मनुष्य के प्रारब्ध से बनता हैं आज और पुरूषार्थ से भविष्य

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गीतांजलि पोस्ट…… (सीताराम शर्मा एंव रेणु शर्मा) आखिर पुलिस के आला अधिकारियों की मिटिंग में ADG इन्द्रभूषण ने पुलिस के आला अधिकारियों की ईमानददारी की पोल खोलते हुए कह दिया की IPS जब नोकरी की शुरूआत करता हैं तो वह अपनी सम्पत्ति एक पन्ने की बताता हैं लेकिन सीनियर बनते ही उसकी सम्पत्ति के पन्ने एंव पैसे की सूची बढने लगती हैं। वरिष्ठ IPS इन्द्रभूषण की हिम्मत की दाद देनी पडेगी कि उन्होने अपने समेत अपने साथी अधिकारियों को उनके अधिकारियों के समक्ष उस कृत्य के उस सच को अवगत करा दिया जिसे सभी अधिकारी छुपाते रहे हैं।

यह सच IPS अधिकारियों के लिये ही नहीं बल्कि IAS से लेकर राज्य सेवा के अधिकारियों के साथ-साथ उन तमाम नेताओं पर भी लागू होता हैं जो एक बार के चुनाव जीतने के उपरान्त करोडपति बन जाते हैं। यद्यपी यह सही हैं कि IPS, IAS को जितना वेतन मिलता हैं उसमें बचत करके वे कुछ सम्पत्ति बना सकते हैं लेकिन ये अधिकारी जिस राजसी ठाठ से रहते हैं उसमें तो उनके वेतन से ही पूरा नहीं पड सकता तो बचत का तो सवाल ही नहीं उठता हैं। आज पुलिस प्रशासन, राजस्व विभाग , विकास विभाग, सेल्स टेक्स , परिवहन विभाग के बाबू से लेकर उच्च अधिकारियों की यदी सर्वेकर जांच की जाये तो यह तथ्य सामने आयेगा कि अधिकतर अधिकारियों के खर्चे उनके वेतन से कई गुना अधिक हैं एंव साथ ही उनके पास अथाह सम्पत्ति भी हैं।

जब उनके खर्चे ही अधिक हैं तो बचत कहा से होगी, उनके पास सम्पत्ति कहा से आयी इसकी जांच किसी स्वंयसेवी संस्था द्वारा सवेक्षण किया जाना चाहिये । स्पष्ट हैं अधिकतर कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं इसका प्रत्यक्ष गवाह वह स्वय ही हैं।

जबकी कर्म के सिद्वान्त के अनुसार जो कर्म उन्होने अपने पूर्व जन्म में किये थे उसी के फलस्वरूप उन्हे ये पद मिले हैं जिसे प्रारब्ध कहते हैं। वर्तमान के कर्म के अनुसार उन्हे भविष्य में कोई भी योनी मिलेगी । इसलिये सभी को चाहिये कि मनूष्य योनी कर्म योनी है इसमें शुभ कर्म करे अपको पूर्व जन्म के शुभ कर्मो प्रारब्ध के कारण ही ये सेवा का अवसर मिला है । पुरूषार्थ का अपना महत्तव हैं लेकिन वह प्रारब्ध को बदल नहीं सकता, इस जन्म के कर्म या पुरूषार्थ ही भविष्य के लिये प्रारब्ध हैं अत इसे भेाग की अपेक्षा सेवा में लगाये ताकि इससे अगले जन्म में आपको और अच्छा पद मिले । जैसे की महाभारत के उद्योग पर्व के 46 वां अध्याय के 8 वें श्लोक में सनत्सुजात घृतराष्ट्र से कहते हैं…………..

तदर्धमासं पिबति संचित्य मधु ।
ईशान् सर्वभूतेषु हविर्भूतमकल्पयत्
योगीनस्तं् प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्

जैसे शहद की मक्खी आधे मास तक शहद का संग्रह करके फिर आधे मास तक उसे पीती रहती हैं उसी प्रकार यह भ्रमणशील संसारी जीव इस जन्म में किये हुए संचित कर्म को परलोक में विभिन्न् योनियों में भोगता हैं परमात्मा ने समस्त प्राणियों के लिये उनके कर्मानुसार कर्मफलभोगरूप हवि की अथात् समस्थ भोग पद्वार्थो की व्यवस्था कर रखी हैं । उस सनातन भगवान का योगी लोग साक्षात्कार करते हैं।