जेएनयू जैसे शिक्षा संस्थानों का क्या औचित्य हैं

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रेणु  शर्मा , जयपुर

अपने विवादों से चर्चा में रहने वाली दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में ऐसा क्या हैं जिसके कारण सरकार उसके कारनामों पर तत्काल कार्यवाही नहीं करती ?

हॉल ही में विजयादशमी के मौके पर जंहा पूरे देश में रावण के पुतले फूंके गए, वहीं जेएनयू कैंपस में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को रावण बताकर उनका पुतला बनाया और रावण के जैसे उस पुतले को विजयादशमी के मौके पर फूका गया। ये सिर्फ मोदीजी का नही बल्कि पूरे राष्ट्र का अपमान हैं। जेएनयू में देश के प्रधानमंत्री का पुतला नहीं फूका बल्कि देश के करोड़ो लोगों को रावण मानकर उनका पुतला फूका हैं क्योकि मोदी को देश के करोड़ो लोगों ने चुना हैं प्रधानमंत्री किसी पार्टी के नेता ना होकर राष्ट्र के नायक हैं।

इस तरह से राष्ट्र के नायक को बुराई का प्रतिक रावण मानकर उसका पुतला फूकना क्या एक शैक्षणिक संस्थान के विद्यार्थियों द्वारा किया गया कार्य शोभनीय हैं। इससे पूर्व भी इसी विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उसके साथियों द्वारा देशद्रोही नारे लगाये, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाये गये और पाक के झण्ड़े फहराये गये। इतना ही नहीं जेएनयू ने यौन उत्पीडऩ के मामलों में भी अपनी विशेष पहचान कायम कर रखी हैं । जेएनयू में साल 2015-16 में 39, 2014-15 में 26 और 2013-14 में 25 यौन उत्पीडऩ के मामले सामने आए।

किसी शैक्षणिक संस्थान के विद्याथियों द्वारा देशद्रोही एंव असामाजिक गतिविधिया करना या यौन उत्पीडऩ करना जैसी घटनाये होना, शैक्षणिक संस्थान के द्वारा दी जा रही शिक्षा पर सवाल उठाने को मजबूर करता हैं, कि क्या हम ऐसे संस्कारों के लिये अपने बच्चों को जेएनयू में पढने भेजेगे जंहा देशविरोधी एंव असामाजिक गतिविधिया होती हो?
सरकार स्कॉलरशिप एंव अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के लिये विश्वविद्यालय में पढने वाले विद्यार्थियों पर करोड़ो रूपया खर्च करती हैं ताकि राष्ट्र के भावी निर्माता उत्पन्न हो सके लेकिन यंहा तो देश-विरोधी पैदा किये जा रहे हैं , देश की जनता को ये कभी सहन नहीं करेगी कि उनके द्वारा दी गयी टेक्स की राशि को राष्ट्र -विरोधी गतिविधियों के काम में लिया जावे और असामाजिक प्रवृति वाले नागरिक पैदा किये जावे अत: ऐसे में उचित हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन के ऐसे व्यक्तियों को चिन्हीत कर उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाये या फिर ऐसे विश्वविद्यालय को तत्काल प्रभाव से बन्द कर दे।

जेएनयू की इस प्रकार की देश-विरोधी गतिविधिया एक दिन का परिणाम नही होती बल्कि ऐसी गतिविधियों के लिये लम्बे समय से तैयारी की जाती हैं तभी वो कार्यान्वित होती हैं , जाहिर हैं ऐसी घटनाओं की तैयारिया विश्वविद्यालय परिसर में ही हुई होगी जो विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोग के बिना संभव नहीं हैं। विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर विद्यार्थियों में देशद्रोह के विचार फैलाकर इस प्रकार का धृणित काम करवा रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर इस प्रकार की गतिविधियों को करवाने की अनुमति नहीं दी जा सकती ।

देशद्रोहियों का अड्डा बने जेएनयू के अपराधियों की हिम्मत की दात देनी होगी कि उन्होने मोदी के पुतले को रावण के पुतले की तरह 10 सिर वाला बनाया जिसमें मोदी के साथ-साथ योग गुरु बाबा रामदेव, अमित शाह, साध्वी प्रज्ञा , योगी आदित्यनाथ , आसाराम बापू , नत्थूराम गोडसे , जेनएयू वीसी , ज्ञानदेव आहूजा आदी के चेहरे लगाकर पुतला दहन करने के साथ-साथ बोला कि हमने रावण का नहीं बल्कि पीएम मोदी का पुतला जलाया हैं।

जेएनयू में खुले आम देशद्रोह हो रहा हैं किसी से कुछ भी नही छुपा फिर भी भारत सरकार कोई ठोस कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है। इससे पहले भी दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट ने 3 मार्च को देशद्रोह के केस में जेएनयूएसयू के कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को ये कहकर अंतरिम जमानत दी की सभी आरोपियों ने अंतरिम जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया एंव जांच में पुलिस का पूरा सहयोग दिया है।
देश के प्रधानमंत्री को बुराई का प्रतिक रावण मानकर उनका पुतला जलाने और देश विरोधी नारे लगाने के बाद भी हमारा गृह मंत्रालय तत्काल कोई एक्शन लेने के बजाय दिल्ली पुलिस से मांगी रिपोर्ट माँग रहा हैं। आखिर क्यों जेएनयू के विवादों की सामान्य मामलों के जैसे कार्यवाही होती हैं?

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