पत्थर-पत्थर नहीं होते

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रचनाकार- रविकांत अनमोल

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पत्थर-पत्थर नहीं होते ,ये तो ऐसे बदनसीब होते हैं।
जिन्हें ईश्वर ने, ठोकरें खाने के लिए बनाया है ।
कभी हवा, कभी पानी और कभी अपने ही साथियों की
ठोकरें खाते, बेचारे सारी उम्र भटकते रहते हैं
और अंत में उम्र बिता कर रेत हो जाते हैं ।
पत्थर-पत्थर नहीं होते,ये तो सज़ा काटने आई आत्माएँ होते हैं
जिनके लिए ईश्वर ने हर तकलीफ़ का इंतज़ाम किया है
धूप,आँधी,,बारिश,बाढ़, ठोकरें और लानतें
सब कुछ इनके लिए ही होता है ।
सभी कुछ झेलते-झेलते बेचारे पत्थर ?
अपना पत्थरपन भी अंत में गँवा बैठते हैं ।
पत्थर-पत्थर नहीं होते , ये तो टूटी फूटी चट्टाने होते हैं ।
जो कभी हवा कभी पानी के बहाव में आकर
आपस में टकरा-टकरा कर चूर-चूर होते रहते हैं ।
कोई बाहरी ताक़त इन्हें कम ही तोड़ती है ।
ये आपस में ही एक दूसरे को तोड़-फोड़ कर रेत कर लेते हैं।
पत्थर-पत्थर नहीं होते,ये तो मेरे देश के शोषित-शासित लोग होते हैं।
जिन्हें यह भी नहीं पता कि जब पत्थर मिल कर रहते हैं
तो चट्टान कहलाते हैं,
और कोई आँधी,कोई तूफ़ान, कोई बारिश या बाढ़
चट्टान का कुछ नहीं बिगाड़ सकती ।
पत्थर जब एक दूसरे की हिफ़ाज़त में खड़े होते हैं
तो वक़्त की चाल धीमी पड़ जाती है ।
पत्थर-बेचारे अनजान पत्थर सिफऱ् इतना ही जानते हैं
कि पानी या हवा के बहकावे में आकर आपस में टकराना हैं।
मूर्तियां बन कर बैठे अपने ही साथियों से धोखा खाना है ।
अंतत: आपस में टकरा-टकरा कर रेत हो जाना है।
पत्थर-शायद पत्थर ही होते हैं, पगले पत्थर ।