पर्यावरण बचाने के लिए जिये, जाते जाते भी दे गये पेड़ बचाने का संदेश

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स्मृति शेष ……………….
पर्यावरणविद दाधीच का निधन

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार

डॉ. लक्ष्मी कांत दाधीच
डॉ. लक्ष्मी कांत दाधीच

गीतांजलि पोस्ट……दुनिया में पेड़ बचाने, पौधे लगाने (विशेष रूप से नीम का पौधा), जल बचाने, वायु प्रदूषण रोकने, ओजोन पर्त के प्रति चिंतित, औषधीय पौधों की वाटिका लगाने के प्रति जन चेतना जाग्रत करने के लिए छोटे-बड़े हर कार्यक्रम से जुड़ाव रखने वाले कोटा शहर के जाने-माने पर्यावरणविद डॉ. लक्ष्मी कांत दाधीच आज हमारे बीच नहीं रहे। जीवन भर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने और स्वयं भी पर्यावरणीय विधियों को अंगीकार करने वाले दाधीच का 23 जून 2017 को लम्बी बीमारी के चलते कोटा में निधन हो गया। पेड़ों को कटने से रोकने का संदेश भी वे जाते-जाते दे गये जब उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुरूप इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह में किया गया। वे पर्यावरण के लिए ही जिये और पर्यावरण के लिए ही मर गये।
पेड़ हमारे लिए ऑक्सीजन की फैक्ट्री जैसे है। वे हमें न केवल जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं वरन पेड़ का तना, पत्ती, फूल एवं फल सभी कुछ मानव जाति के उपयोग के लिए हैं। पेड़ जब तक रहता है मनुष्यों को देता ही देता है और बदले कुछ नहीं लेता है। जब पेड़ नहीं और कारखानों व वाहनों से वायु प्रदूषण बढ़ता रहेगा तो एक समय आयेगा कि जब चौराहे पर खड़े होने वाले यातायात नियंत्रण पुलिसकर्मी को ही नहीं हमें भी ऑक्सीजन का मास्क लगाकार चलना होगा। आज हमारी नदियां और तालाब प्रदूषण के घेरे में हैं। यद्यपि बड़ी नदियांे को प्रदूषण से मुक्त करने के प्रयास समय-समय पर होते रहते है परन्तु ये प्रयास युद्ध स्तर पर करने की जरूरत है। अपने इन्हीं विचारों को लेकर वे प्रदूषण नियंत्रण की मुहिम चलाते रहे। जागरूकता के लिए जन सहयोग से कभी रैलियां निकाली, संगोष्ठियां और सेमिनार आयोजन किये तथा देश ही नहीं दुनिया के अनेक राष्ट्रों में विविध कार्यक्रमों में भाग लेकर पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता और विचार जाहिर किये।
पर्यावरण मित्र दाधीच को अनेक अन्तर्राष्ट्रीय, देश एवं राज्य मंचों पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किये गये उल्लेखनीय कार्यों के लिए सम्मानित किया गया। इनके कई कार्यों की पहचान लिमका बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के कारण दुनिया में हुई। वे पर्यावरणविद के साथ-साथ उच्च कोटि के शिक्षाविद, एवं प्रशासनिक दक्षता के धनी थे।
राजकीय महाविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के लेक्चरार के रूप में अपनी सेवाऐं प्रारंभ की और जानकी देवी बजाज कन्या महाविद्यालय में प्रार्चाय पद से सेवा निवृत हुए। सेवानिवृति के बाद उनकी पत्नी गीता दाधीच को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। भगवान वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा में जब 1988 में बी.जे.एम.सी. का कॉर्स प्रारंभ किया गया तब दाधीच को पाठ्यक्रम का कॉर्डिनेटर बनाया गया। उनके निर्देशन में विभिन्न विषयों पर 21 छात्रों ने शोध कर पीएच.डी. की उपाधी प्राप्त की। उन्होंने पर्यावरण परिषद की स्थापना की, जल बिरादरी कोटा ईकाई के अध्यक्ष रहे, जिला परिषद में लोकपाल के पद पर कार्यरत रहे तथा कई अनेक संस्थाओं में पदाधिकारी एवं सदस्य रहे। उन्होंने सीमाक्षेत्र में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंगों के विरूद्ध तथा छत्रविलास उद्यान में टॉय टेªन चलाने के लिए पेड़ों को काटने से रोकने का अभियान चलाया। सरकार में रहकर भी पर्यावरण की हानी पर विरोध करने से नहीं चूकते थे। उनका जन्म 5 जूलाई 1949 को बूून्दी में डॉ. रमाकान्त शर्मा के घर पर हुआ। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में डॉ. दाधीच के कार्य हमेशा याद किये जायेंगें।
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