डॉक्टरी हैं या हैवानियत

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गीतांजलि पोस्ट …… (रेणु शर्मा, जयपुर) समाचारों का संपादन करते समय कुुछ ऐसे समाचार आये जिसने मेरी अंतर्रात्मा को झंझोड़ दिया साथ ही चिकित्सा के व्यवसाय पर भी सवाल खडा कर दिया कि अपने स्वार्थ के लिये इंसान कितना गिर सकता हैं।

पहला मामला राजस्थान के सबसे बड़े अस्पताल एसएमएस का हैं, जहां मात्र पैसा कमाने के लिये डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती एक मरीज को ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल भेज दिया गया, निजी अस्पताल में मरीज की तबीयत बिगडऩे पर उसे फिर एसएमएस भेज दिया, किन्तु यहां भी मरीज की जान नहीं बच सकी और रविवार को उसकी मौत हो गई। दूसरा मामला श्रीगंगानगर के टांटिया जनरल अस्पताल का हैं जहां ईलाज करवाने के लिये गांव से आई हुई युवती को बेहोशी का इंजेक्शन देकर बलात्कार किया गया। ये दोनों ही मामले चिकित्सा व्यवसाय के लिये शर्मनाक हैं।

अपनी सफाई देते हुए मरीज का ऑपरेशन करने वाले एसएमएस अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विनोद शर्मा कहते हैं कि मरीज खुद ही दूसरे अस्पताल गया था, मेंने मै उसे नहीं भेजा। समझ में नहीं आता कि डॉक्टर के ईलाज के दौरान कोई मरीज खुद ही दूसरे अस्पताल कैसे जा सकता हैं और दूसरे अस्पताल वाला भी डॉक्टर के डिसचार्ज लेटर को देखे बिना कैसे अपने अस्पताल में मरिज को भर्ती कर सकता हैं। दुसरी बात शर्मा ने बतायी कि निजी अस्पताल से फोन आया था तो ऑपरेशन किया गौर करने वाली बात हैं कि निजी अस्पताल वाले भी उसी डॉक्टर को बुलाते हैं जो पहले उस मरिज का ईलाज कर रहा था।

मुझे तो इस सारे घटनाक्रम में पैसों का खेल ही दिखई दे रहा हैं, कि एक सरकारी अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर ने ब्रेन हेम्बरेज के लिये सरकारी अस्पताल में भर्ती मरिज को ईलाज करवाने के लिये उस निजी हॉस्पिटल में जाने को कहा होगा, जहा से डॉक्टर को मोटा कमीशन मिलता होंगा, और निजी हस्पताल वाले ईलाज के नाम पर मरीज को लूटते रहे क्योकि सरकारी अस्पताल में तो डॉक्टर आपरेशन करे या नहीं करे उसे उसकी तनख्वाह तो मिलती रहेगी। गौर करने वाली बात हैं कि निजी अस्पताल में ईलाज का पैसा डॉक्टर नकद लेते हैं जिसकी मरिज के परिजनों कोई रसीद भी नहीं देते।

सोचने वाली बात हैं कि एक सरकारी अस्पताल में मरिजों की कतार लगी रहती हैं, वहां के डॉक्टर के पास इतना समय हैं कि वो निजी अस्पताल में जाकर किसी का ऑपरेशन करे और सरकारी अस्पताल में मरिजों को ऑपरेशन केे लिसे अनावश्यक तारिखे देते रहे।

जब से निजी अस्पतालों में मरिजों की जांच पर डॉक्टर्स को दिये जाने वाले कमिशन को कम किया हैं उसके बाद तो डॉक्टर मरिजों का चेकअप ही कम करवाने लग गये। साफ हैं सारा तमाशा पैसों का हैं जब जॉच का कमिशन ही नहीं मिलगा तो जॉच करवाने से क्या फयादा।
देखा जाये तो चिकित्सा का व्यवसाय बहुत ही सम्मानित और गरिमामय का पैशा हैं, यहां तक की मरिज तो ड़ॉक्टर को अपना भगवान ही मानते हैं और आमजन भी डॉक्टर्स को बहुत मान-सम्मान दिया जाता हैं। अधिकाश चिकित्सकों ने इस पैशे को अपनी सेवा और निष्ठा से इसकी गरिमा को बनाये रखा है लेकिन कुछ स्वार्थी डॉक्टर्स ने पैसों के लालच में इसकी गरिमा खो दी हैं इसके लिये उन्होने बहुत ही घृणित हथकण्ड़े अपनाये हैं, जैसे- कमिशन के लिये मरिज को अनावश्यक दवाईया देना और अनावयश्क जंाच करवाना और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर तो उन्ही मरीजों पर विशेष ध्यान देते हैं एंव उन्हे ही सरकारी सुविधाएं दिलवाते हैं जो डॉक्टर के घर पर जाकर मिलकर उन्हे मोटी फिस हैं। कई बार प्राईवेट अस्पतालों में तो मरणासन्न मरिज को वेटिलेटर पर रख का कर कृत्रिम आक्सीजन देकर रखा जाता हैं, मरिज के मरने के बाद भी जब तक उक्त बिलों की मोटी राशि नहीं मिल जाती तब तक उनके परिजनों को शव भी उठाने नहीं देते। भू्रण परिक्षण जो कानूनन अपराध हैं, फिर भी पैसों के लिये डाक्टर भू्रण परिक्षण करके भ्रूण हत्या जैसे जघ्नय काम करते हैं। इतना ही नहीं कुछ डॉक्टर्स तो पैसों के लिये मरिजों के अंग तक निकाल कर बेच देते हैं। ये कृत्य भगवान के नहीं बल्कि राक्षको के हैं अब तक जिस चिकित्सक को भगवान माना जा रहा था वो अपने ही कामों के कारण राक्षस हो गया। इसी कारण डॉक्टर की छवि एक डाकू जेसी बन गयी और चिकित्सा का व्यवसाय बदनाम हो गया। हांॅलाकी सभी डॉक्टर ऐसे नहीं होते लेकिन कुछ डॉक्टर ऐसे होते है जिनके कारण पूरा चिकित्सा का व्यवसाय ही बदनाम हो रहा हैं और लेकिन ईमानदारी से अपना काम करने वाले डॉक्टर्स भी इसका शिकार हो रहे हैं।