राजशाही के विकृत स्वरूप की वापसी……….

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गीतांजलि पोस्ट ……….. (रेणु शर्मा,सीताराम आचार्य-जयपुर)  भारत की स्वतंन्त्रता के पश्चात सरदार पटेल ने देशी रियासतों का विलय भारत संघ में करवाया। उस समय भारत सरकार ने देशी नरेशों को आश्ववासन दिया की देशी रियासतों के नरेश वर्तमान समय में जिन अधिकारों, विशेषाधिकारों का उपभोग कर रहे हैं उन अधिकारों, विशेषाधिकारों की उनके भारत संघ में विलय होने के पश्चात रक्षा की जायेगी इसके अलावा नरेशों को उनके परिवार, व्यक्तिगत स्टाफ, आवास के रख-रखाव, विवाह समारोह इत्यादी के लिये नियत धनराशि देने का वचन भी दिया, जो अलग-अलग राज्यों के लिये अलग-अलग था इसे प्रिवीपर्स कहा गया । इसके साथ ही उनकों कुछ अन्य अधिकार भी दिये गये जैसे महामहिम की उपाधी, सलामी लेना, न्यायालय से उन्मुक्ति, अपना दरबार लगाना इत्यादी।

सितम्बर 1970 में तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमति इंन्दिरा गांधी ने भूतपूर्व देशी रियासतों के नरेशों के प्रिवीपर्सों तथा विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिये संविधान में 24 वां संशोधन किया लेकिन सदन में दो तिहाई से एक मत कम होने के बावजूद राष्ट्रपति ने 6 सितम्बर 1970 को इसे लागू कर दिया, जिसके विरोध में भूतपूर्व देशी रियासतों के नरेशों ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की, उच्चतम न्यायालय ने इसे अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद 1971 के चुनाव में विशाल बहुमत आने से श्रीमति इंन्दिरा गांधी ने कानून बनाकर संविधान में 26 वां संशोंधन किया जिसमें भूतपूर्व देशी रियासतों के नरेशों के प्रिविपर्स तथा विशेषाधिकारोंं को समाप्त कर राजशाही को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया।

जिस इंन्दिरा गांधी ने भूतपूर्व देशी रियासतों के नरेशों के प्रिवीपर्सों तथा विशेषाधिकारों को खत्म करने का कानून बनाया, जिसके द्वारा राजशाही समाप्त हो गयी थी अब उन्ही इंन्दिरा गांधी ने लोकसभा सदस्यों को पेंशन देने का कानून बनाकर नयी राजशाही को जन्म दिया। लोकसभा सदस्यों के बाद विधानसभा सदस्यों को भी पेंशन दी जाने लगी ।

वर्तमान समय में राजस्थान विधानसभा ने राजशाही की पूर्ण वापसी की शुरूआत कर दी हैं और मुख्यमंत्री को दी जाने वाली सुविधा को आजीवन करने का कानून पारित कर दिया जिससे अब मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहने के बाद भी मुख्यमंत्री को दी जाने वाली सुविधा आजीवन मिलेंगी। हालांकि यह सुविधा अभी मुख्यमंत्री तक ही सीमित हैं, हो सकता हैं आने वाले समय में मंत्रियों को भी ये सुविधा दी जाये। मंत्रियों के बाद विधानसभा और लोकसभा सदस्य भी ये मांग करे की उनको दी जाने वाली सुविधाओं को भी आजीवन किया जाये, तो उनके लिये भी कानून बनाना पडेगा क्योकि कानून बनाने वाले ही वही है तो ये कानून भी बन जायेगा। विधायको के बाद जिला प्रमुख, प्रधान , नगरनिगम के मेयर, नगरपरिषद एंव नगरपालिका अध्यक्ष, पार्षद और पंच-सरपंच भी उस पद को दी जाने वाली सुविधाओं को आजीवन करवाने की मांग करेगें, इसके लिये उनका तर्क होगा की मुख्यमंत्री की तरह हमने भी पांच साल जनता की सेवा की है मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी हमसे ज्यादा हैं तो उन्हे ज्यादा सुविधा दी जाती हैं हमारी जिम्मेदारी कम हैं ता हमें भी हमारी जिम्मेदारियों के अनुसार सुविधाये दी जाये।

जरा कल्पना करो जो एक बार पंच-संरपच से लेकर मुख्यमंत्री चुनकर आ गया वो तो सदा के लिये राजाओं की तरह वो सुविधा पाने का अधिकारी हो जायेगा। ऐसे में 20 साल बाद क्या स्थिति होगी ? भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों , भूतपूर्व मंत्रियों ,भूतपूर्व विधायकों के लिये राज्य की राजधानी में आवास सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये अलग-अलग आवासीय कॉलोनी बनानी पडेगी। इनके लिये अंगरक्षक, गार्ड, चौकिदार, माली के साथ-साथ इनके नीजि सचिवों की भी व्यवस्था करनी होगी । इसी प्रकार जिलों में नगरपरिषद और नगरपालिका के भूतपूर्व अध्यक्ष, भूतपूर्व जिला प्रमुख के लिये जिलों में अलग से कालोनियां बनायी जायेगी। यद्यपि जिला पार्षद, पंच- संरपच को कोई रिहायशी सुविधा नहीं दी जाती लेकिन उनके वेतन-भत्तों पर कितना खर्च होगा इसकी कल्पना मुख्यमंत्रीजी ने कानून बनाते समय  भी नहीं की होगीं। इनके बंगले बनाने के लिये मजबूरों एंव ठेकेदारों के साथ-साथ अन्य कर्मियों को भी रोजगार मिलेगा। लेकिन इससे जनता पर जो आर्थिक भार आयेगा उसकी कल्पना करना मुश्किल हैं।

यह तो इसका एक पक्ष ही हुआ अब सामाजिक पहलू पर गौर किजिये इससे समाज में एक विकृत राजशाही विकसित होगी। पहले तो एक जगह एक ही राजा या सांमत होता था लेकिन इससे हर पांच साल में नये राजा-सांमत एंव जागीरदार पनपने लगेगें। जिसकी कल्पना राजस्थान विधानसभा के कुछ सदस्यों को छोडकर, जिन्होने इसके पक्ष में मतदान देकर ये कानून बनाने में सहयोग दिया,उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं होगी। सत्ताधारी पार्टी के ही घनश्यामतिवाडी एंव कुछ सदस्यों के अलावा किसी ने इसका विरोध नही किया। क्या यही हैं हमारे चुने हुए माननीय विधायकों की दूरदर्शिता जो देश में वापस राजशाही ला रहे हैं ?

अब गेंद महामहिम राज्यपालजी के समक्ष हैं देखना हैं कि वे विकृत राजशाही पर क्या निर्णय लेते हैं।

लेखक- रेणु शर्मा (संपादक) एंव सीताराम आचार्य (प्रकाशक) गीतांजलि पोस्ट साप्ताहिक समाचार-पत्र