रिलीज होने से पहले ही विवादों में

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फ़िल्म उड़ता पंजाब रिलीज होने से पहले ही विवादों में फंस गई है। सेंसर बोर्ड ने करीब नब्बे कट लगाते हुए फ़िल्म के टाइटल से “पंजाब” शब्द को हटाने की सलाह दी है। इस विवाद से केंद्र सरकार ने किनारा किया है लेकिन इस फ़िल्म को सेंसर करने का फैसला पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार के एजेंडे के अनुरूप ही है। नई सरकार के आने के बाद जिस तरह से राजनैतिक दबाव बनाकर लीला सैमसन का इस्तीफा करवाया गया और भाजपा के प्रशंसक पहलाज निहलानी को अध्यक्ष बनाया गया यह इंगित करता है कि सेंसर बोर्ड एक राजनैतिक अखाडा है जो सरकार की इच्छानुसार कार्य करता है। हमें ज्ञात है कि डेरा सच्चा सौदा की फ़िल्म को सेंसर बोर्ड ने रिलीज करने से यह कहकर मना कर दिया था कि ये फ़िल्म धार्मिक सदभावना के खिलाफ है लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय भाजपा ने डेरा के साथ जो सच्चा सौदा किया उसके बदले में पहलाज निहलानी ने डेरा की फ़िल्म को रिलीज करने की अनुमति दी।

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समाज को साफ सुथरा सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से 1957 में सिनेमेटोग्राफी कानून के तहत केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) बनाया गया था लेकिन आजकल जिस तरह की अश्लील और फूहड़ फ़िल्में दिखाई जा रही है उससे लगता है कि बोर्ड अपने आदर्शों से कही भटक गया है और इसका मुख्य कारण बढ़ता राजनैतिक हस्तक्षेप है। हम कई बार देखते है कि सरकार अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए किताबों, फिल्मों, चित्रों आदि पर सेंसरशिप या पूर्णतः रोक लगा देती है क्योकिं यह राजनैतिक तौर पर उस सरकार या दल को हानि पहुंचाने वाले होते है और तर्क दिया जाता है कि ये समाज के लिए अच्छा नही है इसलिए सेंसर किया गया है लेकिन दूसरी ओर छोटे पर्दे पर हम देखते है कि विज्ञापनों में खुलेआम अश्लीलता परोसी जा रही है और कहानियों के अभाव में लगभग सभी धारावाहिक भूत-प्रेत की कहानियाँ दिखाकर अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे है लेकिन इस और किसी भी सरकार का ध्यान नही है। 

          सत्तर के दशक में सिनेमा, समांतर और व्यवसायिक दो हिस्सों में विभाजित हुआ था। समांतर सिनेमा में समाज का चित्रण करके सच्चाई को लोगों के सामने रखा जाता था। इस बात में कोई छुपा रहस्य नही है कि पंजाब नशे की आग में जल रहा है और पंजाब का युवा नशे के कारण बर्बादी के कगार पर है। ड्रग्स और अन्य मादक पदार्थों के तस्करी में सरकार में बैठे लोगों के साथ ही अन्य राजनैतिक लोगों के नाम समय समय पर सामने आते रहते है अर्थात वहां नशे को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। पंजाब की नशे की समस्या पर अगर कोई फिल्माकंन हुआ है तो सरकार उसको इसलिए सेंसर नही कर सकती कि पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी अकाली दल की विफलताओं का पता इस फ़िल्म से चलेगा और उन्हें राजनैतिक नुकसान होगा। कुछ दृश्य आपत्तिजनक है तो उन्हें हटाया जा सकता है लेकिन जब फ़िल्म पूरी तरह पंजाब में नशे की समस्या पर आधारित है तो फ़िल्म के नाम में से “पंजाब” शब्द को हटाने का उद्देश्य समझ से परे है। सेंसर बोर्ड का ये कहना कि फ़िल्म में पंजाब विधानसभा चुनाव से सबंधित कुछ भी नही होना चाहिए ये तो साफतौर पर अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है।
ऐसा नही है कि सविंधान में मिली अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर व्यक्ति को कुछ भी करने की आजादी दी जानी चाहिए क्योकिं उस स्वतन्त्रता के साथ कुछ उपबन्ध भी जुड़े है उनका भी हमें ध्यान रखना चाहिए लेकिन ऐसा भी नही होना चाहिए कि उन उपबन्धों के नाम पर सरकार को किसी की भी अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
हम लगातार देख रहे है कि जो संस्थाए सीधे तौर पर सरकार के अधीन नही है उनपर सरकार में बैठे लोगों द्वारा निरन्तर हमले किये जा रहे है। अरुण जेटली ने कैग को हद में रहने को कह चुके है और न्यायपालिका को भी अपनी सीमाओं में रहने की नसीहत दे चुके है। न्यायपालिका के खिलाफ अब तो नितिन गडकरी ने भी मोर्चा खोल दिया है। भाजपा के नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के रिजर्व बैंक के गवर्नर पर तीखे हमले करना भी इसी योजना का हिस्सा है। सेंसर बोर्ड और प्रसार भारती में तो राजनैतिक हस्तक्षेप जगजाहिर है। सरकार में बैठे लोगों के विचारों से हमें समझ आ जाना चाहिए कि स्वतन्त्र संस्थाओं के आने वाले दिन अच्छे नही होंगे।
सूरज कुमार बैरवा
सीतापुरा, जयपुर