किसी का जूठा खाने की अपेक्षा भारतीय संस्कृति का अनुसरण करो

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गीतांजलि पोस्ट…..(रेणु शर्मा, जयपुर) भारतीय संस्कृति विश्व की एकमात्र महान् संस्कृति होने के कारण उसकी रक्षा करने के लिए ही हमारे पूर्वजों ने त्यौहार मनाना आरंभ किया। हमारे पूर्वजों ने हमें मकर संक्रांति, होली, गुढीपड़वा, लोहड़ी, गणेशोत्सव, दीपावली, ईद, रमजान जैसे त्योहार मनाना सिखाया है, किंतु हम 1 जनवरी को नववर्ष, वेलेंटाईन डे, मदर्स-डे, चॉकलेट डे, फादर्स-डे जैसे अनेक विकृत डे मनाते हैं। क्या औचित्य है इन डेज का? क्या रिश्तों को मनाने का या उनका अहसास करने का या उनका सम्मान करने का कोई विशेष दिन होना चाहिये? हमारी भारतीय संस्कृति में तो दिन की शुरूआत ही माता-पिता, गुरू के चरणवंदन से होती है, तो हमारे लिये माता-पिता को सम्मान देने के लिये कोई विशेष दिन की जरूरत नहीं है। ये सब पाश्चात्य देशों में होता है, हमारे यहाँ नहीं होता। कॉन्वेन्ट स्कूल और पाश्चात्य सभ्यता हमाारे संस्कारों को प्रभावित कर रही हैं और हमारी नयी पीढी उनका अनुसरण कर रही है। वास्तव में देखा जाये तो ये हमारी नयी पीढी की कमी नहीं है, बल्कि हमारे द्वारा दिये जाने वाले संस्कारों की कमी है । बच्चे तो वही करेगें, जैसी उन्हें शिक्षा मिल रही है। हमें अपनी शिक्षा पद्वति में बदलाव लाना होगा। हमारे यहाँ की विवाह संस्कृति संयमी व नैतिक प्रेम जीवन सिखाती है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति में ऐसा नहीं है, वहाँ वेलेंटाईन डे मनाया जाता है और आज का युग प्रतिस्पर्धा का है इसलिए हमारे युवाओं पर वेलेंटाईन डे मनाने की प्रतिस्पर्धा हो गयी है। उन पर वेलेंटाईन डे मनाने का नशा छा गया है, जो 14 फरवरी को दिखाई देने लगा है, जिसके कारण वे अपना पैसा और कीमती समय बर्बाद करते हैं । 14 फरवरी को वेलेटाईन डे स्पेशल पार्टियाँ मनायी जाती हैं, तो कहीं उपहार के रूप में देने के लिये रेड रोज या अन्य उपहार खरीदे जाते हैं। स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी14 फरवरी की छुट्टी नहीं होने पर वेलेंटाईन डे के चक्कर में स्कूल कॉलेजों से बंक मार लेते हैं।

पैरेन्ट्स को चाहिये कि अपने बच्चों को संस्कारवान बनायें क्योंकि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। कॉन्वेन्ट स्कूलों की बजाय गुरुकुलों में शिक्षा दें, जिससे बच्चों में संस्कार आये। बच्चों को समझायें कि प्रतिस्पर्धा रखो, मगर सिर्फ उन क्षेत्रों में जिनमें आप बिना तनाव के एक लम्बी-दौड़ दौड़कर अपने उद्देश्य तक पहुँचने की सामर्थ्य रखते हों । यह देखा-देखी की प्रतिस्पर्धा उनके किसी काम की नहीं है, इससे उनको तनाव, अशांति, असंतुलित और एक अव्यवस्थित जीवन के अलावा कुछ नहीं मिल सकता।

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