ट्रिपल तलाक और मुस्लिम महिलायें

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रेणु शर्मा,संपादक गीतांजलि पोस्ट…

divतलाक-तलाक-तलाक ये कोई साधारण शब्द नहीं है, ये तीन शब्द किसी को बर्बाद करते हैं तो किसी को आबाद करते हैं। हमारे यहां मुस्लिम समाज में तलाक-तलाक-तलाक शब्द तीन बार बोलो और तोड दो रिश्तों को। यह तलाक देने का कोई नियम नहीं है, ना ही भारतीय संविधान में लिखा गया कोई कानून है, ना ही तलाक देने का ये तरीका कुरआन में है और ना ही रसूल्लाह सल्लाहो ताल्लाअलैह वस्सल्ल्म ने बताया है, साथ ही भारतीय संविधान ने भी महिलाओं को सभी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक अधिकार दिये हैं, फिर भी आये दिन भारतीय मुस्लिम महिलायें इसका शिकार हो रही हैं, क्यों ?

वर्तमान समय में विश्व के बडे 21 मुस्लिम देशों में तीन तलाक के रिवाज पर पूर्णतया पांबदी हैं, फिर भी भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में तीन तलाक से रिश्ते टूट रहे हैं। हमारे न्यायालय ने भी साफ कह दिया है कि तीन तलाक को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जायेगा, फिर भी भारतीय मुस्लिम महिलायें तीन तलाक का शिकार हो रही हैं। समझ नहीं आता ये सरकार की कमी है या समाज की कमी है या खुद महिला की कमी है ? लेकिन हद तो तब हो गयी जब एक शौहर हिना मिया ने अपनी बेगम उमरवी को मोबाईल से तीन तलाक कहकर रिश्ता तोड लिया, तो किसी ने लैटर में तीन तलाक लिखकर रिश्ता तोड दिया, इस प्रकार दिये जाने वाले तलाक पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं करता ?

मुस्लिम समाज में निकाह के समय लडकी से उसकी सहमति ली जाती है, निकाह से पूर्व मौलवी लडकी को दूल्हे के बारे में बताकर पूछता है कि क्या तुम्हे इससे निकाह कबूल है ? जब लडकी तीन बार – कबूल है-कबूल है-कबूल है बोलकर अपनी सहमति देती है, तभी निकाह की रस्में होती हैं। यदि उस समय कोई लडकी अपनी सहमति नहीं देती है, तो निकाह नहीं होता और बारात बिना दुल्हन के लौट जाती हैं ।ऐसे भी बहुत उदाहरण हैं जब लडकी ने मौलवी द्वारा निकाह कबूल है पूछे जाने पर अपना जवाब ना में दिया, तो निकाह नहीं हुआ और दूल्हे को बिना दुल्हन के वापस लौटना पडा। जिस प्रकार निकाह के दौरान लडकी की सहमति ली जाती है, तो फिर निकाह के पश्चात तलाक देने का अधिकार सिर्फ पुरुष को ही क्यों होता हैं कि जब उसका मन किया तीन बार तलाक बोलकर रिश्ता तोड लिया। उस समय वह अपनी बेगम से यह नहीं पूछता कि तुम्हे तलाक कबूल है या नहीं ? जिस प्रकार शादी से पहले लडकी की सहमति लेकर निकाह सम्पन्न होता है, उसी प्रकार तलाक के लिए  लडकी की सहमति क्यों नहीं ली जाती ?

इन सवालों का जवाब तलाश करने के लिये कुछ दिनों से तलाक-तलाक-तलाक शब्द से पीडित महिलाओं पर सर्वे किया, तीन तलाक की शिकार महिलाओं से मिली , गहराई से उनके बारे में अध्ययन किया तो दिल सिहर उठा कि कैसी -कैसी व्यथा सहन करते हुए वे अपना जीवन यापन कर रहीं हैं। समाज के डर से अपना नाम नही छापने की शर्त पर जयपुर की कुछ महिलाओं ने अपनी पीड़ा बताई। पाठकों की जानकारी के लिए  कुछ केसों का वर्णन मैंने यहाँ किया है-

  • पहले केस में महिला ने बताया कि उसके पति ने तलाक-तलाक-तलाक बोलकर, उससे रिश्ता तोड लिया और किसी अन्य महिला से निकाह कर लिया । वर्तमान में शौहर अपनी नई बेगम के साथ रह रहा है। उसकी पहली बेगम अपनी सास के साथ रही है, लेकिन सास भी उसे घर से जाने को बोलती रहती है। अब समस्या यह है कि महिला शिक्षित नहीं है, वो अपनी 5 साल की बेटी के साथ कहाँ जाये, कैसे अपना जीवन-यापन करे ?
  • दूसरे केस में महिला के पति ने , उसको तलाक-तलाक-तलाक कह कर छोड दिया । ससुराल वालों ने महिला को जबरजस्ती धक्का देकर घर से निकाला जिससे उसके गर्भ में पल रहा बच्चा मर गया । पीडित महिला अपने माता-पिता के पास आ गयी , उसके मायके वालों ने उसके पति के खिलाफ पत्नी के साथ मारपीट कर घर से निकालने और गर्भपात का मुकदमा करवा दिया। उसके बाद उसके ससुराल वालों ने उसकी बडी बहन को भी उसकी 4 माह की बेटी के साथ ये कहकर घर से निकाल दिया , कि जब उसकी छोटी बहन का केस वापस लेगे , तभी वो वापस घर में आ सकती हैं। वर्तमान समय में दोनों बहने करीब 10 माह से अपने माता-पिता के साथ उनके घर में रह रही हैं।
  • तीसरे केस में पीडिता ने बताया कि उसने लव मैरीज करी थी । निकाह से पहले पति ने बताया कि उसने अपनी पहली पत्नी से तलाक ले लिया हैं , उससे कोई मतलब नहीं हैं। शादी के कुछ समय पश्चात पति के घर से बाहर रहने को लेकर शक हुआ । उसने लोगों से अपने पति के बारे में पूछना प्रारम्भ किया तो सामने आया कि अब भी वह अपनी पहली पत्नी के साथ रहता हैं। वर्तमान समय में पीडिता का पति अपनी दोनों पत्नियों को धोखा दे रहा हैं । पहली पत्नी के साथ होता हैं तो कहता कि उसका दूसरी पत्नी से कोई मतलब नही हैं और दूसरी के साथ होता हैं तो कहता हैं कि पहली पत्नी से कोई मतलब नहीं हैं। इस प्रकार वो दो नावों पर सवारी कर रहा हैं।

ये तो कुछ उदाहरण बताये हैं मैंने , इस प्रकार ना जाने कितनी मुस्लिम औरते ट्रिपल तलाक का शिकार होती हैं। ट्रिपल तलाक कोई संवैधानिक अधिकार नही हैं , ना ही तलाक देने का ये तरीका कुरआन में हैं । लेकिन समाज के कुछ लोगों ने अपनी मौज-मस्ती के लिये, अपनी मर्जी से तीन तलाक का नियम बना लिया हैं । जिसका सहारा लेकर मुस्लिम समाज में शौहर मनमाने तरीके से अपनी पत्नी से तलाक लेता हैं या पत्नी के रहते दूसरी शादी करता हैं।

मेरे अनुसार ऐसे मामलों में पुरूष के साथ-साथ महिला की भी गलती होती हैं , कि वो ऐसे इंसान से निकाह कर लेती हैं , जिसने अपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर छोड दिया हो। समझ में नही आता दूसरी शादी करने वाली भी एक औरत ही होती है , वो ऐसे व्यक्ति से निकाह क्यों करती हैं , जिसने अपनी पहली पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर छोड दिया हो। जब कोई इंसान अपनी अपनी पहली पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर छोड देता है या पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करता हैं , उसका क्या भरोसा कल को वह तीसरी शादी के लिये दूसरी पत्नी को भी छोड दे ?

हमारे संविधान में कही भी नहीं लिखा कि तलाक शब्द तीन बार बोलो और तोड दो पति-पत्नी के रिश्तों को। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यह न सिर्फ पॉलिसी का मामला है, बल्कि मूल अधिकारों से जुड़ा मामला भी है। कई बार पति मनमाने तरीके से तलाक लेने या पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करने जैसे कदम उठाते हैं और ऐसे मामले में मुस्लिम महिलाएं भेदभाव का शिकार हो जाती हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्प्णी करते हुए इसे असंवैधानिक बताते हुए कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक देना क्रूरता की श्रेणी में आता है। दो अगल-अलग याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुनीत कुमार की एकलपीठ ने ये फैसला दिया कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। यहां तक कि पवित्र कुरान में भी तीन तलाक को अच्छा नहीं माना गया है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग इस्लामिक कानून की गलत व्याख्या कर रहा है।

हाल ही में राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्षा सुमन शर्मा द्वारा तीन तलाक विषय पर परिचर्चा का आयोजन करवाना मुस्लिम महिलाओं को जागृत करने कि दिशा में सराहनीय प्रयास हैं । लेखिका को भी परिचर्चा में भागीदार बनने का मौका मिला परिचर्चा में वरिष्ठ अधिवक्ता निशांन्त हुसैन , मुमल राजवी , शीराज कुरैशी ,  महिला आयोग की सदस्य सचिव अमृता चोधरी , सरोज खान के अलावा कुछ पीडित महिलायें , समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और लॉ में रिसर्च कर रहे विद्यार्थियों के साथ ट्रिपल तलाक पर आयोजित की गयी वार्ता में पीडिताओं ने अपनी पीडा उजागर की , बुद्दिजीवी वर्ग एंव वकीलों ंने उनका समाधान बताया एंव अपनी राय दी कि किस प्रकार मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से राहत मिल सकती हैं । वहीं सुमन शर्मा ने कहा कि इस इस वार्ता से मिले नए विचारों और सुझावो की एक रिर्पोट बनाकर राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजेगी जिससे महिलाओं को राहत मिल सके साथ ही इस प्रकार की चर्चा भविष्य में भी आयोजित करवाती रहेगी। सरकार, समाजसेवी संगठनों के प्रयास तभी सफल होगेें जब मुस्लिम महिलायें शिक्षित होगी , जागरूक होगी, अपने अधिकारों का हक सेे मांगेगी इसके लिए खुद महिलाओं को आगे आना होंगा ।