पांच तीर्थ है भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद

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गीतांजलि पोस्ट( श्रेयांस)…… वृक्षों की पूजा हमारे देश की समृद्ध परंपरा और जीवनशैली का अंग रहा है. वैसे तो हर पेड़-पौधे को उपयोगी जानकर उसकी रक्षा करने की परंपरा है. लेकिन वटवृक्ष या बरगद की पूजा का खास महत्व बताया गया है.
बरगद का धार्मिक महत्व-जहां तक धार्मिक महत्व की बात है, इस वृक्ष की बड़ी महिमा बताई गई है. वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु व अग्रभाग में शिव का वास माना गया है. यह पेड़ लंबे समय तक अक्षय रहता है, इसलिए इसे ‘अक्षयवट’ भी कहते हैं. अखंड सौभाग्य और आरोग्य के लिए भी वटवृक्ष की पूजा की जाती है.
अक्षयवट के पत्ते पर ही प्रलय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कण्डेय को दर्शन दिए थे. देवी सावित्री भी वटवृक्ष में निवास करती हैं. प्रयाग में गंगा के तट पर स्थि?त अक्षयवट को तुलसीदासजी ने तीर्थराज का छत्र कहा है. वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था. तब से यह व्रत ‘वट सावित्रीÓ के नाम से जाना जाता है.

सौभाग्य व सुख-शांति की प्राप्ति-उज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है. शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य व स्थायी धन और सुख-शांति की प्राप्ति होती है. संयोग की बात है कि इसी दिन शनि महाराज का जन्म हुआ. सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की.

पांच तीर्थ वटवृक्ष-बरगद को वटवृक्ष भी कहा जाता है. सनातन धर्म में वट-सावत्री नाम का एक त्योहार पूरी तरह वट को ही समर्पित है. पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक बताया गया है. ये हैं- अक्षयवट (प्रयाग -उत्तर प्रदेश, कुरुक्षेत्र -हरियाणा), पंचवट (नासिक- महाराष्ट्र, वंशीवट (वृंदावन-उत्तर प्रदेश), गयावट(गया- बिहार) और सिद्धवट (उज्जैन- मध्य प्रदेश). कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता.

एक और विशेष वट है गृद्धवट – सोरों, शूकरक्षेत्र, कासगंज , उत्तर प्रदेश। यह भगवान वाराह की मोक्षभूमि और गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म भूमि है। कहते हैं हर की पौड़ी में विसर्जित अस्थियाँ तीसरे दिन ही इस स्थान पर आते ही रज बन जाती हैं।इस स्थान पर पितृ पूजन का विशेष महत्त्व है।
भगवान शिव जैसे योगी भी वटवृक्ष के नीचे ही समाधि लगाकर तप साधना करते थे (बालकांड/रामचरितमानस)

तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।
बैठे वटतर, करि कमलासन।।

आयुर्वेद में बरगद का महत्व-कई तरह रोगों को दूर करने में बरगद के सभी भाग काम आते हैं. इसके फल, जड़, छाल, पत्ती आदि सभी भागों से कई तरह के रोगों का नाश होता है.

पर्यावरण की रक्षा में उपयोगी-वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करने और ऑक्सीजन छोडऩे की भी इसकी क्षमता बेजोड़ है. यह हर तरह से लोगों को जीवन देता है. ऐसे में बरगद की पूजा का खास महत्व स्वाभाविक।

भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष- प्रलयकाल में जब सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तब भगवान माधव-मुकुंद बालरूप में जहाँ निश्चिंत शयन करते दिखाई दिए थे, वह वटवृक्ष का एक पत्ता ही था- ऐसा पुराण बताते हैं- ‘जगत वंटे तं पृथुमं शयानं बालं मुकुंदं मनसा स्मरामि’। गीता में भगवान ने कहा है कि मैं वृक्षों में वट वृक्ष हूँ। वटवृक्ष की अनश्वरता, उसकी सुदीर्घ- जीविता इसे धार्मिक- आध्यात्मिक संदर्भों से जोड़ती है। सावित्री-सत्यावन की कथा में मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की जो अभिलाषा अभिव्यक्त हुई थी, उसे लोकमानस ने वट-सावित्री-कथा से जोडकऱ अमरत्व की प्राप्ति की दिशा में धार्मिकता से सम्पन्न कर दिया है। प्रयाग में संगम के पास एक अक्षयवट अभी भी विद्यमान है जिसकी छाया में तमाम ऋषि पर्व पर एकत्रित हुए थे और भारद्वाज ऋषि ने उस पावन रामकथा को सुनाया था, जिसे तुलसीदास ने लोकभाषा में निबद्ध किया था। तुलसी दास कथा के आरंभ में इस वटवृक्ष का गुणानुवाद करना नहीं भूले थे। प्राचीन ऋषि जब सृष्टि की चर्चा करते थे, तो उनको यही वटवृक्ष उपयुक्त अप्रस्तुत के रूप में मिलता था, जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे की ओर कल्पित की गईं थीं। वटवृक्ष की महिमा लौकिक भी है। इतिहास, लोककथा, आयुर्वेद, वनस्पतिशास्त्र आदि में इसकी चर्चा फैली हुई है। दैनिक जीवन में जब लोक किसी प्रेरणादायी व्यक्ति, संरक्षण, आचार्य का विवरण देना चाहता है, तो उसके व्यक्तित्व को ‘वटवृक्ष’ कहकर संतुष्ट होता है। नागार्जुन जैसे जुझारू तथा लोक से एकरस रचनाकार के लिए लोक ‘बाबा बटेसरनाथ’ के बिना अधूरा है।

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