जल है जीवन का इन्द्रधनुष

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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार, कोटा
गीतांजलि पोस्ट …………. बरसात की फुवांरों को देखकर बच्चों का ही नहीं बड़ों का भी मन नहाने के लिए मचल उठता हैं। बादल गहराने और आसमान में बिजली के कडकने से बरसात आने के संकेत मिलते ही उपवनों एवं जंगलों में मयूर नृत्य करने लगते हैं और पक्षियों का कलरव गुंजायमान हो उठता है। जहंा भी कलछल करता नदी का जल एवं हिलोरे मारता समुद्र नजर आता है हम घण्टों पानी में पैर रखकर आनंद लेते हैं। सुन्दर झीलों को अपलक निहारते हैं और पहाडियों के बीच ऊंचाई से गिरते झरने के आनंद का तो कहना ही क्या। खेतों में लहलाती फसलें किसी का भी मन मोह लेती हैं। जब भी हम प्राचीन पानी की बावड़ी के स्थापत्य को देखते हैं तो इसे बनाने वाले अनाम शिल्पियों की सराहना किये बिना नहीं रहते और आश्चर्य करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने किस प्रकार हजारों साल पहले जल को बचाने की इतनी सुन्दर जुगत की थी। गर्मी से व्याकुल जीव की जब प्यास बुझती है तो मानों संजीवनी मिल गयी हो। पानी से ही हम हरियाली, हरितमा, आर्कषक उद्यानों को देखकर आनंदित होते हैं। जल जो हमें इतनी खुशियां प्रदान करता है तो क्या वह हमारे लिए प्रकृति प्रदत्त अनमोल निधी नहीं है।
हमारे पूरे जीवन में जल के व्याप्त इन्द्रधनुषी रंग पुराने समय से ही धर्म और संस्कृति के साथ गहराई से जुडे हैं। सूर्य को जल का अर्ध्य देना, शिवलिंग पर जल चढ़ाकर भोलेनाथ को प्रसन्न करना, मानव और पशु-पक्षियों के लिए पीने के पानी का प्रबन्ध कर जलदान करना, मानव के लिए पानी की प्याऊ, पशुओं के लिए खेल तथा पक्षियों के लिए परिण्डों का प्रबन्ध करना जलदान का ही हिस्सा हैं। सदियों की यह परम्परा आधुनिक समय में भी अविरल है।
प्रकृति की अमूल्य धरोहर जल जीवन के हर पहलु को प्रभावित करता है। जल की उपयोगिता और महत्व तो सब मानते हैं परन्तु इस जीवनदायनी निधी के संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। जल के प्रति उदासीनता से आज न केवल अपने प्रदेश में वरन् पूरे देश में अनेक समस्याऐं उत्पन्न हो गयी है। जीवनदायनी नदियां कई तो लुप्त हो गयी हैं और कहीं संकरी हो रही हैं। जल की निरन्तर कमी से विश्व के मरूस्थल दबाव में है। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मरूस्थल बदल रहे है। दूषित जल से जुडी अनेक समस्याएं सामने हैं। प्रकृति के साथ छेडछाड़ और दोहन का परिणाम बरसात का कम होना है। यहीं नहीं अन्धाधुंध जल दोहन से हिमखण्ड पिघल रहे हैं, पृथ्वी गर्म हो रही हैं और धरती में पानी गहरे तक समा रहा है।
देश में जल संकट की स्थिती को देखे तो जल संसाधन मंत्रालय भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबित अभी प्रति व्यक्ति 1700 घन मीटर से कम प्रतिवर्ष जल उपलब्ध है जिसकी मात्रा 2025 तक घटकर 1500 घन मीटर प्रतिव्यक्ति रह जाने का अनुमान किया गया हैै। देश के लगभग 38 प्रतिशत शहरों एवं 80 प्रतिशत से ऊपर गांवों में शुद्ध पीने के पानी की उपलब्धता नहीं है। प्रतिवर्ष दूषित पेयजल के कारण करीब 5 करोड़ बच्चें एवं व्यस्क जल जनित बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। भारत को जल उपलब्धता एवं गुणवत्ता की दृष्टि से विश्व में 120वां स्थान प्राप्त हैं। विश्व में जल का कुल उपयोग संसार की नदियों के जल बहाव का 10वां भाग है और इसमें भी दो-तिहाई हिस्सा कृषि के कार्य में उपयोग होता है। अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक विश्व की कुल आबादी के एक तिहाई हिस्से को जल संकट का सामना करना पडेगा।
जल स्त्रोतों की दृष्टि से राजस्थान उन सौभाग्यशाली राज्यों में है जहां प्राचीन समय के विशाल जल स्त्रोत तालाबों एवं बावड़ियों के रूप मंे उपलब्ध है। हाड़ौती क्षेत्र के बून्दी शहर को तो बावड़ियों की नगरी कहा जाता है। यहां रानी जी की बावड़ी, नागर-सागर कुण्डों का स्थापत्य बेमिशाल है। बून्दी में रियासतों के समय बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के लिए सुन्दर बावड़ियों का निर्माण कराया गया। कोटा शहरी क्षेत्र में रियासत के समय 13 तालाब बनावाये गये, जिनमें से अधिकांश का अस्तित्व ही नहीं रहा। शहर के मध्य स्थित किशोर सागर तालाब का संरक्षण कर इसे आज एक आकर्षक पर्यटक स्थल के रूप में उभारा गया हैं। शेखावाटी क्षेत्रों में भी प्राचीन कलात्मक जल बावड़ियों की भरमार है। राजस्थान के सभी किलों में शासकों ने पेयजल की पुख्ता व्यवस्था की थी, जो आज भी देखने को मिलती हैं।
जल बचाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार अपने स्तर से तेजी से प्रयासोें में जुटे हैं। सरकारी योजनाओं से प्राचीन जल स्त्रोतों को फिर से उभारने के साथ-साथ नये तालाब, टांके, तल्लियां आदि जल सरंचनाएं तेजी से बनायी जा रही हैं। इन जल सरंचनाओं के बनने से स्थानीय क्षेत्र में जल संरक्षण होने के साथ-साथ जमीन में भी जल का स्तर ऊपर आया है। यही नहीं इन जल स्त्रोतों का सिंचाई एवं पशु पेयजल आदि विविध प्रकार से उपयोग भी किया जा रहा हैं। जल स्त्रोतों की निर्मित संरचाओं से कई गांवो में पेयजल संकट का भी निदान हुआ हैं।
आवश्यकता है कि केवल सरकार की तरफ ही टकटकी लगाकर नहीं देखा जाये वरन् प्रत्येक व्यक्ति जल की मोती स्वरूप बून्दों को सहेजने के लिए आगे आये। जल बचत में अपना तन, मन और धन से योगदान करें और देवता की पदवी प्राप्त जल का संरक्षण करें। इस दिशा में कई दानीमानी और भामाशाह आगे आये है और उन्होेंने जल संरक्षण के लिए सरकार को मदद की हैं। जो लोग धन से सहायता नहीं कर सकते उन्हें अपने श्रम का दान कर जल बचत में सहायक बनना होगा। जल बचत की संरचाएं निर्माण में लगकर वे अपनी भागीदारी जोड़ सकते हैं। हर व्यक्ति अपने स्तर से जल का सही सद्उपयोग कर जल संरक्षण में आगे आ सकता हैं। यदि हमने जल संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाली हमारी पीड़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।