एक रानी के ख्वाब का आईना बूंदी को बनाया आकर्षक

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गीतांजलि पोस्ट …(डॉ.प्रभात कुमार सिंघल,कोटा)
राजस्थान के बूंदी शहर को खूबसूरत बनाने में रानियों ने भी अहम भूमिका अदा की। यहां  स्थापत्य की अनेक ऐसी मिसाल हैँ जिन से रानियों के स्थापत्य कला के प्रति प्रेम झलकता हैँ। रियासतों के समय स्थापत्य के खूबसूरत नमूने बनाने में राजा अनिरुद्ध सिंह की रानीं नाथावत जी के ख्वाब का आईना है” रानी जी की बावड़ी”।
वर्ष 1699 ईस्वी में उन्होंने इस सूंदर कलात्मक बावड़ी का निर्माण कराया। रानी जी की बाबड़ी का स्थापत्य,मूर्ति शिल्प,बनावट एवम् ढलान लिए सीढ़ियों की संरचना देखते ही बनती है। बावड़ी ऊपर से नीचे की ओर करीब 300 फ़ीट गहराई लिए लंबी है।बावड़ी की चौड़ाई करीब 40 फ़ीट है।बावड़ी के नीचे जल स्तर तक जाने के लिए 150 सीढ़िया उतारनी पड़ती हैँ।
       सीडियो के मध्य भाग में बना आकर्षक तोरण द्वार बावडी का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण है। तोरण द्वार करीब 12 फ़ीट चौड़ी सीढ़ी पर बना है।तोरण द्वार पर हाथियों का शिल्पांकन दर्शनीय है। तोरण द्वार से नीचे आगे चलने पर दीवारो में दशावतार,नवगृह,सरस्वती तथा सिद्धि विनायक गणेश जी की प्रतिमाये उत्कीर्ण हैँ। बावडी के प्रवेश द्वार के बाहर दोनों ओर बनी चार छतरियाँ भी शिल्पकला का सूंदर नमूना हैँ।
    इस आकर्षक बावड़ी के साथ मेढक दरवाजे पर खड़े पहाड़ की चोटी पर बनी”सूरज छतरी” का निर्माण महाराव छत्रसाल की रानी श्याम कुँवर ने तथा दक्षिण की ओर” मोरडी छतरी” का निर्माण रानी मयुरी द्वारा करवाया गया था। पहाड़ी पर बनी ये छतरियाँ बूंदी की सुंदरता में चार चाँद लगती है।
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    नगर के मध्य स्थित नवल सागर के किनारे सूंदर महल एवम् घाट का निर्माण राजा विष्णु सिंह की रानी शोभा ने करवाया था। बूंदी  की जेत सागर झील को खूबसूरत बनाने महाराव सूरजमल की माता जी जयवती का योगदान रहा।उन्होंने झील के किनारे 1568 ईस्वी में पक्की दिवार बना कर खूबसूरत बनाया। फूल सागर तालाब का निर्माण महाराव भोज सिंह की रानी फ़ूल लता ने करवाया था।
   बूंदी की हाड़ी रानी के त्याग एवम् बलिदान की गाथा इतिहास में अमर है। यही नही महिलाओ की कोमल भावनाओ,लुभावनी भाव-भंगिमाएं, मुद्राएं, वेशभूषा, आभूषण, श्रृंगार, प्रेम,उत्सव आदि ने जिस प्रकार बूंदी चित्र शैली में रंग भरे उसे महलों में बनी चित्रशाला में दर्शक अपलक निहारते है।
  बूंदी अरावली की सुरम्य घाटियों के मध्य एक आकर्षक पर्यटन स्थल है जो कोटा से 35 किलोमीटर दूर कोटा-जयपुर् मार्ग पर स्थित है।