15 साल की उम्र में बनी मां, फिर धकेला गया वेश्यावृत्ति में, इस लड़की की दास्तां आशा और साहस की कहानी है

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टीम गीतांजलि पोस्ट ………

एक इंसान की ज़िन्दगी में अच्छे पल आते हैं तो बुरे पल भी आते हैं. किसी ने सच ही कहां है कि जब जब दुःख का एहसास नहीं होगा तो ख़ुशी का मज़ा कैसे आएगा. लेकिन आज म आपको एक ऐसी लड़की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने दुखों की उस घड़ी में भी हिम्मत नहीं हारी, जिस स्थिति में ज़्यादातर लोग हर उम्मीद को छोड़ देते हैं.

एक लड़की जिसका जन्म मंदिर में हुआ था और उसको ये बताया गया था कि उसके माता-पिता उसके जन्म के वक़्त ही मर गए थे. वो 15 साल की नाज़ुक उम्र में ही मां बन गई. एक वर्दी वाले ने उसका बलात्कार किया था और जब वो गर्भवती हुई और उसके गुनाहगार को खोजा गया, तो वहां से भाग गया. उसके बाद से ही उसकी ज़िन्दगी में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होने का सिलसिला शुरू हो गया. मगर इस लड़की ने साबित किया कि केवल प्यार ही एक ऐसा जरिया है, जिसकी मदद से इन परिस्थितियों से बाहर भी आया जा सकता है. और ये उसका अपनी बेटी के प्रति प्यार था, जिसने विषम परिस्थितयों में भी उसको हिम्मत नहीं हारने दी.

नीलू नाम की इस लड़की की भावुक कर देने वाली इस कहानी को Humans Of Bombay सामने लाया है.

बलात्कार की वजह से वो 15 साल की उम्र में मां बन गई और उसको मातृत्व का मतलब समझ आया. एक वर्दीधारी ने बलपूर्वक उसका यौनशोषण किया और 15 साल की नाजुक उम्र में उसकी दुनिया पूरी तरह बदल गई.

वो तो भाग गया, लेकिन नीलू अब कम उम्र में एक मां बन चुकी थी, जिसे अब केवल खुद को ही नहीं, बल्कि अपनी नन्ही सी बेटी को भी इस दुनिया से बचाना था.

वो अपनी बेटी के साथ एक मंदिर में रहने लगी, वो लोगों के द्वारा दी गई भीख पर जीने लगी और साथ ही खाने व रहने के बदले में वहां काम भी करने लगी. जब वो अपना और अपनी बेटी का ठीक से ख्याल रखने लगी, तब उसकी ज़िन्दगी में एक आदमी आया. वो आदमी हर रोज़ उस मंदिर में आता था और उसको देखता था. आखिरकार वो नीलू से मिला. उसने नीलू को उसकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की आस दिलाई.

उस आदमी ने उससे कहा कि वो भी लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करके ज़्यादा पैसे कम सकती है और अपनी बेटी को अच्छा भविष्य दे सकती है. उस व्यक्ति ने उसको अपनी दीदी के घर में काम पर लगवाने की बात बोली. स्थिति को बेहतर करने के प्रयास और लालच में उसने उस आदमी पर विश्वास किया और उसके साथ पुणे आ गई.

बस यहीं से शुरुआत हुई नीलू की दर्दनाक ज़िन्दगी की, एक ऐसी ज़िन्दगी की जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी. पुणे में उसको जबरन वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल दिया गया. जो आदमी उसका शुभचिंतक बनकर उसको यहां लाया था उसी ने उसको वैश्यालय चलाने वाले आदमी को एक लाख रुपये में बेच दिया गया. जब भी नीलू ने ये काम करने से मना किया, तो उसको बुरी तरह से बर्बरता से मारा-पीटा गया. उसको इतना मारा जाता था कि उसके शरीर से खून बहने लगता था, लेकी उन लोगों को उस पर बिलकुल भी दया नहीं आती थी.

जब उस आदमी का दिल नीलू से भर गया, तो उसने घर में पड़े फालतू सामान की तरह उसे एक सेठ को बेच दिया. गनीमत ये थी कि उस सेठ ने कभी भी उसको मारा-पीटा नहीं.

नरक जैसी स्थिति में रहकर लोगों का मनोरंजन करने वाली नीलू अपनी बेटी को इस नरक से निकालने के लिए वेश्यालय चलाने वालों से लड़ी, उसने नशे के खिलाफ़ आवाज़ उठाई. जब एक NGO के रूप में उसको आशा की किरण दिखाई दी तो उसने वो जगह छोड़ दी. अब उसकी बेटी एक होस्टल में रहती है और वो आशा करती है कि एक दिन वो भी अपनी बेटी के साथ एक घर में रहेगी.

नीलू कहती है कि केवल अपनी बेटी के प्रति उसकी ममता ही थी, जो वो इस दलदल से बाहर निकल पाई और इसके खिलाफ़ लड़ पाई. आज मेरी बेटी का भविष्य सुरक्षित है.