क्या वास्तव में प्रेस को स्वतंत्रता मिली हुई हैं…

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गीतांजलि पोस्ट………… 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्र व जोशपूर्ण प्रेस की वकालत करते हुए पत्रकारिता को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए ट्वीटर पर कहा कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस प्रेस के प्रति अपने अटल विश्वास को दोहराने का दिन है। आज के समय में सोशल मीडिया संपर्क के एक सक्रिय माध्यम के रूप में उभरा है और इससे हमारी प्रेस की स्वतंत्रता को और मजबूती मिली है। हो सकता हैं कि हमारे प्रधानमंत्रीजी के अनुसार प्रेस को स्वतंत्रता को और मजबूती मिली हो लेकिन मेरे अनुसार आज भी प्रेस को स्वतन्त्रता नहीं मिली हैं, मीडिया की आज़ादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को सामाजिक और संवैधानिक मर्यादा में रहते हुए अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार। लेकिन हमारे यहां कितने समाचार-पत्र और पत्रिकायें हैं जिन्हे वास्तव में प्रेस की स्वतंत्रता मिली हुई हैं? क्योकि अधिकतर समाचार-पत्र और पत्रिकाओं का व्यवसायिकरण हो चुका हैं तो कुछ सरकार के दबाव या लालच में सच को उजागर करने से डरती हैं। उस पत्रकार पर दया आती हैं जो मेहनत करके, जासूसी करके , खोज-बीन करके समाचार बनाकर समाचार-कक्ष मे भेजता हैं, जब उसकी बनायी गयी खबर को विज्ञापन के लालच में या बंदूक की ताकत या लालफीताशाही के कारण रोक दिया जाता हैं उसे प्रकाशित नहीं किया जाता तो ऐसा लगता है कलम की ताकत बंदूक और लालफीताशाही के उत्पीडऩात्मक रवैये से कहीं ज्यादा हो गयी है। ऐसे बिना स्वतंत्र मीडिया के स्वस्थ लोकतंत्र को सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं है।

यह सही है कि किसी की अभिव्यक्ति पर आपकी असहमति हो सकती है परन्तु आप उसे मानने या न मानने के लिए भी तो स्वतंत्र है, लेकिन विरोधी स्वर को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश कर देने या दूसरों पर अपनी सोच जबरन थोपने की इजाजत किसी भी धर्म में नहीं है, परंतु सब हो रहा हैं कुछ दलाल, ब्रोकर व लाइजनिंग में जुटे पत्रकारों को छोड़ दे तों ऐसे पत्रकारों की संख्या एक-दो नहीं बल्कि हजारों में है, जो हर तरह के असामाजिक तत्वों की पोल अपनी कलम के जरिए उजागर करते है और हर वक्त लालफीताशाही से लेकर नेता, माफिया व पुलिस के निशाने पर रहते है।

हॉल ही में भारत सरकार के राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नोयडा में मीडिया पत्रकारों में लीडरशिप क्षमता के विकास आयोजित कार्यशाला में, लेखिका ने भी कार्यशाला में भाग लिया जिसमें बताया कि विश्व के दस खतरनाक पैशे मे से एक हैं पत्रकारिता, फिर भी पत्रकारों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हैं यदी कार्य करते हुए कोई पत्रकार अपाहिज हो जाता हैं या वो किसी बिमारी से पीडित हो जाता हैं तो कौन आता है उसकी सहायता करने ? बात आंकड़ों की किया जाएं तो पत्रकारों की हत्या करवाने के मामले में सीरिया और लीबिया के बाद तीसरे नम्बर पर भारत का नम्बर आता हैं। जनता के अधिकारों का प्रहरी , जनता को अधिकार दिलवाने वाले मीडियाकर्मी को ही मौलिक अधिकारों के लिये तरसना पडता हो, ये बात अजीब सी लगती होगी की जो इंसान दूसरों को उनके अधिकारें के प्रति सजग करता हैं, लोगों को जागरूक करता हैं, उसी को ही जब उसके मौलिक अधिकार नही मिले ये एक गंभीर मामला हैं। मातृत्व एक महिला का संवैधानिक अधिकार हैं और सरकार द्वारा भी महिलाकर्मी के लिये 6 माह का मातृत्व अवकाश का प्रावधान हैं। यदी महिला प्राईवेट कंपनी या प्राईवेट कार्यालय में नौकरी करती हैं उस परिस्थिति में उस कंपनी या कार्यालय द्वारा महिला को 6 माह का मातृत्व अवकाश दिया जाता हैं लेकिन हमारे कुछ मीडिया हाऊस में ही मातृत्व अवकाश दिया जाता हैं अधिकतर मीडिया हाऊस में मातृत्व अवकाश नही दिया जाता।

वर्तमान समय में पत्रकार की खबर ही उसकी जान की दुश्मन बन चुकी हैं, अपनी जान की परवाह ना करते हुए, घपले-घोटाले, अवैध-खनन, बलात्कार, हत्या, असंवैधानिक गतिविधियों को उजागर कर, आरोपियों को जनता के सामने लाकर बेनकाब करना हैं, तो उस पत्रकार को अकसर पैसा देकर खरीदने की कोशिश की जाती हैं, जब पत्रकार नही बिकता तो उसे यातनाये दी जाती हैं कि मजबूर होकर पत्रकार उनकी बात मान लेगा। लेकिन कुछ ईमानदार और साहसी पत्रकार उनकी बातों को नहीं मानते तो उनको मरवा दिया जाता हैं, क्योकि असंवैधानिक गतिविधियां, हत्या, बलात्कार, घपले-घोटाले, अवैध खनन जैसे मामले में पुलिस अधिकारियों से लेकर राजनेताओं की मिली भगत होती हैं और ये अपनी पहुंच एंव पॉवर के चलते ऐसे घपलों को उजागर कर उनके काम में व्यवधान करने वालो पत्रकारों को पैसा देकर खरीदने की कोशिश करते हैं, जब पत्रकार नही बिकता तो उसे यातनाये देने लगतें हैं कि मजबूर होकर वो उनकी बात मान लेगा कुछ ईमानदार और साहसी पत्रकार उनकी बातों को नहीं मानते तो उनको मरवा दिया जाता हैं या परेशानियों से दुखी होकर उन्हे खुद अपनी मौत को गले लगाना पड़ता हैं। इसी कारण पत्रकारों की सिलसिलेवार हत्याएं तथा मारपीट जैसी घटनाएँ घट रही हैं, आखिर इन घटनाओं की छानबीन क्यों नहीं होती ? आखिर क्यों इन घटनाओं में संलिप्त अरोपियों के आरोपों की जांच में लगे आफिसरों की ही रिपोर्ट को सही मान लिया जाता है ? जिसके बारे में जगजाहिर है कि वह अपने दोषी अधिकारियों तथा सत्ता पक्ष के नेताओं के खिलाफ रिपोर्ट देना तो दूर अपना मुंह तक नहीं खोलतेे, फिर इन्हीं अधिकारियों से क्यों दोषियों की जांच कराई जाती हैं ? अब तक हर साल कितने पत्रकारों की हत्या कि गयी या उन्होने आत्महत्या कर ली उन्में से कितने मामलों की जांच की गयी हैं ? जांच के उपरान्त कितने दोषी व्यक्यिों को दण्डित किया गया ? ये ऑकडा क्या सरकार के पास उपलब्ध हैं ?

पत्रकारिता के लिहाज से देखा जाये तो पत्रकारिता एक जोखिम भरा काम है खबर बनाने वाला पत्रकार खुद सबसे बड़ी खबर है, लेकिन उसकी अपनी खबर, किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनती, वो दूसरों को सुखिऱ्यों में लाता हैं खबर के चक्कर में खुद भूखा रहता है लेकिन खबर लिखता हैं। चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिये हर घटना पर सबसे पहले जाता हैं । घपलों-घोटालों, बलात्कार के आरोपियों, खनन आदि में संलिप्त बाहुबलियों व सरकारी खजानों को लूटने वाले सफेदपोशों के काले कारनामों को जनता के सामने रखने वाले पत्रकारों को अकसर खरीदने की कोशिश की जाती हैं, उन्हे लालच दिया जाता हैं फिर भी यदी पत्रकार नही बिकता तो उसे लूट, हत्या, मारपीट, फर्जी मुकदमों में फंसा दिया जाता हैं। वास्तविकता यह हैं कि पत्रकार से समाज को बहुत अपेक्षाए हैं वह किसी मजहब-जाति का नहीं बल्कि वह समाज में व्याप्त कुरीतियों, बुराईयों का दुश्मन है, लेकिन अफसोस हैं कि इन कुरीतियों व काले कारनामों के ठेकेदार बोली का जवाब बोली से देने के बजाएं बुलेट या अपनी ओछी हरकतों से देते है। लालफीताशाही आफिसर अपने पद का दुरुपयोग कर पत्रकारों का उत्पीडऩ करते है।

कुछ लोग खुद को स्थापित करने लिए, तो कुछ व्यापारिक घराने अपने काले-कारनामों को छिपाने के लिये मीडिया का रास्ता चुनते हैं। जिन्हे पत्रकारिता की परिभाषा तक नहीं आती वो पैसों के बल पर अपना चैनल तक आरम्भ कर देते हैं लेकिन पैसों के दम पर पत्रकारिता नही कि जा सकती ऐसे चैनल कुछ समय पश्चात बन्द हो जाते हैं वहीं कुछ लोग सोशल मीडिय़ा जैसे वेबपोर्टल या वेब चैनल बनाकर भी मीडिया में आने लगे है जिससे पत्रकारिता का स्तर गिरने लगा हैं क्योकि उनका उद्देश्य पैसा कमाना होता हैं सभी जानते हैं कि ईमानदारी से दाल रोटी का जुगाड़ हो सकता हैं, फाईव स्टॉर होटलों में खाने का नहीं। हमारे यहां बहुत सारे पत्रकार पद्धकारिता के नाम पर ब्लेकमेलिंग करते हैं , कुछ पत्रकार अपने स्वार्थ खबरों को छिपाते हैं या तोड-मरोड कर पेश करते हैं , इसमें छोटे पत्रकारों से लेकर बडे-बडे मीडिया घराने भी करने हैं जो पत्रकारिता के नाम पर कंलक हैं ऐसे कृत्यों पर भी प्रतिबंधन लगाया जाना आवश्यक हैं इस मामले में पत्रकार संगठन महत्ती भूमिका निभा सकते हैं।

सत्य को स्वीकारना इतना आसान नहीं होता है और इसीलिए कुछ लोग सत्य उजागर करने वाले से बैर रखते हैं। लेकिन फिर भी कुछ लोग मीडिया में अपना सब कुछ दाव पर लगाकर भी इस रास्ते को ही चुनते हैं,  कलम के धनी कुछ लोग चंद पत्र-पत्रिकाओं में लिखकर समाज के प्रति अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। अफ़सोस की फिर भी उनकी वह पूछ नहीं होती, जिसके की वे हक़दार होते हैं। मीडिया की आज़ादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को सामाजिक और संवैधानिक मर्यादा में रहते हुए अपने विचारों , अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। इस आज़ादी में बिना किसी दख़लंदाजी के अपनी राय कायम करने तथा किसी भी मीडिया के जरिए, चाहे वह देश की सीमाओं से बाहर का मीडिया हो, सूचना और विचार हासिल करने और सूचना देने की आज़ादी शामिल है। इसका उल्लेख मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुछेद 19 में किया गया है।

एक तरफ़ प्रेस जहाँ जनता का आइना होता है, वहीं दूसरी ओर प्रेस जनता को गुमराह करने में भी सक्षम होता है इसीलिए प्रेस पर नियंत्रण रखने के लिए हर देश में अपने कुछ नियम और संगठन होते हैं, जो प्रेस को एक दायरे में रहकर काम करते रहने की याद दिलाते हैं, पत्रकारों को भी अपनी स्वनिर्मित मर्यादा में रहकर पत्रकारिता करनी चाहिये प्रेस की आज़ादी को छीनना भी देश की आज़ादी को छीनने की तरह ही होता है। चीन, जापान, जर्मनी, पाकिस्तान जैसे देशों में प्रेस को पूर्णत: आज़ादी नहीं हैं इस लिहाज से हमारे यहंा हालत ठीक है। आज मीडिया के किसी भी अंग की बात कर लीजिये, हर जगह दाव-पेंच का असर है। खबर से ज्यादा आज खबर देने वाले का महत्त्व हो चला है। लेख से ज्यादा लेख लिखने वाले का महत्तव हो गया है।

पत्रकारिता एक सम्मानीय और गरिमामय पैशा हैं समाज को इससे बहुत सारी अपेक्षायें हैं एंव समाज इस पैशे से जुडे व्यक्तियों को सम्मान की दृष्टि से देखता हैं इसलिये पत्रकारों से अपेक्षा की जाती हैं कि वे अपनी स्वनिर्मित मर्यादाओं में रहते ऐसे काम करे जिससे सामाजिक और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लघन ना हों जिससे मीडिया की साख बनी रहे। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम मांग करते हैं कि जब लोकतन्त्र के तीन स्तम्भ कार्यपालिका, न्यायपालिका एंव विद्यायिका को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं तो फिर लोकतन्त्र का चोथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता को भी सरकार की तरफ से सुरक्षा दी जानी चाहिये। यदी कोई मीडिय़ाकर्मी आत्महत्या करता हैं या उसकी हत्या करवा दी जाती हैं तो उसकी जॅाच विशेष जॉच ऐजेन्सी से करवायी जानी चाहिये ऐसा करने से पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता कर पायेगा।

रेणु शर्मा,जयपुर संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र
रेणु शर्मा,जयपुर
संपादक -गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र