संस्कृत का गौरव वापस मिले

16
76

गीतांजलि पोस्ट … (भूपेन्द्र सोनी,दिव्य ज्वाला न्यूज़, जयपुर) राजस्थान की सरकार संस्कृत को खत्म करने की नीयत से एक ऐसा आदेश निकाल चुकी है इसमें पहले नियम यह था की वरिष्ठ उपाध्याय विधालय में शास्त्री या आचार्य किया हुआ जो व्यक्ति होता था वही प्राचार्य पद के योग्य होता था ।
अब नए नियम के तहत इस अनिवार्यता को सरकार दरकिनार करते हुए अब संस्कृत विधालयों के प्राचार्य के लिये, अब संस्कृत विभाग में प्राचार्य एवम किसी भी उच्च पद पर सामान्य शिक्षा किया हुआ व्यक्ती भी योग्य माना जायेगा । जो की संस्कृत को हमारी संस्कृति पर गहरा आघात है इस तुगलकी फैसले को सरकार बिना किसी शर्त के वापस ले और वापस पुराने नियम ही लागू करे। नए नियम के मुताबिक़ तो एक उर्दू पढ़ा हुआ मुस्लिम उम्मीदवार भी इन पदों के योग्य माना जाएगा और संस्कृत विधालय में प्राचार्य बन सकेगा।
अतः संस्कृत विधालयों में शिक्षा का सभी विषयों का माध्यम अनिवार्य रूप से संस्कृत को ही पुनः लागू किया जावे।

क्यों की राजस्थान में संस्कृत को घर में आग घर के चिरागों से ही लगी है यह तो सर्व विदित है की विभीषण,और जयचंद हर युग में जन्मते रहे है और जन्मते रहेंगे संस्कृत का प्राचीन सवरूप अब मांगने से नहीं छीनने से ही इसका गौरव वापस मिलेगा और इसके लिये मेरा सभी संस्कृत के पुरोधाओं ,संस्कृत प्रेमी, संस्कृत साधक,और साधु संतों ,मठाधीशो और महामंडलेश्वरों को भी संघर्ष के लिये सड़क पर उतरकर इस आंदोलन मे साथ देना होगा तभी इसे न्याय मिल सकेगा।
मुझे तो दुःख इस बात का होरहा है की धर्म की नीतियों पर धर्म की ही पताका उठाकर चलने वाली धर्मपरायण सरकार की सर परस्ती में यह सब होरहा हो और सरकार धृतराष्ट्र की भूमिका अदा करती है व दुशासन सरीखे लोग ही संस्कृत एवम् संस्कृति का चीर हरण अपने हाथो कर रहे हो ? तो फिर अपराधी कौन ?? सरकार या सरकार के वो चाटुकार रहनुमा !!!! जो हमारी प्राचीन संसकृति को पलीता लगाने के लिये हाथो मे दियासलाई लेकर बेठे है। इन सब हालातों को तो देख कर यही आभास हो रहा है की आने वाले कल को फिर एक नये महाभारत के लिये शंखनाद करना पड़े ….????