दफन होता राजस्थान की वीरता,साहस एंव बलिदान का प्रतिक:चित्तौडग़ढ दुर्ग

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जानिए हमारी ऐतिहासिक धरोंहर-2

गीतांजलि पोस्ट ने अपने पाठकों के लिये इतिहास के झरोखें से नाम से एक विशेष कॉलम बनाया हैें जिसमें पाठकों को देश की ऐतिहासिक धरोंहर जैसे:- 250 साल से अधिक पुराने ऐतिहातिक दुर्ग , विभिन्न धर्मो के धार्मिक स्थल इत्यादी की जानकारियां दी जाती हैं।  आज के इस विशेष कॉलम में हमने चित्तौडग़ढ़ जिले के चित्तौडग़ढ़ दुर्ग के बारे में बताया हैं   “चित्तौडग़ढ़ दुर्ग ”  का उल्लेख करती गीतांजलि पोस्ट के संवाददाता अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट……अश्विनी शर्मा, जयपुर

राजस्थान का गौरव , वीरता और बलिदान का प्रतिक चित्तौडग़ढ़ दुर्ग को मौर्य राजा चित्रांग ने सातवीं शताब्दी में अरावली पर्वतमाला पर बनवाया जो स्थापत्य की दृष्टि से भी निराला दुर्ग हैं जो चित्तौडग़ढ़ के शानदार इतिहास को बताता है। यह हमीर सांगा, कुम्भा जैसे वीर राजाआों की राजधानी भी रहा है। 1303ई0 में महारानी पद्मनी, 1535 ई0 में महारानी कर्मावती तथा 1588 ई0 में महारानी फूल कंवर के नेतृत्व में 46 हजार से भी ज्यादा वीरांगनाओं ने जौहर कर शौर्य वीरता और पराक्रम का परिचय दिया है। पन्नाधाय ने 1530ई0 में अपने पुत्र चंदन का बलिदान कर स्वामी भक्ति की मिसाल कायम की है। वहीं मीरा ने भक्ति की रसधारा बहाकर शक्ति भक्ति और मुक्ति की ऐतिहासिक धरोहर बनाया है।

एक किंवदन्मत के अनुसार पाण्डवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था। इस संबंध में प्रचलित कहानी यह है कि एक बार भीम जब संपत्ति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट होती है। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग का निर्माण करवा दे। भीम ने अपने शौर्य और देवरुप भाइयों की सहायता से यह कार्य करीब-करीब समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ दक्षिणी हिस्से का थोड़ा-सा कार्य शेष था। योगी के ऋदय में कपट ने स्थान ले लिया और उसने यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा, जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी, जिससे वहाँ एक बड़ा सा गड्ढ़ा बन गया, जिसे लोग भी-लत तालाब के नाम से जानते है। वह स्थान जहाँ भीम के घुटने ने विश्राम किया, भीम-घोड़ी कहलाता है। जिस तालाब पर यति ने मुर्गे की बाँग की थी, वह कुकड़ेश्वर कहलाता है।
chittor-3चित्तौड़ दुर्ग की विशेषतायें-गढ़ तो चित्तौडग़ढ़ और सब गढ़ैया यह यही भी हैं क्योकिं यह किला शानदार संरचना 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और लगभग 700 एकड में फ़ैली हुई हैं जो कई विध्वंसों के बाद भी बचा हुआ है। किले तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं हैं किले तक पहुँचने के लिए एक खड़े और घुमावदार मार्ग से एक मील चलना होगा। इस किले में सात नुकीले लोहे के दरवाज़े हैं जिनके नाम हिंदू देवताओं के नाम पर पड़े। इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ साथ रानी पद्मिनी और महाराणा कुम्भ के शानदार महल हैं।किले में कई जल निकाय हैं जिन्हें वर्षा या प्राकृतिक जलग्रहों से पानी मिलता रहता है।

ऐतिहासिक चित्तौड़ दुर्ग को बचाने की मुहिम-

राष्ट्र्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हिन्दू जागरण मंच ने सरकार के खिलाफ जनआंदोलन की चेतावनी दी एंव कहंा कि यह जनआंदोलन चित्तौड़ दुर्ग को बचाने के लिए चलाया जाएगा। मंच के पदाधिकारियों को अफसोस हैं कि जिस गत कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दुर्ग को नष्ट और कमजोर करने की जो पहल की, उसी पर वसुंधरा सरकार भी चल रही है जबकी वह स्वयं उस समुदाय से हैं, जिन्होंने चित्तौड़ के दुर्ग की आन-बान और शान के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी, लेकिन आज वसुंधरा राजे के शासन में ही खान माफिया और बिड़ला औद्योगिक घराने के लोग चित्तौड़ दुर्ग को न केवल ढहाना चाहते हैं, बल्कि इसमें ऐतिहासिक महत्त्व को भी बेच रहे हैं। यदि चित्तौड़ दुर्ग के 10 किलोमीटर के क्षेत्र में खनन कार्य जारी रहा तो यह ऐतिहासिक दुर्ग एक दिन मिट्टी के ढेर में तब्दील हो जाएगा और तब राजस्थान की वीरता, साहस और बलिदान भी दफन हो जाएगा।

हाईकोर्ट का निर्णय-

राजस्थान हाईकोर्ट ने 25 मई 2012 को भंवर सिंह व अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामलें में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा कि चित्तौड़दुर्ग की 10 किलोमीटर की परिधि में किसी भी प्रकार का खनन कार्य न हो। इस परिधि में सरकार ने जो खनन पट्टे जारी कर रखे हैं, उन्हें तत्काल प्रयास से रद्द माना जाए और फिर भी यदि कोई खान मालिक खनन कार्य करता है तो उस पर पांच करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जाए।