एकमात्र गणेश मदिर जहां विराजित हैं गणेश बाल रूप में

0
439

 जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोंहर-1

गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठकों के लिये इतिहास के झरोखें से नाम से एक विशेष कॉलम बनाया हैें जिसमें पाठकों को देश की ऐतिहासिक धरोंहर जैसे:- 250 साल से अधिक पुराने ऐतिहातिक दुर्ग , विभिन्न धर्मो के धार्मिक स्थल इत्यादी की जानकारियां दी जाती हैं। आज के इस विशेष कॉलम में हमने जयपुर में स्थित अरावली पर्वतमाला के नाहरगढ़ और जयगढ़ किले की पहाडिय़ों के मध्य निर्मित गढ़ गणेश मंदिर के बारे में बताया हैं   “ गढ़ गणेश मंदिर ”  का उल्लेख करती गीतांजलि पोस्ट की सम्पादक रेणु शर्मा की रिपोर्ट……रेणु शर्मा,जयपुर

गढ़ गणेश मंदिर 

भगवान गणेश का परिचय:-

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश का जन्म नहीं हुआ था बल्कि माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगाये हुए उबटन से गणेश को बनाया था क्योंकि सारे गण भगवान शंकर के साथ रहते थे तो पार्वती ने अपने लिये अपने अपने शरीर पर लगाये हुए उबटन से गणेश को बनाया और उसमें जीवन डाला। माता पार्वती द्वारा निर्मित गण गणेश सभी गणों के अधिपति गणपति कहलाते हैं।
एक बार माता पार्वती अपने निवास स्थान पर अकेली थी, तब उन्होने गणेश को आवास की पहरेदारी करने को कहा कि जब तक वो स्नान करके आये तब तक किसी को भी आवास के अन्दर नही आने देना और इतना कहकर स्वंय स्नान करने चली गयी। कुछ समय पश्चात भगवान शंकर आये और अन्दर जाने लगे तब गणेश ने उनको दरवाजे पर रोक दिया , तो शिव ने कहा कि ये तो मेरा आवास स्थान हैं मुझे तो भीतर में जाने दो लेकिन गणेश ने मना कर दिया तो शिव ने गुस्से में आकर गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया । जब पार्वती ने ये देखा तो वह व्याकुल हो गयी तो शिव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होने गणेश के सिर पर गज का सिर लाकर लगा दिया और प्रथम पूज्य का वरदान दिया । इसी कारण किसी भी काम को प्रारम्भ करते है तो पहले गणेश की पूजा की जाती हैं।
अरावली की पहाडिय़ों के मध्य निर्मित :-
गढ़ गणेश मंदिर अरावली पर्वतमाला के नाहरगढ़ और जयगढ़ किले की पहाडिय़ों के मध्य निर्मित हैं जिसका अतुल्य प्राकृतिक सौन्दय देखते ही बनता हैं जो अनायास ही श्रृद्वालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। गढ़ गणेश मंदिर में गणेशजी के दर्शन का समय सुबह 7 बजे से 12 बजे और शाम को 4 बजे से शयन तक रहता हैं।

ganesh

मंदिर के मुख्य मंहत प्रदीप औदिच्य ने जैसा बताया……..जयपुर के राजा सवाई  जयसिंह ने अश्वमेघ यज्ञ करवाने के लिये गुजरात के सिद्वपुर से ब्राहणों को जयपुर बुलाया था। अश्वमेघ यज्ञ और गणेश मंदिर में गणेश स्थापना करने के पश्चात राजा ने उनके पूर्वजों को संकल्पित करके गढ़ गणेश मंदिर दे दिया था , तभी से यह परिवार गढ़ गणेश मंदिर का रख रखाव और यहां की जिम्मेदारी संभालता आ रहा हैं । वर्तमान मंहत प्रदीप औदिच्य यहां के तेरहवें मंहत हैं।
गढ़ गणेश जयपुर के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक हैं:-
हिन्दू धर्म जिसे सनातम धर्म भी कहा जाता हैं। हिन्दू धर्म में कोई नया काम करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती हैं फि र कार्य प्रारम्भ किया जाता हैं इसी परम्परा का निर्वाह करते हुए जयपुर की नींव रखने से पहले जयपुर के राजा सवाई  जयसिंह ने गणेश पूजा की और अश्वमेघ यज्ञ किया।
अश्वमेघ यज्ञ करवाने के लिये सवाई  जयसिंह ने गुजरात के सिद्वपुर से ब्राहणों को जयपुर बुलाया और जलमहल के सामने वैद्यशाला में अश्वमेघ यज्ञ प्रारम्भ किया गया यज्ञ के लिये गणेश की प्रतिमा बनायी गयी थी। परम्परानुसार यज्ञ समापन के पश्चात गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाना था लेकिन राजा ने गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करने की बजाय प्रतिमा को नाहरगढ़ और जयगढ़ के किले की पहाडिय़ों के मध्य उचित स्थान देखकर मंदिर बनवाया और प्रतिमा को उत्तर दिशा में स्थापित करवाया। गणेश स्थापना करने के बाद ही जयसिंह ने जयपुर शहर का नींव रखी। राजा सवाई  जयसिंह गणेशजी के रोजाना दर्शन करना चाहते थे अत: उन्होने गढ़ गणेश मंदिर में गणेश प्रतिमा इस प्रकार को उत्तर दिशा में स्थापित करवाया जिसे सीटी पैलेस के चन्द्र महल से से वो गणेशजी के दर्शन कर सके।
गढ़ गणेश मंदिर की विशेषता:-
– गढ़ गणेश मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा को इस प्रकार विराजित किया गया हैं कि यदी आप जयपुर के सिटी पैलेस के चन्द्र महल से दूरबीन की मदद से देखे तो भगवान के दर्शन कर सकते हैं।
इसमें गणेश जी सपरिवार विराजमान हैं जिसमें उनकी दोनों पत्नियां रिद्वी एंव सिद्वी और उनके दोनों पुत्र शुभ एंव लाभ के साथ इनका वाहन मूसक भी विराजमान हैं। बिना सूड़ के बालक गणेश की प्रतिमा होना इसकी प्रमुख विशेषता यह हैं। गढ़ गणेश मंदिर के अलावा पूरे देश में कहीं भी ऐसा गणेश मदिर नहीं हैं जहां गणेश बाल रूप में हो। गढ़ गणेश मंदिर में गणेश का सपरिवार और बिना सूंड़ के गणेश प्रतिमा का होना इसे अन्य गणेश मंदिरों से अलग करता हैं।
गढ़ गणेश मंदिर के परिसर मे एक टंाका बना हुआ है जो बारीस के पानी से भरता हैं इस पानी से ही गणेशजी की पूजा की जाती हैं । इसके साथ ही मंदिर में फ ोटो लेने पर संख्त पंाबदी हैं । एक साल में 365 दिन होते है साल के दिनो की संख्यां के बराबर ही मंदिर की सीढियां बनायी गयी थी।
उत्सव:-
आषाढ में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को गणेश मंदिर की स्थापना हुई थी इसी स्थापना दिवस को प्रत्येक साल पाटोत्सव के रूप में मनाया जाता हैं। भाद्रपद में गणेश चतुर्थी के बाद पंचमी को यहां मेला भरता हैं। दिपावली के बाद आने वाले वाले पहले बुधवार को यहां अन्नकूट का आयोजन किया जाता हैं। पौषमाह के अंतिम बुधवार को पौषबड़ों का आयोजन होता हैं।
इतिहास के झरोखें से कॉलम आपको कैसा लगा पाठक अपने विचार और सुझाव हमें ईमेल कर सकते हैं।