आरएसएस को शिक्षा देते मुखर्जी

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Geetanjali Post…

पिछले सप्ताह कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अचानक आरएसएस के दीक्षान्त कार्यक्रम में जाने की खबर ने राजनीतिक जगत में हलचल मचा दी थी, कोई उनके कार्यक्रम में जाने की आलोचना कर रहा था तो कोई उनके इस कदम को सराहना कर रहा था लेकिन जब मुखर्जी ने नागपुर में संघ के समारोंह में स्वयंसेवकों को सम्बोधित करते हुए दो विपरित विचारधाराओं के मध्य सेतु बनाने का काम किया वह वास्तब में तारिफे काबिल था। उन्होने कहा कि विविधता में एकता ही हमारी पहचान हैं राष्ट्रभक्ति किसी एक धर्म या वर्ग की नही होती राष्ट्रप्रेम सभी के लिए है। आरएसएस में कार्य के प्रति जो समर्पित भावना हैं वह किसी एक धर्म या वर्ग के लिये नही होनी चाहिये वह सभी के लिए होती है, भारतीय राष्ट्रवाद में एक सामूहिक भावना है । इसे किसी दायरे में नही बाँधा जा सकता विविधता में एकता ही देश की विशिष्ट पहचान है इसे बनाये रखना ही गौरव की बात है यही शांति व समृद्धि का रास्ता है, नेहरु का राष्ट्रवाद ही सही राष्ट्रवाद है। अचानक मुखर्जी का द्वारा संघ की तारिफ करना कुछ अजीब लगा यह वहीं मुखर्जी हैं जिन्होने 2010 के कांग्रेस के बुराडी अधिवेशन में प्रस्ताव दिया था कि सरकार से कांग्रेस मांग करती हैं कि आतंकियों से आरएसएस और उनके सहयोगी संगठनों के लिंक की जांच हो। लेकिन आज 18 साल बाद ऐसा क्या हो गया खेर जो भी रहा हो मुखर्जी ने जिस प्रकार दो विपरीत विचारधाराओं को देश के अनुकूल स्थितियों के लिये जोडने का प्रयास किया, आरएसएस को शिक्षा देने की कोशिश की एंव कांग्रेस की विचारधारा को आरएसएस तक पहुंचाने का काम किया , इसका असर वर्तमान राजनीतिक वातावरण पर क्या होगा अभी कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन मुखर्जी ने जो कहा वह अपने आप में ऐतिहासिक था।

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