स्थापित की गई प्रतिमा 57 फीट ऊँची है। इसका निर्माण राजा राजमल्ल के सेनापति चामुण्डे राव ने नेमिचंद्राचार्य की देख-रेख में बनवाया था। श्रवणबेलगोला नामक कुण्ड, पहाड़ी की तराई में स्थित है। इस स्थान पर 12 वर्ष में एक बार महामस्तकाभिषेक का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में देश भर के श्रद्धालु भाग लेते हैं।
बेंग्लूर-कर्नाटक के खूबसूरत एवं प्रसिद्ध शहर बेंग्लूर की स्थापना 1537 ई. में कैंपे गौड़ा ने की थी। उस समय मिट्टी की चिन्नाई वाले एक छोटे से किले का निर्माण कराया गया था। दो शताब्दियों के बाद हैदर अली ने पुन: निर्माण कराया और टीपू सुल्तान ने सुधार कार्य कराये। पुराने किले के अवशेष आज भी देखे जा सकत हैं। यह शहर आई.टी. क्षेत्र में अपना विशेष स्थान रखता है तथा अनेक दर्शनीय स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
नन्दी हिल्स- बेंग्लूर के एन.आर. कॉलोनी स्थित नन्दी हिल्स एक खूबसूरत पर्यटक स्थल है। बताया जाता है कि टीपू सुल्तान यहां सैर गाह के लिए आता था। यहां द्रविड़ शैली में बना बुल टेम्पल विशेष रूप से दर्शनीय है। मंदिर का निर्माण 1537 ई. में विजय नगर के शासक कैंपे गौड़ा ने करवाया था। मंदिर में स्थित नन्दी की मूर्ति 15 फीट ऊँची और 20 फीट लम्बी है। यह मंदिर बसवनगुड़ी में बना होने से इसे बसवनगुड़ी मंदिर भी कहा जाता है।
गंगाधरेन्श्वर मंदिर-बसवनगुड़ी के समीप स्थित गंगाधरेन्श्वर मंदिर भगवान शिव एवं माता पार्वती को समर्पित है। मंदिर में एक प्राकृति गुफा भी है। यह मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण कैम्पे गौड़ा ने करवाया था। मकर संक्रांति के दिन यहां बड़ी संख्या में भक्तगण आते हैं।
इस्कोन मंदिर-इंटरनेशनल सोसायटी और कृष्णा द्वारा निर्मित मंदिर की इमारत खूबसूरत इमारतों में गिनी जाती है। यहां मुख्य मंदिर राधा और कृष्ण को समर्पित है। मंदिर आधुनिक और दक्षिण भारतीय वास्तु कला का मिश्रित रूप है। मंदिर में बहु दृष्टि सिनेमा थिएटर एवं वैदिक पुस्तकालय बनाया गया है। बेंग्लूर में इस्कॉन के 6 मंदिर बने हैं। उक्त मंदिर के साथ-साथ कृष्ण-बलराम, चैतन्य प्रभु और नित्यानन्दा, वैंकटेश्वरा, प्रहलाद नृसिंह एवं श्रीला प्रभुपादा के मंदिर बने हैं। उत्तर बेंग्लूर के राजा जी नगर स्थित कृष्ण-राधा का मंदिर दुनियां का सबसे बड़ा इस्कॉन मंदिर है।
टीपू का किला टीपू पैलेस एवं किला बेंग्लूर के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में आता है। इसका निर्माण 1537 ई. में कैंपे गौड़ा ने करवाया था, जिसे आगे चलकर हैदर अली एवं टीपू सुल्तान ने पूर्ण करवाया। यह महल टीपू सुल्तान का ग्रीष्मकालीन निवास था। महल के सामने बगीचे एवं लोन बने हैं। यह पूरे राज्य में निर्मित खूबसूरत महलों में सुमार है। यहां ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह भी देखने को मिलता है।
बेंग्लूर पैलेस-कर्नाटक के महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों में करीब 800 एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह महल इंलैण्ड के वाइंड सर महल की तरह नजर आता है। महल का निर्माण 1880 ई. में किया गया। शहर के बीचों-बीच स्थित पैलेस गार्डन में यह महल सदशिव नगर और जया महल के मध्य स्थित है। ऊपरी तल पर बना दरबार हॉल देखते ही बनता है तथा दीवार को ग्रीक, डच और प्रसिद्ध राजा रवि वर्मा की पेटिंस से सजाया गया है। महल के आंतरिक भाग की डिजाईन व वास्तु शिल्प देखेते ही बनती है।
विधानसभा भवन-डॉ. अम्बेडकर रोड़, सेशाद्रिपुरम में स्थित नियो-द्रविडियन शैली पर आधारित वास्तु कला से निर्मित विशाल मंदिर जैसी इमारत वाला 46 मीटर ऊँचा विधानसभा भवन बेंग्लूर के प्रमुख पर्यटक स्थलों में माना जाता है। इस भवन की लम्बाई 213 मीटर एवं चौड़ाई 106 मीटर है। इसे देखने के लिए पूर्व अनुमति लेनी होती है। यह भवन देश के सबसे बड़ा विधानसभा भवन है। यह भवन अवकाश के दिनों में एवं रविवार को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है। रात्रि को रोशनी में सजे भवन की छंठा मन भावन होती है। यह बेंगलूर सिटी जंक्शन से 9 कि.मी. की दूरी पर है। भवन के चारों ओर हरे-भरे सुन्दर लॉन बने हैं।
लाल बाग
लाल बाग को वनस्पति उद्यान के रूप में पहचाना जाता है। यह बाग देश के खूबसूरत वनस्पतिक बगीचों में गिना जाता है। अठारहवीं शताब्दी में इसका निर्माण हैदर अली और टीपू सुल्तान ने करवाया था। यहां कई वृक्ष 100 साल से भी अधिक पुराने देखने को मिलते हैं। उद्यान में झील, फव्वारें, रोज गार्डन एवं डीयर पार्क आकर्षण के केन्द्र हैं। झील में नोकायन की सुविधा भी उपलब्ध है। लन्दन के क्रिस्टल पैलेस से प्रभावित होकर यहां एक ग्लास हाउस भी बनाया गया है, जिसमें स्थाई पुष्प प्रदर्शिनी आयोजित की जाती है। बेंगलूर के दक्षिण में स्थित यह उद्यान 240 एकड़ में फैला है ओर यहां ट्रॉपिकल पौधों का विशाल संग्रह है एवं वनस्पतियों की एक हजार से ज्यादा प्रजातियां देखने को मिलती हैं। सरकार ने इसे 1856 ई. में बॉटनिकल गार्डन घोषित किया था। लाल बाग की चट्टानें करीब तीन हजार वर्ष प्राचीन मानी जाती हैं। यह गार्डन दर्शकों के लिए प्रात: 6 बजे से सायं 7 बजे तक खुला रहता है।
कब्बन पार्क
बेंग्लूर में गांधी नगर के समीप स्थित कब्बन पार्क हालाकि लाल बाग से छोटा है परन्तु खूबसूरती में किसी भी प्रकार कम नहीं है। यहां हीरे के आकार के मछलीघर में कई प्रकार की रंग-बिरंगी मछलियां देखने को मिलती हैं। करीब 300 एकड़ में फैले इस पार्क में छ: हजार पौधों के साथ की 68 किस्में तथा 96 प्रजातियों के पौधे पाये जाते हैं। यहां रोज गार्डन, पब्लिक लाईब्रेरी, कलादीर्घा एवं एक संग्रहालय भी बनाया गया है। इसे बेंगलूर का सिटी गार्डन भी कहा जाता है। इसका निर्माण 1864 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कब्बन ने करवाया था। इसीलिए उसके नाम पर इस उद्यान का नाम कब्बन पार्क रखा गया।
नेहरू प्लैनेटेरियम
पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम पर बना नेहरू प्लैनेटेरियम बेंगलूर सहित देश के पाँच शहरों में स्थित है। बेंग्लूर में नगर निगम द्वारा इसकी स्थापना 1989 में की गई थी। प्रदर्शिनी हॉल में तारा मण्डल एवं आकाश गंगाओं का रंग-बिरंगा दृश्य प्रोजेक्टर के माध्यम से दिखाया जाता है। यहां एक सांइस सेन्टर और विज्ञान पार्क भी बने हैं। इनका उपयोग खगोल विज्ञान की जानकारी प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है।

बायोलॉजिकल पार्क
बेंगलूर शहर से करीब 21 कि.मी. दूर स्थित है बन्नरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क में विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी देखने को मिलते हैं। यहां सफारी से आगन्तुकों को जंगल की सैर कराई जाती है। मुक्त वातावरण में पशु-पक्षियों को विचरण करते हुए देखना और उनकी अठखेलियां आने वालों को लुभाती हैं।

विश्वेश्वरैया औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकीय संग्रहालय
महान इंजिनियर एवं विद्वान सर.एम. विश्वेश्वरैया की स्मृति में कस्तूरबा रोड़ पर स्थित विश्वेश्वरैया औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकीय संग्रहालय आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है। यहां परिसर में एक भाप चलित इंजन तथा हवाई जहाज प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में इंजन हॉल, इलेक्ट्रोनिक प्रौद्योगिकी दीर्घा, किम्बे कागज-धातु दीर्घा, विज्ञान दीर्घा एवं बाल विज्ञान दीर्घा दर्शनीय हैं। मुख्य आकर्षण मोबाईल विज्ञान प्रदर्शन है जो पूरे शहर में साल भर किया जाता हैं। यहां सेमीनार और वैज्ञानिक विषयों पर फिल्म शो के आयोजन किये जाते हैं।

गांधी भवन
बेंग्लूर में कुमार कुरूपा मार्ग पर स्थित गांधी भवन महात्मा गंाधी की स्मृति में बनाया गया एक दर्शनीय स्थल है। इस भवन में गांधी जी के बचपन से लेकर उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक के चित्रों को दर्शाया गया है। गांधी जी के द्वारा लिखे गये पत्रों की प्रतिकृतियों का संग्रह के साथ-साथ उनकी खड़ाऊ, पानी पीने के लिए मिट्टी के बर्तन आदि सामग्री का प्रदर्शन किया गया है।

फिल्म सिटी
बेंग्लूर- मैसूर मार्ग पर वंडरला से 2 कि.मी. दूर स्थित इनोवेटिव फिल्म सिटी बच्चों और बड़ों के लिए आकर्षण का महत्वूर्ण स्थल है। यह पर्यटकों के लिए प्रात: 10 बजे से सायं 6.30 बजे तक खुला रहता है। यहां इनोवेटिव स्टूडियों, म्यूजियम, 4 डी थियेटर, टाडलर डेन, लुईस तसौद वैक्स म्यूजियम एवं थीम बेस्ड रेस्टोरेंट आकर्षण का केन्द्र हैं। डायनोसोर वर्ल्ड में डायनोसोर की प्रतिमूर्ति, भूतहा महल एवं मिनीएचर सिटी देखना भी अपने-आपमें अद्भुत अनुभव है। मिनीएचर सिटी में विश्व के प्रमुख अजूबें और स्थानों की प्रतिमूर्तियां बनाई गई हैं।
शहर से 89 कि.मी. दूरी पर मद्रास रोड़ स्थित कोलार की सोने की खानों को देखने का भी रोमांचकारी अनुभव होता है। इन खानों को देखने के लिए पूर्व अनुमति लेनी होती है।

बीजापुर
बीजापुर कर्नाटक का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्व का पर्यटक स्थल है। यहां का विख्यात गोल गुम्बद का व्यास 44 मीटर और ऊँचाई 51 मीटर है। मकबरे का खास पहलू है कि यह बिना किसी सहारे के बनाय गया है। आदिल शाही वंश के सातवें शासक मोहम्मद आदिल शाह का यह मकबरा बीजापुर का मुख्य आकर्षण है।
बीजापुर की जुमा मस्जिद को भारत की सबसे विशाल और प्रथम मस्जिद कहा जाता है। मस्जिद का क्षेत्रफल 10 हजार 810 मीटर है जिसमें 9 विशाल तोरण बने हैं। मस्जिद में सोने से लिखी पवित्र कुरान की एक प्रति रखी गई है। मस्जिद का निर्माण आदिल शाह के काल में 1557 से 1686 के मध्य किया गया। शहर के पश्चिमी किनारे पर बना इब्राहिम रोजा का एक खूबसूरत मकबरा भी दर्शनीय हैं। इस मकबरे से ताजमहल बनाने की प्ररेणा भी ली गई। यहां कि दीवारे व पत्थर की खिड़कियां आकर्षण का केन्द्र है। इसके समीप ही एक मस्जिद भी बनी है। मध्य काल में बनी 55 टन वजन एवं 14 फीट लम्बी मलिक-ए-मदान तोप एक चबूतरे पर रखी गई है, जिसका अग्र हिस्सा सिंह के आकार का बना है दर्शनीय है। इस तोप को ट्रॉफी के रूप में 1549 ई. में बीजापुर लाया गया था।
16 वीं शताब्दी में बीजापुर का किला अपनी भोगोलिक स्थित के कारण सैलानियों को आकर्षित करता है। महाराजा प्रताप सिंह के छोटे भाई राव शक्ति सिंह द्वारा बनाये गये किले को अब हेरिटेज होटल तब्दील कर दिया गया है। किला वन्य जीव अभ्यारण्य के समीप है जहां तेन्दुआ, नील गाय, हिरण, जंगली सूअर आदि पशु विचरण करते हुए दिखाई देते हैं। बीजापुर के गगन महल, आनन्द महल एवं असर महल भी दर्शनीय हैं। बीजापुर का निकटतम हवाई अड्डा बेलगाम में 205 किलो मीटर पर है। रेल एवं बस सेवाओं से जुड़ा है।

कुर्ग
बेंग्लूर से 200 कि.मी. एवं मैसूर से 120 कि.मी. दूरी पर स्थित कुर्ग में प्रवेश करने पर बांस एवं चंदन के वृक्ष झूमते हुए नजर आते है। यहां की हरी-भरी घाटियां, काफी के बागान, झिलमिलाते झरनें, आकर्षक झीलें, कुर्ग का प्राकृतिक उपहार हैं। कर्नाटक के इस खूबसूरत पर्वतीय स्थल की सुन्दरता देखते ही बनती है। यहां सैलानी ट्रेकिंग, फिशिंग, सफारी, बोटिंग एवं गोल्फ खेलों का आनन्द ले सकते हैं।
मदकेरी किला यहां शिल्प का खूबसूरत उदाहरण है। यहां से सूर्यास्त का नजारा विशेषकर देखने लायक होता है। भारत के स्कॉटलैण्ड के नाम से मशहूर खूबसूरत पहाड़ी स्थल से कावेरी नदी निकलती है। यहां आबी जल प्रपात आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। इसके शीतल जल में नहाने का मजा ले सकते हैं। किले में महल,एवं ओमकारेश्वर मंदिर आदि दर्शनीय है। कुर्ग जिले का मंदकेरी जिला मुख्यालय भी हैं। दर्शनीय स्थलों में बेलकुपा पुनर्वास सागवान, आबूसन, यूकेलिप्टिस, रोसवुड आदि वृक्षों की प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर है। जंगलों में रंग-बिरंगे पक्षी देखने को मिलते हैं। कुर्ग में नजारायापटना में हाथियों के प्रशिक्षण का केन्द्र है। हाथियों के प्रशिक्षण की कला देखने योग्य है। नागराहोल राष्ट्रीय उद्यान दक्षिण भारत का प्रमुख अभ्यारण्य है। यहां पहले राजाओं की शिकारगाह हुआ करती थी। आज यहां हाथी, बाघ एवं चीतों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध है। अन्य वन्यजीव भी इसमें देखने को मिलते हैं। यहां सफारी का आनन्द भी उठाया जा सकता है।
कुर्ग में कुसालनगर एक अच्छा पिकनिक स्पॉट है। इसके आप-पास वीर भूमि, निसर्गधाम, तिब्बती मॉनेस्ट्री, स्वर्ण मंदिर एवं हरंगी बांध दर्शनीय स्थल है। कुर्ग में ब्रह्मगिरी पर्वत पर इर्पू नामक एक पवित्र स्थान है। जिसके समीप ही लक्ष्मण तीर्थ नामक नदी बहती है। यह नदी इर्पू जल प्रपात में गिरती है। यहां प्रतिवर्ष शिवरात्री के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कक्काबे एशिया का सबसे बड़ा शहद उत्पादक स्थल है। यहां लोग इग्गुप्पा मंदिर के कारण आते हैं। यह कुर्ग का सबसे प्रमुख मंदिर है। यहां पर शहद के फार्मों को देखना एक अलग ही अनुभव प्रदान करता है। कुर्ग प्रकृति से प्रेम करने वालों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।

हम्पी
विजय नगर साम्राज्य की मध्यकालीन राजधानी हम्पी तुंगभ्रद्रा नदी के तट पर स्थित हैं। यहां आज बिखरे हुए खण्डरों को देखकर लगता है कि किसी समय यहां समृद्धशाली सभ्यता निवास करती थी। यहां के स्मारकों को यूनेस्कों ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है। हम्पी का विशाल क्षेत्र गोल चट्टानों के टीले में फैला हुआ है। घाटियों और टीलों के बीच 500 से अधिक स्मारक चिन्ह मौजूद हैं। इनमें मंदिर, महल, तहखानें, जलखण्डर, पुराने बाजार, शाही मण्डप, गढ़, चबूतरें, राजकोष आदि असंख्य चिन्ह पाये जाते हैं।
नि:संदेह हम्पी में बिठाला मंदिर सबसे उत्कृष्ट एवं शानदार स्मारकों में है। इसके मुख्य हॉल में लगे 56 स्तम्भों को हथेली से थपथपाने पर उनमें संगीत लहरी सुनाई देती है। बिठाला मंदिर में पत्थरों में तराशी गई जानवरों की मूर्तियां देखने योग्य हैं। विरूपाक्ष मंदिर का गोपुरम तथा छतों और दीवारों पर विजय नगर साम्राज्य के समय की पेन्टिंग, महाभारत की घटनाओं एवं विष्णु के अवतारों को दर्शाया गया है। मंदिर के सामने हॉल के पूर्वी हिस्से में सुन्दर नक्काशी का पत्थर का बना एक रथ दर्शनीय है। इसके अग्र भाग पर विष्णु के वाहन गरूड़ की मूर्ति लगी है तथा इसके पहिये पत्थर के बने हैं। बताया जाता है कि यह रथ पत्थर के पहियों से चलता था। इस स्थान से कुछ दूरी पर विष्णु के अवतार नृसिंह की 21 फीट ऊँची मूर्ति बनी है। हम्पी में अनेक आश्चर्य देखने को मिलते हैं। खुदाई में मिले रानियों के लिए बने स्नानगार मेहराबदार गलियारों, झरोखेदार छज्जों और कमल के आकार के फव्वारों से सुसज्जित थे। इसके अलावा कमल महल और जनानखाना भी ऐसे ही आश्चर्यो में हैं। हाथी खाने के प्रवेश द्वार और गुम्बद मेहराबदार बने हुए हैं। विजय नगर शासन के दौरान 1336 से 1570 के मध्य इन स्मारकों का निर्माण कराया गया। यहां 41.5 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में करीब 1600 स्मारक पाये जाते हैं। अधिकांश स्मारक हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। यहां जैन मंदिरों व मुस्लिम मस्जिद और कब्र के स्थान भी बने हैं। यहां के स्मारक द्रविड़ शैली तथा भारतीय-इस्लामिक शैली के उदाहरण हैं। यहां हेमकुट पहाड़ी स्थल पर गणेश की पत्थर की मूर्ति बनी है। हेमकुट से वापस लौटते समय रास्तें में हजारा राम मंदिर महल का मुख्य मंदिर है। विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते महिला-पुरूष तथा रामायण की कथा के दृश्य वाले मंदिर का द्वार अलंकृत एवं सुन्दर है। यहां एक संग्रहालय भी बनाया गया है।

श्रीरंगपट्टनम्
मैसूर राज्य के समय श्रीरंगपट्टनम मैसूर की राजधानी था। यहां का किला प्राचीन किलों में माना जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से टीपू सुल्तान ने इसे अपनी राजधानी बनाया यह बेंगलूर से 127 कि.मी. की दूरी पर है। कावेरी नदी से घिरा होने के कारण इसकी प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है। यह एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। यहां लोग-बाग विशेष कर रंगनाथ स्वामी मंदिर, जामा मस्जिद, रामपार्ट, दरिया दौलत महल एवं बाग तथा संग्रहालय देखने के लिए आते है। दरियात दौलत बाग का निर्माण टीपू सुल्तान ने 1784 ई. में करवाया था। यह उसका ग्रीष्मकालीन महल था। यहां का गोल गुम्बज भी दर्शनीय है।

गोकर्ण
गोकर्ण हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा एक खुबसूरत समुद्रीय तट है। यहां के समुद्र तट कम लोगों द्वारा जाने जाते हैं। यहां का वातावरण शांत और स्वच्छ रहता है। यह तट सैलानियों के लिए उनके समय को शांति से बिताने का एक अच्छा स्थल है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान शिव का जन्म गाय के कान से हुआ था और इसी कारण इस स्थान का नाम गोकर्ण रखा गया। गोकर्ण में खजूर और नारियल के पेड़ों के बीच साफ-सुथरी रेत और नीला चमकता पानी लिये हुए चार समुद्र तट दर्शनीय है। इनमें सबसे लोकप्रिय गोकर्ण बीच तथा ओम बीच है। ओम बीच का आकार कुदरती तौर पर ओम के आकार का है। पेराडाईज एवं हॉफ मून बीच भी शानदार और रमणिक है।