मल-मूत्र से बन रही है ईको फ्रेंडली खाद

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-रोहित जामवाल पंचकुला-

गीतांजलि पोस्ट………….उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद के पास स्थित ग्राम असालतपुर के एक युवा किसान श्याम मोहन त्यागी ने एक नई तकनीक वाला शौचालय बनाया है और अब इस शौचालय से वे अच्छी कमाई कर रहे हैं।
शौचालय से कमाई???
ईकोसैन शौचालय से सुलभ इंटरनेशनल वाले पैसा दो शौचालय जाओ वाली स्टाइल में नहीं कमा रहे, बल्कि गाँववालों को प्रेरित कर रहे हैं कि वे उनके शौचालय में रोज सुबह आयें, क्योंकि त्यागी जी इस शौचालय के मल-मूत्र को एकत्रित करके उसकी कम्पोस्ट खाद बनाते हैं और उसे खेतों में छिड़कते-बिखेरते हैं, और इस वजह से जोरदार ईको-फ्ऱेण्डल फ़सल ले रहे हैं। त्यागी ने अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग सन् 2006 से ही बन्द कर दिया है। श्याम मोहन त्यागी, जो कि खुद भी इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएट हैं, को दिल्ली के एक एनजीओ द्वारा बनाये जा रहे ईकोसैन तकनीक वाले शौचालयों के बारे में पता चला, तब उन्होंने अपने खेत के एक हेक्टेयर क्षेत्र में टेस्टिंग के तौर पर इसे आजमाने का फ़ैसला किया।
क्या हैं ईको-सैन शौचालय
ईकोसैन शौचालय की सीट की डिजाइन परम्परागत फ़्लश शौचालय से थोड़ी अलग होती है। परम्परागत शौचालय की सीट में मानव मल-मूत्र दोनों एक साथ, एक ही टैंक में जाता है, जहाँ से उसे सीवर लाइन में भेज दिया जाता है, जबकि ईकोसैन तकनीक शौचालय की सीट दो भागों में होती है, इसके द्वारा मल एक टैंक में एकत्रित किया जाता है, जबकि मूत्र अलग टैंक में जाता हैं दोनों आपस में मिलने नहीं चाहिये। एक शौचालय के लिये दो सीटों की आवश्यकता होती है, पहली सीट के नीचे का टैंक जब पूरा भर जाता है, तब उस सीट को चार माह तक बन्द करके मानव मल को सूखने और उसमें बैक्टीरिया और जीवाणु उत्पन्न होने के लिये वैसे ही छोड़ दिया जाता है, तब तक दूसरी सीट उपयोग में लाई जाती है। इसी प्रकार क्रम से अदला-बदली करके एक शौचालय को उपयोग किया जाता है। हाथ-पाँव धोने के लिये व्यवस्था अलग होती है, तात्पर्य यह कि मल-मूत्र और पानी आपस में मिलना नहीं चाहिये। इस शौचालय में उपयोगकर्ता को शौच करने के बाद सिफऱ् एक मुठ्ठी राख सीट के मल वाले छेद में डालना होता है, राख डालने की वजह से मल जल्दी सूख जाता है, उसमें बदबू भी नहीं रहती और मित्र-बैक्टीरिया भी सलामत रहते हैं। इसी प्रकार मूत्र वाले 500 लीटर के टैंक को भी 2 माह के लिये एयर टाइट ढक्कन लगाकर बन्द कर दिया जाता है, ताकि उसमें स्थित अमोनिया बरकरार रहे । दो माह बाद इसमें 1 अनुपात10 के अनुपात में पानी मिलाकर खेतों में (2000 लीटर प्रति हेक्टेयर) छिड़काव किया जाता है। जबकि राख डालने की वजह से सूख कर ठोस चुके मल को खेतों की मिट्टी के कण्डीशनर और उर्वरक क्षमता बढ़ाने के काम में लिया जाता है।
वैज्ञानिक विधि के अनुसार उर्वरक बनता हैं
विज्ञान के अनुसार एक व्यक्ति अपने मल-मूत्र के जरिये एक वर्ष में 4.56 किलो नाइट्रोजन , 0.55 किलो फ़ॉस्फ़ोरस , तथा 1.28 किलो पोटेशियम उत्पन्न करता है। यह मात्रा 200 ङ्ग 400 के एक सामान्य खेत की उर्वरक क्षमता को सन्तुष्ट करने के लिये पर्याप्त है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की एक अरब से अधिक की आबादी का कुल मल-मूत्र लगभग 60 लाख टन होता है, जो कि भारत में रासायनिक उर्वरकों की कुल खपत का एक-तिहाई है।