वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप

1990
130
महाराणा प्रताप एक वीर क्षत्रिय, स्वतन्त्रता के पुजारी, आदर्श देश भक्त, त्याग की प्रतिमूर्ति, रण-कुशल, अतुल पराक्रमी, दृढ़ प्रतिज्ञ अवतार थे। जन्मभूमि ही उनके लिए सबसे अधिक प्यारी अमूल्य निधि थी, वही स्वर्ग, वही सर्वस्व थी। आज भी मेवाड़ के पाषाण-खण्ड महाराणा प्रताप के शौर्य और त्याग की कहानी कह रहे हैं। वहाँ की मिट्टी का जर्रा-जर्रा कह रहा है-
”माही ऐहडा पूत जण, जेहडा राणा प्रताप।
अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणैं साँप” ॥
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राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर ई.स. 1540 में हुआ था। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। मेवाड़ की शौर्य-भूमि धन्य है जहां वीरता और दृढ प्रण वाले प्रताप का जन्म हुआ। जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अजर-अमर कर दिया। उन्होंने धर्म एवं स्वाधीनता के लिए अपना बलिदान दिया। 
प्रातः स्मरणीय, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप द्वारा मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षार्थ लड़े गए ऐतिहासिक हल्दीघाटी के जनयुद्ध में मेवाड़ के कई अनाम वीर सपूतों ने मातृभूमि के खातिर बलिदान दिया। 439 वर्ष पूर्व लड़े गए इस अनिर्णायक युद्ध से विश्व में हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास में दर्ज हुआ। महाराणा प्रताप भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहलाये। उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सड़क से कुछ दूर हटकर पहाड़ियों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास का वह प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ 1576 ई. में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। इस स्थान को ‘गोगंदा’ भी कहा जाता है। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुग़ल बादशाह की मैत्रीपूर्ण दासता पसन्द न थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसके फलस्वरूप मानसिंह के भड़काने से अकबर ने स्वयं मानसिंह और जहाँगीर की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।
हल्दीघाटी की लड़ाई 18 जून, 1576 ई. को हुई थी। राजपूताने की पावन बलिदान-भूमि के समकक्ष, विश्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं है। उस शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास और वीरकाव्य का परम उपजीव्य है। भारतीय इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रतिज्ञा के लिए अमर, उदयपुर, मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर ‘मेवाड़-मुकुट मणि’ राणा प्रताप का जन्म हुआ। वे अकेले ऐसे वीर थे, जिसने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं की। वे हिन्दू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे।
महाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम ‘चेतक’ था। इस युद्ध में अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को शक्ति सिंह ने बचाया। यह युद्ध केवल एक दिन चला परंतु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए।
 
मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने भी सभी प्रयास किए। महाराणा प्रताप ने भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढप्रण लिए अमर है।  मेवाड़ की धरती को मुगलों के आतंक से बचाने वाले ऐसे वीर सम्राट, शूरवीर, राष्ट्रगौरव, पराक्रमी, साहसी, राष्ट्रभक्त को शत्-शत् नमन। 
वरिष्ठ पत्रकार अशोक लोढ़ा , नसीराबाद