एक पिता की खुशी या चिन्ता

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” एक पिता की खुशी या चिन्ता ” में बेटी के जन्म होने के उपरान्त एक पिता की मानसिक हालत को दर्शाया हैं जो विचार एक पिता के दिमाग में घूम रहे हैं।

समाज में महिलाओं और बालिकाओं के साथ बढ़ते अपराधों को देखकर मन दुखी हो जाता हैं और लगता हैं यदी ऐसा ही होना था तो बेटी को पेदा ही क्यों किया जाये । आखिर क्यों अपराधियों के हौसले बुंलद हो रहे हैं , अपराधियों को कानून का कोई खौफ नहीं हैं । एक तरफ जहा सरकार ने बेटी बचाओं अभियान चलाया हुआ हैं वहीं दूसरी और समाज में बेटियों की र्दुगति हो रही है जब सरकार बेटियों की सुरक्षा ही नहीं कर सकती तो सरकार को बेटी बचाओं अभियान को बन्द कर देना चाहिये जिससे बेटियों की र्दुगति तो नहीं हो। पिछले कुछ दिनो में राजस्थान की राजधानी जयपुर में तीन मासूम बालिकाओं के साथ र्दुव्यवहार हो चुका हैं अभी हाल ही में एक पचपन साल के वृद्व ने ढ़ाई साल की बच्ची के साथ र्दुव्यवहार किया । ये तो कुछ ही मामले हैं जो मीडिय़ा के सामने आ गये, ना जाने कितनी बालिकाओं के साथ र्दुव्यवहार होता होगा ? हम सब जानते है कि सारे मामले मीडिय़ा में नहीं आते ।

घर से समाचार आया कि बेटी हुई है पिता बनने की खुशी हो रही थी लेकिन पिता बनने की खुशी के साथ-साथ के दूसरी तरफ एक पिता को बेटी के भविष्य को लेकर चिन्ता भी हो रही थी और तरह-तरह के सवाल उसके दिमाग में आ रहे थे , आखिर कब तक बेटी उसके साथ रहेगी। बेटी उसके साथ हमेशा नही रह सकती एक समय आयेगा जब बेटी के हाथ पिले कर उसे उसके पति के साथ विदा करना पडेगा , आखिर बेटी पराया धन जो हैं। फिर दिल को समझाकर घर जाता हैं और अपनी लाडली के साथ समय गुजारता हैं उसकी सभी आवश्यक्ताओं को पूरी करता हैं। बेटी के तीन साल के होने पर बेटी को पढने के लिये पाठशाला भेजते समय एक पिता को खुशी हो रही हैं कि उसकी बेटी पढ लिखकर अफसर बनेगी लेकिन दूसरी तरफ एक पिता चिन्तित भी हो रहा है अपनी बेंटी की सुरक्षा को लेकर तरह-तरह की बाते पिता के दिमाग में आ रही थी कि वह कैसे रहेगी स्कूल में ? स्कूल का वातावरण कैसा होगा ? उसके दोस्त कैसे होगे ? फिर भी किसी तरह खुद को समझाकर एक पिता अपनी पुत्री को पढने पाढशाला भेजता हैं और बेटी की जरूरतों को पूरा करने में किसी प्रकार की कमी नही रखता आखिर बेटी की स्कूल की पढाई पूरी हो जाती है और बेटी आगे की पढाई करना चाहती हैं वह कॉलेज जाना चाहती हैं और एक पिता कॉलेज के वातावरण को लेकर चिन्तित होता है लेकिन बेटी की जिद के आगे वह झुक जाता हैं और पास के शहर के कॉलेज में बेटी को पढने के लिये भेज देता है। बेटी को कॉलेज में पढने के लिये भेजते हुए एक पिता खुश होने के साथ-साथ दूसरी तरफ एक पिता चिन्तित हो रहा हैं कि अजनबी शहर में उसकी लाडली अकेली कैसे रहेगी ? उसका ध्यान कौन रखेगा ? उसे सुबह कौन जगायेगा ? वहंा का वातावरण कैसा होगा ? अपनी जरूरतों के लिये वह किसे कहेगी ? रोजाना लडकियों और महिलाओं के साथ घटने वाले अपराध जैसे बलात्कार , छेडछाड , हिंसा के वातावरण में अनजान जगह वह कैसे सुरक्षित रहेगी ? बेटी के घर से बाहर रहने पर उसकी सुरक्षा को लेकर भी पिता को चिन्ता हो रही हैं तथा उलटे सीधे सवाल एक पिता के दिमाग में आ रहे है लेकिन बेटी की खुशी के लिये वह खुद अपने आप को किसी प्रकार समझाता हैं और अपनी बेटी को कॉलेज में दाखिला दिलवा देता हैं । कॉलेज की पढाई पूरी होने के पश्चात् बेटी घर आती हैं धीरे-धीरे वह समय भी आ गया जब बेटी को पराया करना हैं क्योकी कॉलेज की पढाई पूरी हो गयी थी । बेटी के लायक घर वर देखकर एक पिता अपनी बेटी की सगाई करता हैं और शुभ मुहूर्त निकलवाकर खुशी-खुशी बेटी का कन्यादान करता है लेकिन कन्यादान करते समय फिर पिता की आखों में पानी आ जाता हैं कैसा होगा बेटी का ससुराल ? कैसा होगा बेटी का पति ? वह कैसे रहेगी वहा ? रोजाना होती दहेज हत्या , घरेलू ंिहसा ,यौन हिंसा , बलात्कार और ससुराल में प्रताडित होती महिलाओं और लडकियों के बारे में सुनकर एक पिता को अपनी बेटी के बारे में चिन्ता हो रही हैं ।

मेरी राय में एक बेटी के पैदा होने पर एक पिता को होने वाली चिन्ता लाजमी भी हैं क्योकिं आज का समाजिक वातावरण ही ऐसा हो गया हैं आने वाला समय ना जाने कैसा होगा ये कहना बहुत ही मुश्किल हैं । दो से तीन साल की बालिकाओं के साथ र्दुव्यवहार का सुनकर अंचभा होता हैं आखिर क्या हो गया हमारे समाज को ? कहा गयी इंसानियत ? चालीस से साठ साल के लोगों द्वारा दो से तीन साल की बालिकाओं को अपनी हवस का शिकार बनाने वालों का दिल जरा भी नहीं पसीजा होगा , ऐसी ही घटना उनकी अपनी नातिन या उनकी पोती के साथ हुई होती तो कैसा उन्हे कैसा लगता ? आखिर क्यों अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं ?अपराध करने वालों को कानून का बिल्कुल भी खौफ नहीं हैं , क्योकि वे जानते है हमारी न्याय व्यवस्था की प्रकिया को कि कितने समय में न्यायालय द्वारा फैसला सुनाया जायेगा , क्योकि हमारी अदालतों में न्याय की प्रकिया घीमी हैं और इसी का फायदा अपराघी उढ़ाते हैं। सामान्यतया हमारे यहंा न्याय की उम्मीद में लोगों की जवानी से बुढ़ापा आ जाता हैं। दूसरी तरफ यदी महिला आयोग की बात करे तो महिला आयोग के तो हाल और भी खराब हैं , यहंा दूर-दूर से पीडि़त महिलाये न्याय की उम्मीद से महिला आयोग आती हैं कि महिला आयोग में उनकी फरियाद सुनी जायेगी , उनको राहत दी जायेगी लेकिन महिला आयोग के कर्मचारियों द्वारा ही पीडि़ताओ के साथ सही व्यवहार नहीं किया जाता साथ ही महिलाओं को झूठी दिलासा दी जाती हैं तो कही महिलाओं को झुठ बोलकर इंतजार करवाया जाता हैं , एक दिन कुछ महिलाए महिला आयोग की अध्यक्ष से मिलना चाहती थी जबकी वास्तव में अध्यक्ष साहिबा ऑफिस के काम से भीलवाड़ा गयी हुई थी फिर भी महिला आयोग के कर्मचारियों द्वारा कुछ महिलाओं को ये कहकर शाम तक बिढ़ाये रखा कि अघ्यक्ष साहिबा आने वाली हैं तो किसी से कहा कि अघ्यक्ष साहिबा अन्दर बेठी हैं अब सवाल ये हैं कि जब महिला आयोग के कर्मचारियों को मालूम था कि अघ्यक्ष साहिबा ऑफिस के काम से बाहर गयी हुई हैं तो पीडि़त महिलाओं को झूठी दिलासा देने से क्या फायदा ? पीडि़त इंसान कहा लगाये न्याय की गुहार ।

रेणु शर्मा