टुकड़ों में उतर रहे हवेेलियों के चेहरे, विदेश पहुंच रहे हैं कलात्मक पत्थर

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तराशे हुए पत्थरों की तस्करी

(कमलकांत शर्मा,बीकानेर)
गीतांजलि पोस्ट…….हवेलियों के शहर के रूप में पहचान रखने वाले बीकानेर शहर में स्थित वर्षों पुरानी कलात्मक हवेलियां अपना अस्तित्व खोती दिखाई दे रही हैं। कलात्मक पत्थर की अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में मिलती अच्छी कीमत और रियासत कालीन इन हवेलियों की देखभाल में असक्षम साबित होने वाले मालिक इन हवेलियों को भव्यता प्रदान करने वाले कलात्मक पत्थरों को बेचने में लगे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि हवेलियों के कलात्मक पत्थर के साथ-साथ हवेलियों में लगे दरवाजे, खिड़कियां और छतों को भी उतार कर बेचा जा रहा है।
अनुपम कला से देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने वाली बीकानेर की कलात्मक हवेलियों का अस्तित्व आज खतरे में इसलिए पड़ता नजर आ रहा है कि न तो सरकार इन्हें संरक्षित रख पा रही है और न ही हैरिटेज इमारतों को संरक्षण रखने का दावा करने वाले संगठन। कला के दम पर विश्व में बीकानेर को एक अलग पहचान दिलाने वाली कलात्मक हवेलियों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं है। इन हवेलियों के संरक्षण के लिए जो लोग प्रयासरत हैं वे अपने स्तर पर आमजन को जागरूक कर रहे है, लेकिन सरकार और प्रशासन की ओर से संरक्षण नहीं मिलने से बीकानेर की यह ऐतिहासिक धरोहरें आज अपना वजूद खो रही हैं। शहर के भीतरी क्षेत्र और गंगाशहर व भीनासर में स्थित ये प्राचीन हवेलियां पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन हवेलियों की स्थापत्य कला, बेजोड़ नक्काशी, बोलती कोरनी, दुलमेरा के लाल पत्थर पर निकाली गई जालियों और झारोखे, शानदार दीवानखाने, खुले व हवादार बड़े-बड़े कमरे, दीवारों पर उकेरे गए बेल-बूंटे, शीशम की लकड़ी की छतें इत्यादि यहां आने वाले पर्यटकों को बरबस ही अपनी और आकर्षित करते हैं। लेकिन पत्थरों के प्रेमी तस्करों और दलालों की धन पिपासा के कारण हर वर्ष हवेलियों की तादाद में कमी होती जा रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि करीब पांच दशक पहले शहर में इनकी संख्या सैकड़ों में थी, जो अब गिनी-चुनी रह गई। एक जानकार ने बातया कि प्रत्येक वर्ष करीब आठ से दस हवेलियों के चेहरों पर लगे कलात्मक पत्थरों,नक्काशीदार दरवाजे व खिड़कियां तथा शीशम की लकड़ी से बनी छतें  अन्य प्रान्तों में और विदेशों में भेजी जा रही हैं। बीकानेर में जहां इन पत्थरों की कीमत लाखों में है वहीं विदेशों में इनकी कीमत करोड़ों में आंकी जा रही है। हवेलियों के संरक्षण के लिए गिने-चुने संगठन हैं जो इनकी सुरक्षा के लिए सरकार से मांग करता रहा है। साथ ही समय-समय पर गोष्ठी, हवेली यात्रा इत्यादि कार्यक्रमों का आयोजन कर इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए आमजन में जागृति लाने का कार्य कर रहा है। अभी हाल ही में एक संघ के सदस्यों ने सरकार से हवेलियों के संरक्षण के लिए कानून बनाने की मांग भी की है।

जोधपुर में कलात्मक पत्थरों का बड़ा बाजार

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हवेलियों में लगे कलात्मक पत्थर, नक्काशीदार खिड़कियां, दरवाजे और छतें छतों की अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में काफी कीमत है। लाल पत्थरों और शीशम की लकड़ी पर उकेरी गई कला के ऐसे प्रेमी जो इसकी कीमत को समझ कर उसे विदेशों में भेजने का कार्य कर रहे हैं, प्रदेश के जोधपुर शहर में विराजमान हैं। कहने का आशय यह है कि जोधपुर में इन कलात्मक कीमती पत्थरों और रियासतकालीन लकड़ी का काला कारोबार होता है।

….नहीं तो इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगी

अद्भुत कला का उदाहरण बनी इन हवेलियों का संरक्षण किया जाना स्थापत्य कला को जीवंत बनाए रखने के लिए अत्यंत जरुरी है। अगर समय रहते इन कलात्मक हवेलियों का संरक्षण नहीं किया गया तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में ये ऐतिहासिक धरोहरें भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी और पत्थरों व कीमती लकड़ी पर उकेरी गई हाथ की कलाएं गुमनामी में दफन हो जाएंगी।

रियासतकालीन पार्क और अन्य भवनों का भी यही हाल

रजवाड़ों के काल में बीकानेर में धन्नासेठों की ओर से बनवाई गईं अनुपम कला संजोए हुए हवेलियों के साथ-साथ यहां के राजाओं द्वारा बनवाए गए  विभिन्न पार्क और अन्य भवनों (वर्तमान में प्रशासनिक कार्यालय) में लगे तराशे हुए पत्थर और उस जमाने की लोहे से बनी ग्रिल आदि भी यहां से तस्करों ने उतार कर विदेशों में भेज दिए हैं।

बनना चाहिए कानून

हैरिटेज को संरक्षित करने के लिए कानून बनाए जाने की जरुरत है। वहीं नगर निगम में एक हैरिटेज सैल का गठन भी किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि उनकी प्रभावी मॉनिटरिंग हो सके। इसके अलावा हवेली मालिकों से भी लगातार सम्वाद किया जाना चाहिए। इस प्रकार के कई प्रयास किए जाने पर हवेलियों की वैभवता और इनसे बनी शहर की पहचान को बचाए रखा जा सकता है।
गोपाल सिंह चौहान, सचिव, लोकायन संस्थान।