दुःखी होते हैं झूठे और झूठन चाटने वाले

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– डॉ. दीपक आचार्य,उदयपुर-

गीतांजलि पोस्ट………..इंसान मौलिक रूप से ईश्वर का अंश है इसलिए उसकी वाणी कभी बेअसर नहीं हो सकती, उसके मुख से भी बात उच्चारित होगी, वह सौ फीसदी सही सिद्ध होगी लेकिन शर्त यही है कि उसमें सांसारिक माया का प्रवेश नहीं हुआ हो तथा मौलिक रूप से पूर्ण विशुद्ध ईश्वरीय अंश बना हुआ हो।

हम सभी लोग चाहते हैं कि जो हम सोचें, जो कुछ अपने मुँह से बोल दें, वह सब कुछ सही होना ही चाहिए।  जब तक हम निर्मल चित्त रहते हैं, शुद्ध-बुद्ध और प्रबुद्ध अवस्था में निर्विकार, निष्प्रपंच और निरहंकारी बने रहते हैं तब तक हमारी वाणी और संकल्प अपने आप सिद्ध होते रहते हैं।

लेकिन अधिकांश लोगों को अपने शरीर और ईश्वरीय देन पर भरोसा नहीं रहता। चाहे ये लोग अपने आपको कितने ही धार्मिक, श्रद्धालु और आध्यात्मिक मानते रहें, मगर अपनी मानसिक और शारीरिक शक्तियों के बारे में ये अनभिज्ञ ही रहते हैं।

यही कारण है कि हममें से अधिकांश लोग अपनी शक्तियों और क्षमताओं से बेखबर हैं और मरते दम तक न हम शरीर को पूरा समझ पाएंगे, न दिल और दिमाग को, और न ही ईश्वरीय दिव्य तरंगों के कमाल को।

हम अपने आपको केवल स्थूल देह मानते हैं जिसका मूल कर्म भोग-विलास, आलस्य-प्रमाद और मौज-मस्ती उड़ाना ही हमें प्रिय लगता है।

यही वजह है कि हम सभी तरह के समर्थ और शक्तिमान होने के बावजूद खुद को केचल हाड़-माँस का बोरा भर ही मानते रहते हैं और जिन्दगी भर उन परिग्रही सांसारिक कामनाओं के वशीभूत होकर उन्मादी, प्रमादी और विषादी अवस्थाओं में जीते रहते हैं जो क्षुद्र हैं और सामान्य से भी सामान्य हैं।

कर्म वही सफल होते हैं जिनमें हमारी चेतना का प्रवाह लगा हुआ रहता है और इसमें ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों की शुचिता सबसे बड़े कारकों में गिनी जाती है।

ये जितनी अधिक पवित्र और मौलिकताओं से परिपूर्ण होंगी, उतनी ही पूरे वेग और प्रभाव के साथ काम करेंगी। इनमें मिलावट आ जाने पर इनका कर्म शिथिल हो जाएगा और ये नाकारा होने लगेंगी।

केवल संकल्पों और वाणी की ही बात करें तो इनका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक इनमें शुद्धता और सत्य का पुट रहता है।

हम सभी लोग चाहते हैं कि हम जो कुछ कहें वह सच हो ही जाए। लेकिन ऎसा होता नहीं है। हमारा कहा हुआ तभी सच हो सकता है कि जब हमारे मुँह से कभी असत्य न बोला गया हो, जो बोला जाए वह पूर्ण सत्य हो, इसमें सात्विकता का समावेश हो तथा कल्याणकारी भावना छिपी हुई होनी चाहिए।

आजकल झूठन और झूठ का सर्वाधिक बोलबाला और प्रचलन है। जो लोग झूठन चाटने के आदी हो जाते हैं और झूठ बोलते हैं उनका कहा हुआ कभी सत्य नहीं होता क्योंकि एक बार जिसकी जिह्वा पर झूठ का आवरण चढ़ जाता है, झूठ बोलने की आदत लग जाती है तब उसके मुँह से सत्य भाषण हो ही नहीं सकता।

कई बार हम मनोरंजन के मूड में आकर मजाक में झूठ बोल देते हैं अथवा झूठ बोल देने के बाद जब हालात बिगड़ने लगते हैं तब यह कहकर पिण्ड छुड़ाने की कोशिश करते हैं कि मजाक में कह दिया है।

अपने झूठ को परिपुष्ट करने के लिए यह दुबारा झूठ का आश्रय है और ऎसा करना आजकल इंसान के स्वभाव में आ गया है। एक आम इंसान एक दिन में पचास से अधिक बार झूठ बोलता है। जिन्दगी भर के झूठ को गिना जाए तो असंभव ही है।

जो झूठ बोलता है उसकी कही हुई कोई सी बात कभी भी सत्य नहीं हो सकती, क्योंकि झूठ का कोई प्रभाव नहीं होता।  झूठों के बारे में न सोचें क्योंकि जो झूठा है उसका मुँह तो कभी न कभी काला होना ही है क्योंकि झूठ का आभामण्डल काजल की कोठरी और कोयले की खदानों से भी कहीं अधिक घातक होता है।

हमारी वाणी का सीधा और धारदार असर तभी हो सकता है कि जब विधाता को हमारे बारे में यह विश्वास हो जाए कि जो कुछ इनके मुख से कहा जाएगा वह सत्य ही होगा, तनिक भी झूठ की आशंका नहीं होगी, तभी हमारी वाणी पूरी तरह सफल और सिद्ध हो सकती है। जो सत्यभाषी होते हैं उनकी जिह्वा पर सरस्वती विराजमान रहती है।

जो लोग कभी झूठ नहीं बोलते, सच का आश्रय पा लेते हैं, उनके द्वारा बोला गया हर शब्द परमाण्वीय प्रभाव रखता है और सफलता की सिद्धि पाता ही है।

अपनी जीभ या वाणी को दोष न दें बल्कि यदि हमारी कही हुई बातें बेअसर रहती हैं, तो इसका मतलब यही है कि हम दोषपूर्ण और झूठी जिन्दगी जी रहे हैं अन्यथा कोई कारण नहीं कि हमारा कहा हुआ सत्य न हो।

अपनी बातें झूठी निकलने, काम न हो पाने तथा अपने संकल्प पूरे न हो पाने पर हम लोग हताश और निराश हो जाते हैं और जिन्दगी समस्याओं, दुःखों और दुर्भाग्ये घिर जाती हैं, अकेलापन सताता रहता है, मानसिक और शारीरिक बीमारियां घेर लेती हैं। यह सब हमारे झूठे होने का परिणाम है।

बहुत से लोग आज भी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इनके मुँह से बोला गया कोई सा शब्द व्यथा नहीं जाता, अपना पूरा और पक्का प्रभाव छोड़ता है। इनके सोचे गए संकल्प पूरे होते हैं और जिसके लिए जो कुछ कहा जाता है वह सच निकलता ही है।

हम भी इस प्रयोग को कर सकते हैं। झूठ और झूठन का परित्याग करें, सच बोलें, सच सुनें और सत्य का आश्रय पाएं। किसी से मजाक में भी झूठ न बोलें, इससे अपनी आन्तरिक ऊर्जा का अपव्यय होता है।

केवल साल भर इस सत्य संकल्प को अपना लिया जाए तो अपनी वाणी और संकल्प अपने आप सिद्ध होने लगते हैं और समूचा जीवन सफलताओं के बहुविध आनंद से भर उठता है।  अपने आपको मौलिक और पवित्र बनाए रखें, सत्य को अपनाएं तभी सत्यनारायण की कृपा प्राप्त की जा सकती हैं।