जीवन को सफल बनाते है भगवान महावीर के उपदेश

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महावीर जयंती विशेष
गीतांजलि पोस्ट….(विनय शर्मा)
सांभर लेक:- वर्धमान महावीर का जन्मदिन महावीर जयन्ती के रुप मे मनाया जाता है। वर्धमान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्री आदिनाथ की परंपरा में चौबीस वें तीर्थंकर हुए थे। इनका जीवन काल पांच सौ ग्यारह से पांच सौ सत्ताईस ईस्वी ईसा पूर्व तक माना जाता है। वर्धमान महावीर का जन्म एक क्षत्रिय राजकुमार के रूप में एक राज परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ एवं माता का नाम प्रियकारिणी था। उनका जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य में  हुआ था।
तीस वर्ष की उम्र में इन्होंने घर-बार छोड़ दिया और कठोर तपस्या द्वारा कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया. महावीर ने पार्श्वनाथ के आरंभ किए तत्वज्ञान को परिभाषित करके जैन दर्शन को स्थायी आधार दिया। महावीर स्वामी जी ने श्रद्धा एवं विश्वास द्वारा जैन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा स्थापित की तथा आधुनिक काल में जैन धर्म की व्यापकता और उसके दर्शन का श्रेय महावीर स्वामी जी को जाता है। इन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता हैं- अर्हत, जिन, निर्ग्रथ, महावीर, अतिवीर इत्यादि ।
महावीर जीवन परिचय:-
भगवान महवीर का जन्म वैशाली के एक क्षत्रिय परिवार में राजकुमार के रुप में चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशी को बसोकुंड में हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था यह लिच्छवी कुल के राजा सिद्दार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र थे। संसार को ज्ञान का संदेश देने वाले भगवान महावीर जी ने अपने कार्यों सभी का कल्याण करते रहे।
जैन श्रद्धालु इस पावन दिवस को महावीर जयन्ती के रूप में परंपरागत तरीके से हर्षोल्लास और श्रद्धाभक्ति पूर्वक मनाते आ रहे हैं। जैन धर्म के धर्मियों का मानना है कि वर्धमान जी ने घोर तपस्या द्वारा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी, जिस कारण वह विजेता और उनको महावीर कहा गया और उनके अनुयायी जैन कहलाए।
महावीर जयंती पर्व:-
तप से जीवन पर विजय प्राप्त करने का पर्व महावीर जयंती के रूप में मनया जाता है। श्रद्धालु मंदिरों में भगवान महावीर की मूर्ति को विशेष स्नान कराते हैं, जो कि अभिषेक कहलाता है। तदुपरांत भगवान की मूर्ति को सिंहासन या रथ पर बिठा कर उत्साह और हर्षोउल्लास पूर्वक जुलूस निकालते हैं, जिसमें बड़ी संख्यां में जैन धर्मावलम्बी शामिल होते हैं। इस सुअवसर पर जैन श्रद्धालु भगवान को फल, चावल, जल, सुगन्धित द्रव्य आदि वस्तुएं अर्पित करते हैं।
चौबीस ‍तीर्थंकरों के अंतिम तीर्थंकर महावीर के जन्मदिवस प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्मावलंबी प्रात: काल प्रभातफेरी निकालते हैं तथा भव्य जुलूस के साथ पालकी यात्रा का आयोजन किया जाता है। इसके पश्चात महावीर स्वामी का अभिषेक किया जाता है तथा शिखरों पर ध्वजा चढ़ाई जाती है। जैन समाज द्वारा दिन भर अनेक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। महावीर का जन्मोत्सव संपूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है।
वर्धमान महावीर जी को 42 वर्ष की अवस्था में जूभिका नामक गांव में ऋजूकूला नदी के किनारे घोर त्पस्या करते हुए जब बहुत समय व्यतीत हुआ। तब उन्हें मनोहर वन में साल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल दशमी की पावन तिथि के दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई जिसके पश्चात वह महावीर स्वामी बने।
महावीर जी के समय समाज व धर्म की स्थिति में अनेक विषमताएं मौजूद थी, धर्म अनेक आडंबरों से घिरा हुआ था और समाज में अत्याचारों का बोलबाल था। अत: ऐसी स्थिति में भगवान महावीर जी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने देश भर में भर्मण करके लोगों के मध्य व्याप्त कुरूतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयास किया उन्होंने धर्म की वास्तविकता को स्थापित किया सत्य एवं अहिंसा पर बल दिया।
महावीर जी के उपदेश:
महावीर जी ने अपने उपदेशों द्वारा समाज का कल्याण किया उनकी शिक्षाओं में मुख्य बाते थी कि सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जिओ और जीने दो. इसके अतिरिक्त उन्होंने  पांच महाव्रत, पांच अणुव्रत, पांच समिति, तथा छ: आवश्यक नियमों का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया। जो जैन धर्म के प्रमुख आधार हुए और पावापुर में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को महावीर जी ने देह त्याग करके निर्वाण प्राप्त किया।

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