आखिर आतंकियों के साथ सहानुभूति क्यों

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रेणु शर्मा , जयपुर

भोपाल की जेल से फरार हुए सिमी के 8 आतंकवादियों को भोपाल पुलिस एवं एटीएस द्वारा मार गिराया गया उसके बाद विपक्षी पार्टीयों पार्टी के नेताओ केजरीवाल , राहुल  गाँधी , मायावती , ममता ममता बनर्जी , दिग्विजय सिंह सहित कुछ लागों द्वारा इस प्रकार बयान दिये जा रहा हैं जैसे वे आतंकवादी ना होकर कोई सामान्य नागरिक हो। हमारा मानना हैं कि भोपाल पुलिस द्वारा किया गया एनकाउंटर उचित था ओर इसमें किसी प्रकार का भी फर्जीवाड़ा नहीं हैं । आतंकवादियों के जेल से भागने पर कोई अनहोनी वारदात होने की आशंका  रहती यदी ये आतंकी एमपी या देश के किसी हिस्से में कोई वारदात कर देते तो उसका जिम्मेदार कौन होता ?

इसी तरह यदी हाफिजसईद एंव उसके साथियों जैसे खूंखार आतंकवादियों को जेल मे ही मार दिया जाता तो कंधार में विमान का अपहरण नही होता ओर नाही विमान के यात्रियों को छोडऩे के बदले हाफिजसईद को काबूल में छोडऩा पड़ता । वही हाफिजसईद एंव उसके साथी आज पाकिस्तान में आंतकियों की फोज तैयार कर रहे हैं ओर भारत के विरूद्व जहर उगल रहे हैं जो हमारे देश के लिये नासूर बना हुआ हैं । अत: आतंकवादियों की पहचान होते ही उनको जेल में भेजने की बजाय उनको जल्द से जल्द मार देना चाहिये । आतंकियों की हिमायत करने वाले कश्मीर के हालातों से सबक क्यों नहीं लेते,  जहा  पिछले चार माह से लोगों ने अपने को घरों में बन्द कर रखा हैं?

आतंकियों ने जेल से निकलने के प्रयास में भोपाल की सेंट्रल जेल के हैड कांस्टेबल रमाशंकर चादव की जिस मर्मम तरिके से हत्या की उसके बारे में विपक्षी नेता कुछ भी नहीं कहते जो उनकी मानसिकता को दर्शाता हैं । ऐसे आतंकी आगे जाकर ना जाने कितने मासूमों को मौत के घाट उतार सकते थे या देश के अन्य किसी हिस्से में कोई वारदात कर सकते थे। हमें एमपी पुलिस का शुक्रिया अदा करना चाहिये की उन्होने आतंकवादियों का एनकाउंटर कर देश को किसी अनहोनी वारदात से बचा लिया ।

विपक्षी पार्टीयों के नेता चिल्ला रहे हैं कि उन्हे आत्मसमर्पण का मौका दिया जाना चाहिये था लेकिन जिन्होने हमारे बहादुर सिपाही को मार दिया क्या उन्हे आत्मसमर्पण का मौका दिया जाना उचित होगा ? जबकि मौके पर पहुंचे गांव वालो के अनुसार उन्हे आत्मसमर्पण का मौका दिया था जिसके बदले में उन्होने गोलिया चलायी । यदी आतंकवादियों को फर्जी तरिके से भी मार दिया जाता तो भी जनता पुलिस के साथ होती ना कि आतंकवादियों के साथ । आतंकवादियों को गोली मारने का लाइव वीडियो देखने के बाद एक सवाल दिमाग में घूम रहा हैं आंतकियो के पास जींस, घड़ी ,टीशर्ट और स्पोर्टस शुज कहां से आए ?  इससे स्पष्ट है की उनके साथियो ने उनको जेल से भागने में उनकी मदद की । आखिर हम पूछते हैं कि जेल मे बन्द आतंकवादियों की सुरक्षा और उनके रहने का खर्चा हम क्यों उठाये ?

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