खुद ही तय करें अमृत उगलें या जहर

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डॉ. दीपक आचार्य

उप निदेशक (सूचना एवं जनसम्पर्क)उदयपुर

मनुष्य का शरीर अपने आप में दैवत्व से परिपूर्ण देवालय भी है और आसुरी शक्तियों का स्थान भी। मनुष्य को इस बात की पूरी स्वतंत्रता है कि वे किसे अंगीकार करे, दैवत्व या राक्षसत्व।

हर इंसान के लिए दोनों तरफ के रास्तों को स्वीकार करने और उन पर चलने के लिए अपार संभावनाएं हैं जिनका अवलम्बन वह कर सकता है। चाहे तो दैवीय गुणों को अपनाए अथवा आसुरी भावों को। इसके लिए वह स्वतंत्र है।

अपनी बुद्धि, बल और विवेक के अनुरूप उसे पूरी छूट दी गई है। मनुष्य भगवान को इसके लिए दोषी नहीं ठहरा सकता। उसके पास सारे द्वार खुले हुए हैं जिनका वह मनमाना उपयोग कर सकता है। इस मामले में भगवान कभी भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। मनुष्य की अपनी सोच और इच्छाएं ही बलवान हैं जो उसे उधर ही ले जाती हैं जिधर मन करता है।

जिन लोगों के आनुवंशिक या पारिवारिक संस्कार सुदृढ़ होेते हैं, वंशानुगत शुचिता का नैसर्गिक प्रवाह बहता रहता है, जिनके संकल्प ताकतवर होते हैं, जीवन लक्ष्य के प्रति समर्पण की श्रृंखला कभी टूटती नहीं और जिनकी जिन्दगी का उद्देश्य लोक मंगल होता है, वे लोग अपना अच्छा-बुरा, लाभ-हानि आदि सब कुछ समझते हैं और आत्म संयम, ज्ञान, त्याग, तपस्या और नैतिक बल के अनुरूप चलते हुए श्रेष्ठ जीवन जीते हैं और खुद के साथ ही जगत का कल्याण भी करते हैं।

लेकिन जिन लोगों की बुद्धि मलीन हो गई हो, पवित्रता, सादगी, समर्पण, संस्कार और मूल्य स्वाहा हो गए हों, उन लोगों में ज्ञान की बजाय अज्ञान का प्रभाव ज्यादा रहता है। ये लोग संयम नहीं रख पाते, मामूली ऎषणाओं के लिए भटक जाया करते हैं और अपने स्वार्थों के पीछे लपकते रहते हैं।

जिन्दगी भर इधर-उधर भटकते हुए ये लोग किसी इंसान या ठिकाने के नहीं हो पाते और अन्ततः अपनी अस्मिता को मिट्टी में मिलाकर निरर्थक जीवन को बोझ लेकर राम नाम सत्य हो जाते हैं।

इंसान के व्यवहार के अनुरूप शरीर की ग्रंथियाँ, अंग-उपांग और सारे अवयव काम करते हैं। हमारा शरीर ही नकारात्मक सोच और अवस्था में जहर उगलता रहता है और सकारात्मक एवं मंगलकारी सोच होने पर अमृत का स्त्राव करता रहता है। यह भी हम पर ही निर्भर करता है कि हम अमृत पाना चाहते हैं अथवा गरल।

जो लोग शरीर से अमृत धाराओं को ग्रहण करना सीख जाते हैं, शरीर को जहर बनाने का वक्त ही नहीं देते, वे लोग जीवन के आनन्द को पाने में सफल हो जाया करते हैं। इस रहस्य को जानने की जरूरत है कि आखिर अपने शरीर से कब अमृत प्रवाह होता है और कब शरीर जहर उगलने लग जाता है।

शरीर के सभी चक्रों का अध्ययन करें तो इस रहस्य को अच्छी तरह समझा जा सकता है। जब हम सकारात्मक सोच से भरे होते हैं, प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, प्रेम और श्रद्धा से भर उठते हैं अथवा किसी न किसी प्रकार की चरम आनंद की अवस्था में होते हैं, कोई हमें प्यार से सहला रहा हो, हमारे लिए जीवन की परम प्रसन्नता को क्षण हो, अपने माता-पिता का स्नेह भरा हाथ हमारे सर पर हो, हम आनंद ही आनंद का अनुभव कर रहे हों या प्रेम, माधुर्य और स्नेहिल संपर्कों की चरमावस्था में हों, उस समय हमारे कण्ठ से कुछ बूँदें नीचे गिरने का आभास होता है।

इस समय बाहरी तौर पर हमें चरम आत्मतृप्ति का बोध होता है और गला संकुचन अवस्था में इस प्रकार दर्शित होता है जैसे कि ऊपर से किसी सूक्ष्म प्रवाह को लेकर नीचे गले के मूल भाग से होकर उदर में प्रविष्ट करा रहा हो। यह अनुभव हर किसी को होता है जब वह किसी भी प्रकार से भीतर से प्रसन्न होता है।

योग की भाषा में समझने का प्रयास करें तो वहाँ खेचरी मुद्रा का जिक्र आता है जिसमें योगीजन अपनी जिह्वा को उठा कर पीछे कण्ठ मूल तक ले जाने का अभ्यास करते हैं और जैसे ही जीभ कण्ठ मूल में प्रवेश कर जाती है, वैसे ही वहाँ से अमृत का प्रवाह होते रहना आरंभ हो जाता है और इससे शरीर दिव्य भावों के साथ पुष्ट हो जाता है।

सामान्यजन आनंद की अवस्था में इसका आंशिक फल प्राप्त कर पाते हैं। यही अमृत शरीर में सर्वत्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हुआ स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर मजबूत बनाता है और दिव्यता लाता है। जो लोग आनंद भाव को हमेशा बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील बने रहते हैं उनमें अमृत का यह प्रवाह अधिक होता है और शरीर को इससे अधिक अमृत की प्राप्ति होती है। यही आयु, बल, यश और सर्वसमृद्धि का मूल बन जाता है। इसलिए जीवन में हमेशा शान्त चित्त रहते हुए आनंद ही आनंद में रहने का अभ्यास स्थापित किया जाना चाहिए।

इसके ठीक विपरीत अवस्था में जब हम क्रोध करते हैं, प्रतिशोध से ग्रस्त हो जाते हैं तब हमारा अपने पर भी बस नहीं रहता और गुस्से में लाल-पीले हो जाते हैं। इस अवस्था में हमारी दाढ़ों से विशेष प्रकार का थूँक निकलना आरंभ हो जाता है और जितने समय हम क्रोध में पागल हुए रहते हैं उतने समय वह अधिक से अधिक निकलता रहता है।

यह ध्यान देने की बात है कि परम प्रसन्नता में जितना अमृत झरता है उससे सौ गुना जहर इस थूँक के माध्यम से हमारी दाढ़ों से झरता रहता है।  इस थूँक को अधिकांश आदतन क्रोधीजन उदरस्थ कर जाते हैं। इससे इनके शरीर में जहर की मात्रा बढ़ जाती है और यह जहर पूरे शरीर में फैल कर व्याधियां, वार्धक्य, ओजहीनता और घृणास्पद शरीर, दुर्गन्ध आदि पैदा करने लगता है।

समझदार लोगों को भी कभी किसी कारण से क्रोध आना स्वाभाविक है। इस अवस्था में दाढ़ों से जो थूँक निकले उसे बाहर थूँक दिया करें और यह प्रयास करें कि क्रोध शांत हो जाए। ऎसा होते ही दाढ़ों से प्रवाह बन्द हो जाएगा और हम शांत होने लगेंगे।

जीवन में हर क्षण यदि आनंद भाव में रहा जाए, शांत चित्त और प्रेम-माधुर्य को अपनाया जाए तो अमृत का प्रवाह हम बढ़ा सकते हैं और इससे हमें फायदा ही फायदा है। आवश्यकता केवल समझने और उन सभी बातों व विषयों से दूर रहने की है जो हमें गुस्सा दिलाती हैं अथवा प्रतिशोध की ज्वाला में भभकाती हैं।