कैसे चढ़ेगे कांटो भरी घाटी मे लाखो श्रद्धालु

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  • जंगली बबूल ने रोका लोहार्गल की 24 कोस परिक्रमा का रास्ता,
  • आखिर कैसे चढ़ेगे कांटो भरी घाटी मे लाखो श्रद्धालु
  •  मालकेत परिक्रमा में तीन दिन शेष
  • प्ररिक्रमा की व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन लग रहा बेसुध

चिराणा(सौरभ पारीक) लोहार्गल की 24 कोसीय परिक्रमा शैखावाटी ही नही अपितु पुरे राजस्थान की भी सबसे बडी परिक्रमा है जिसमें पहाडों की चढ़ाई चढकर लाखो श्रद्धालु इस परिक्रमा को पुर्ण करते है ।पहाडो  में बने संकरे रास्ते की दुर्गम घाटियों मे पत्थर जमा कर सदियों पहले से रास्ता बनाया हुआ है  जिसको हर साल लाखो श्रद्धालु पार कर मालकेत बाबा की 24 कोस(72) किमी. की परिक्रमा पुर्ण करते है ।

पर जब यही रास्ता दुर्गम होने के साथ साथ जंगली बबूल से घिर जाये व बरसात से क्षतिग्रस्त हो  जाये तो ऐसे में कैसे परिक्रमा में आने वाले हजारो वृद्ध इस रास्ते को पार कर पायेंगे  ।
घाटी के रास्ते मे दोनो तरफ लगे ये बबूल सिधे आखों मे आते है जिससे एक व्यक्ति तक को निकलने के लिये काफी  जहमत करनी पडती है। इससे चढ़ाई के साथ साथ श्रद्धालुओं के लिये रास्ता और भी कठीन हो जाता है ।

रास्ता रोके दोनो तरफ खडे है जहरिले काटेंदार बबूल:-जब हमने परिक्रमा  के रास्ते का भ्रमण किया तब हमारे लिये भी वह रास्ता पार करना मुश्किल हो गया ।क्योकी दोनो तरफ रास्ता रोके जहरिले कांटेदार बबूल से  निकलना मुश्किल हो रहा था ।

गौरतलब है की यही रास्ता है जिसमे से सभी को गुजर कर परिक्रमा पुरी करनी है परन्तु इस और किसी का ध्यान नही है । सवाल यह उठता है की तीन दिन बाद लाखो लोग इसी रास्ते से होकर गुजरेंगे पर प्रशासन की इस विषय मे अब तक कोई तैयारी नही दिख रही है इसलिये यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की लोहार्गल परिक्रमा को लेकर प्रशाशन लोहार्गल अतिक्रमण के नाम पर ढोल पिटने के अलावा कुछ नही कर रहा जबकी 72 किलोमिटर के परिक्रमा मार्ग मे जगंली बबूल का कितना अतिक्रमण है इसकी सुध ना तो वन विभाग को है और ना मैला प्रभारीयों को और ना ही पंचायत प्रशासन को ।

किरोडी मे नही रहती रोशनी तक की व्यवस्था

परिक्रमा मार्ग मे तीसरा पडाव किरोडी है जिसमे किसी भी प्रकार की रोशनी व अन्य  व्यवस्थाये तक नही रहती । किरोडी के गंगामाई मंदिर के पुजारी ने बताया की स्थानिय निवासियो द्वारा ही प्रत्येक वर्ष रोशनी व अन्य व्यवस्थाये की जाती है जबकी परिक्रमा मे पंचायत से कोई सहयोग प्राप्त नही होता ।

हर वर्ष होते है हादसे

परिक्रमा मे आये परिक्रमार्थीयों में  प्रत्येक वर्ष किसी ना किसी हादसे में घायल होने के साथ साथ जान तक चली जाती है ।जिसके कई मामले पिछले वर्षो मे सामने आये है ।
पिछले वर्ष सांप के काटने से एक परिक्रमार्थी की मोत हुई थी तो कोट बांध पर मधुमख्खियों के हमला करने से कई लोग घायल हुये थे ।वही सीकर के लसाडिया बास के एक युवक की  चिराणा किरोडी घाटी मे दिल का दोरा पडने से मौत हो गई थी ।जबकी उससे पिछले वर्ष एक औरत को जहरिले जानवर के काटने से मौत हुई थी ।रास्ते मे पर्याप्त रोशनी व्यवस्था ना होने से भी लोग जहरिले जन्तुओ का शिकार हो जाते है ।

हर वर्ष पंचायत उठाती है हजारो का बजट

रास्ते मे जंगली बबूल कटवाने  दुरूस्तिकरण,सफाई के नाम पर पंचायत प्रत्येक वर्ष हजारो का बजट उठा लेती है जबकी काम कुछ भी नही होता । बबूल को काटने का कार्य समाज सेवी व रास्ते मे रहने वाले स्थानिय लोगो द्वारा किया जाता है जबकी पिछले वर्ष ही चिराणा पंचायत द्वारा बबूल कटवाने के नाम पर लगभग 41000/-रूपये का बजट उठाया गया है  जिसका उल्लेख किरोडी मे एक दिवार पर किया गया है ।