कुत्ते तो पीछे पड़ेंगे ही

0
510

डॉ. दीपक आचार्य, उदयपुर-

dogकुत्तों का काम ही है मौके-बेमौके भौंकना, पीछे पड़ना, लपकना और मुँह मार लेना।  फिर अब एक नस्ल के कुत्ते ही नहीं कुत्तों की वह हर किस्म हाजिर है जो दुनिया में होनी चाहिए।

जनसंख्या के अनुपात में सब जगह कुत्तों की संख्या भी विस्फोटक ढंग से लगातार बढ़ती ही जा रही है। कुत्तों की परंपरागत और वफादार नस्लें खत्म हो चली हैं। इनकी बजाय अब संकर किस्म के कुत्तों की जबर्दस्त भरमार है।

पहले तो कुत्ते गुर्राकर अपनी मौजूदगी दर्शाते थे और उसके बाद ही अपनी हरकतों का प्रदर्श शुरू किया करते थे। आजकल कुत्तों की कोई मर्यादा हीं रही। कोई आत्म अनुशासन रहा है। झूठे लोगों और उनकी झूठन को चाट-चाट कर कुत्ते भी  बेवफा, झूठे, धूर्त और मक्कार हो गए हैं।

आम से लेकर खास कुत्तों तक सभी में फ्री स्टाईल आ चुका है। कोई कुत्ता किसी की नहीं सुनता सिवाय अपने स्वार्थ या आकाओं की आज्ञा के।

धर्मभीरू लोग कहते हैं ये भैरव का वाहन है, कोई कहता है बिना झोली का साधु है, कोई इन्हें कुछ और बताता हुआ महिमा मण्डित करते हुए इनके बारे में अंधविश्वासों और दृढ़ विश्वासों का दिग्दर्शन कराता है।

जो लोग कुत्तों की महिमा से वाकिफ हैं वे इनके नाम पर रोजाना कुछ निवाले चुपचाप निकाल लिया करते हैं। जब तक इन निवालों की सहज-स्वाभाविक आवक बनी रहती है गली के कुत्ते चुप बैठे रहते हैं, चूँ तक नहीं करते।

पर जैसे ही निवालों में कमी आने लगती है, इन कुत्तों के पेट में मरोड़ पड़ने लगती है और तब सारे के सारे कुत्ते अपनी औकात दिखाते हुए गलियों से लेकर राजमार्गों और मोक्ष मार्गों तक आ धमकते हैं।

कुत्तों का सीधा संबंध पेट की भूख मिटाने तक ही सीमित होकर नहीं रह गया है। इन्हें सब कुछ लजीज और बदलाव भरा स्वाद चाहिए, चाहे कोई कैसे भी मैनेज करे। खुद के लिए खाने-पीने के इंतजामों के साथ कुत्तों की हमेशा यही ख्वाहिश रहती है कि उनके लिए कुछ ऎसा मिलता रहे जिसे अपने साथ ले जाकर अपने बाड़ों की जमीन खोदकर उसमें दबा सकें ताकि उनके सिवा किसी और को इसकी भनक तक नहीं लगे।

कुत्तों को जब लगता है कि उनके अकेले के बूते पर धमाल नहीं मच पा रही है, भौंकने के स्वर खोने लगे हैं तब आपस में लड़ने-भिड़ने वाले सारे के सारे कुत्ते किसी एक एजेण्डे पर एक हो जाते हैं और नॉन स्टॉप भौंकना शुरू कर देते हैं।

 इसी से कुत्तों के वजूद और वर्चस्व का सिक्का जमने लगता है। लोग-बाग इन्हें चुप करने के लिए वह सब कुछ करते हैं जिससे इनके मुँह बंद किए जा सकें। कुत्ते भी यही चाहते हैं इसलिए अपनी जिद को छोड़कर मान लेते हैं।

यों भी कुत्ते अब स्वाभिमानी नहीं रहे, अभिमानी और बदचलन होते जा रहे हैं। यों कहें कि दुनिया में सबसे ज्यादा आवारा कोई होते जा रहे हैं तो वे कुत्ते ही हैं। इनके लिए कहीं कोई वर्जना नहीं है। भौं-भौं करते कहीं भी घुस जाते हैं और पूँछ हिलाते हुए किसी की भी गोद को माँद समझ कर बैठ जाते हैं।

इन्हें अच्छी तरह पता होता है कि कौन-कौन सी माँद सुरक्षित होती है और कहाँ इन्हें अभयदान या अभयारण्य का सुख प्राप्त हो सकता है।

पहले कुत्ते चोर-उचक्कों, लूटेरों और अपराधियों को देख कर भौंकते थे पर अब कुत्तों के लिए ये असामाजिक लोग ही आश्रयदाता हो गए हैं इसलिए कुत्तों को सबसे ज्यादा और हर तरह का सुकून इन्हीं के बाड़ों और गलियाेंं में मिलता है।

कुत्तों को अब उनकी नस्ल के हिसाब से नहीं बल्कि इनके आकाओं और पालकों के नामों से नई पहचान मिल गई है। हर कुत्ते के सम्मान के लिए इनके गुण धर्म और नस्लीय लक्षणों की बजाय इनके संरक्षकों की हैसियत से जाना जाने लगा है। जो जितना बड़ा और अभिजात्य आका, उतना उसके कुत्ते की पूछ उतनी ही ज्यादा।

कुत्तों को कभी नहीं सुहाता कि कोई उनसे आगे बढ़ जाए, उनसे अधिक रफ्तार पा जाए। इसलिए हर तरफ आवारा कुत्तों के कुनबे उन सभी के पीछे पड़े रहते हैं जो आगे बढ़ने की कोशिश में जुटे हैं। थोड़ी सी तेजी पाई नहीं कि भौं-भौं करते कुत्ते तेजी से पीछे लपकने शुरू हो जाएंगे।

कोई इंसान दौड़ रहा हो या अपने वाहन से सरपट तेजी से जा रहा हो, पता नहीं कहाँ से निकल आ कर कुत्तों की जमात पीछे पड़ जाती है और दूर तक भौंकती हुई ऎसे लपकती रहेगी  जैसे कि हम उनके जानी दुश्मन ही हों या हमारे बाप-दादाओं के काल से दुश्मनी की रियासत और सियासत चली आ रही हो।

फिर थोड़ा रुक कर आँखों में आँखें डालकर टरका दो, जोर से भपका दो या डण्डे का जोर दिखा दो तो पूँछ नीची कर चुपचाप उल्टे पाँव दौड़ पड़ेंगे।

कुत्ते हैं तो पीछे पड़ेंगे ही, इनका ईलाज यही है कि समय-समय पर इन्हें आँखे दिखाते रहो, इनकी घोर उपेक्षा करते रहो,  तगड़ा डण्डा जड़ते रहो और यह जता दो कि उनकी आवारागिर्दी को सहन करने की भी एक सीमा है, और उसके बाद सब कुछ आर-पार।

यह नुस्खे आजमा लेने पर थोड़े दिनों बाद कुत्ते भी अपने आप समझ जाते हैं और उनके आका भी। आवारा कुत्तों का यही ईलाज है।

हर गली का कुत्ता अपने आपको शेर मानता है उसी तरह हर राज प्रासाद और राज मार्ग का कुत्ता अपने को पैंथर से कम नहीं मानता, इसलिए खुल कर आवारागिर्दी करता रहता है।

कुछ लोग तो धींगामस्ती के लिए ही इन कुत्तों को पालते रहते हैं ताकि वक्त जरूरत काम आ सकें। जब से कुत्तों के लिए बिना कुछ किए सब कुछ पा जाने का समय आ गया है, कुत्तों की असंख्य नस्लें पैदा हो होकर जमाने भर में वर्चस्व कायम करने लगी हैं।

इन कुत्तों को देखते-देखते और इनकी बदचलनियों से भरी आवारगी को सार्वजनीन आदर पाते हुए देख आदमी भी कुत्ता होने लगा है। दिल छोटा न करें, कुत्तों की शिकायत भी न करें क्योंकि कुत्ते हैं तो भौंकेंगे ही। जो न भौंके, न लपके और अच्छे-सच्चे लोगों के पीछे न पड़े वह कुत्ता काहे का। कुत्तों की जात ही आदमी को परेशान करने के लिए पैदा हुई है।

यों भी आजकल हर तरफ कुत्तों का प्रभुत्व बढ़ता ही जा रहा है। जात-जात के कुत्ते सभी दिशाओं से लेकर बस्तियों तक में पूरे गर्व और गौरव के साथ विद्यमान हैं। हर कुत्ता किसी न किसी के पीछे पड़ा हुआ है ही। कुत्ता पीछे पड़ना इस बात का शगुन भी है कि हम आगे बढ़ रहे हैं उसे सब चाहे-अनचाहे स्वीकार करने लगे हैं। इन कुत्तों के प्रति बेपरवाह रहें, ये यों ही भौंकते रहेंगे जिन्दगी भर।