विश्रांत राही

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रचनाकार-उर्मिला फुलवारिया पाली

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जीवन पथ पर चलते -चलते राही स्वयं की परिस्थितियों से थक जाता है तभी उसे आशा की किरण के रूप में जीवन साथी का सानिध्य प्राप्त होने वाला होता है तब थका राही किन -किन ख्वाबो को पूर्णता की आशा के संग उसके समक्ष रखता है विश्रांत राही उन ख्वाबो को सुन्दर लफ्जो के माध्यम से किस प्रकार बया करता है यह इन पंक्तियों में वर्णित है ……………

मुखरित हृदयगत भाव अभिव्यंज्जना विश्रांत राही की
मिले नीड व घरोंदा उर मनमीत हमराही का।
जग में फैला हुआ जाल तिलिस्म सा मोह-माया का
पावनता की बलिवेदी पर हवन कर देना है अपनी काया का।
वितान तले कुछ पलों का अरण्य बसेरा हैं इस जहां में मेरा
नियति इन लम्हों की अटूट बन्धन जुडा रहेगा मुझसे सदा तेरा
ख्वाब मेरा मृसण वपु अम्लान न होगा तेरे पाशो में
तब्दील कर सांसारिकता के घृणास्पद भावों को सुरभि फैला दोगे श्वासो में।
कतूहल मेरा साल हृदय का क्या यहाँ अभिसिप्त मिलेगा
गमगीनताओं की काली घटाओ में आशा का सुमन खिलेगा।
व्यग्रता उद्विग्नताएँ लाखों बसी हुई है इन पलकों में
स्वत्व व अधिकार भी क्या बना रहेगा इन लम्हों में।
नर ने नहीं चाहा कभी देना नारी को स्वयं का अधिकार
पाँव की जूती समझना है उनका यह प्रतिकार।
मेरी दृष्टि में जहां का अर्थ स्वार्थ लोभ वासनाओ का बवण्डऱ
अशमित वासनाओ का शमित नीर का कहाँ आज कमण्ड़ल।
प्रथम अभिलाषा नारी के उर की खाले कसम मेरे सर की
मानवता के पद पर प्रतिष्ठित हो ज्योत्सना लोटा दोगे मन की।