चिराना की प्राकृतिक वनस्पती विलुप्त, जंगली बबूल ने किया कब्जा…

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चिराना की प्राकृतिक वनस्पती पर प्रकाश डालती सौरभ पारीक की रिपोर्ट…

एक जमाना ऐसा था जब हम बचपन मे सुबह सुबह किरोडी नहाने जाते थे और आते समय भैरूजी की बणी से बैर व डासर की जेब भरकर लाते थे.. आपने भी शायद बहुत बार ऐसा किया होगा…! परन्तु आज जब उधर जाते है तो जंगली बबूल के कांटो के अलावा कुछ नजर नही आता ना ही नजर आती है वो प्राकृतिक विरासत जो ना जाने कितने ही वर्षो से पिढ़ी दर पिढ़ी वहा स्थापित थी परन्तु आगे आने वाली पिढ़ी के लिये सिवाय पहाडी पत्थरों व जंगली बबूली कांटो के अलावा अब वहां कुछ भी नही बचा है।

एक नजर प्राकृतिक वनस्पती पर :- लगभग एक दशक पुर्व किरोडी जाने वाले रास्ते पर खडी चढ़ाई की घाटी भैरूजी की बणी व चारभुजा बणी में ना जाने कीतनी ही झाडीयां थी, हरे भरे धौ के पैड थे जो की पुनः लगना नामुमकिन है सालर के पैड, डासर के पेड आदी पुरी तरह विलुप्त हो गये है। अब इस जगह इन प्राचीन वनस्पतियो का नामो निशान तक नही है। बरखण्डी जाने वाले रास्ते पर चिकनाडा, बारह-तिबारा आदी मे ना जाने कितने ही सालर, डासर और धौ के पेड थे परन्तु आज वहा पर भी इनकी संख्या दिनो दिन तेजी से घट रही है और मानव रूपी दीमक अरावली की इस वानस्पतिक विरासत को दिन-दुनी रात – चौगुनी गती से खाये जा रही है।

जहरीली जंगली बबूल ने की हरियाली:-इन दिनो जितनी तेजी से पुरानी वनस्पती विलुप्त हुई है उतनी ही तेज गती से जहरीली जंगली बबूल अरावली क्षेत्र मे तेजी से बढ़ रही है। एक तरफ माना जाता है की जलस्तर के निचे जाने, अन्य पेडो के ना पनप पाने मे इसी जंगली बबूल का आधार है। इस बबूल के कांटों के जहरीले होने के साथ इसकी लकडी व पेड से निकलने वाली गेस सभी जहरीली है जो की पर्यावरण को काफी हद तक नुकसान पहुंचाती है। इस बबूल की जडे इतनी अटल है की एक बार काटने के बाद भी चार और नये तने के साथ यह स्फुटित होती है।
कोन जाने की इस पर्यावरण की धरोहर को खुद पहाडों ने निगला या हमारी मानव जाती इसकी दुश्मन बन गई। इस पुरी विलुप्ती मे वन विभाग की भुमिका भी संदिग्ध नजर आती है।

कुछ गहरे सवाल:-
ये प्राकृतिक विरासत कहां और कैसे गुम हुई..? इनमे सबसे ज्यादा कोन जिम्मेदार है..? आने वाले समय मे क्या हम इस अरावली क्षेत्र व पहाडी के अन्दर से गुजरने वाले 24 कोसीय परिक्रमा के रास्ते को संरक्षित रख पायेंगे..?
सवाल गहरे है परन्तु जवाब हमे पता है और हमारे अन्दर ही है जरूरत है तो बस मंथन और विचार करने की और हमारे चिराना की इस प्राचीन वानस्पतिक विरासत को संरक्षित करने की…. ।