पाण्डुपोल जहां भीम भी नहीं हिला सके हनुमान जी की पूंछ

545
172

गीतांजलि पोस्ट…… (डॉ.प्रभात कुमार सिंघल – लेखक एवं पत्रकार) राजस्थान के अनेक हनुमान मंदिरों में अलवर जिलें मे 55 किलोमीटर दूर सरिस्का अभ्यारण के मध्य स्थित पाण्डूपोल हनुमान धाम एक ऐसा स्थल है जहां पाण्डव भीम हनुमान जी की पूंछ भी नहीं हिला सके। यहां शयन मुद्रा में हनुमान जी मोहक एवं निराले रूप में दर्शन देते हैं। मंदिर के सामने लगे एक बोर्ड के पास पांच पाण्डवों के प्रतीक के रूप पांच पत्थर रखे गये है। मंदिर एक ऊंची जगती पर बना है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 18 सीढ़ियां चढ़नी होती है।
पाण्डुपोल नामक स्थान घने वनों, झरने, हरी भरी पहाड़ियों, लम्बे-लम्बे खजूर एवं वन्य जीवों की अठखेलियों के मध्य धर्म एवं प्रकृति का अद्भुद संगम स्थल है। यहां की प्राकृतिक सुशमा नयाभिराम है, जो यहां आने वालों को अपने सम्मोहन में बांध लेती है।
हनुमान मंदिर पाण्डुपोल का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। बताया जाता है कि जब पाण्डव पुत्र अपना बारह वर्ष का वनवास पूर्ण कर चुके थे तो अज्ञातवास का एक वर्ष पूर्ण करने यहां आये थे। उस समय दो पहाडियां आपस में इस स्थान पर जुडी हुई नजर आई, जिससे आगे बढ़ने का मार्ग अवरूद्ध हो गया। तब माता कंुति ने अपने पुत्रों से पहाडी को तोडकर मार्ग बनाने को कहा। माता का आदेश सुनते ही महाबली भीम ने गदा के एक ही वार से पहाडियों को चकनाचूर कर दिया। भीम के इस बलशाली कार्य को देखकर माता व भाई उसकी प्रशंसा करने लगे जिससे भीम के मन में अहंकार उत्पन हो गया।
कहते है भीम का यह अहंकार दूर करने के लिए हनुमान जी ने योजना बनाई और बूढ़े वानर का रूप धारण कर मार्ग में लेट गये। जब पाण्डुओं ने बूढ़े वानर को लेटे हुए देखा तो उन्होंने उससे रास्ता छोडने का आग्रह करते हुए कहा कि वह अन्य कहीं जाकर विश्राम करें। पाण्डुओं के आग्रह सुन बूढ़े वानर बने हनुमान जी ने कहा कि वे बूढ़े होने के कारण हिलडुल नहीं सकते है अतः पाण्डव किसी और रास्ते से चले जाये। पाण्डव जब नहीं माने तो भीम की ललकार सुनकर नम्र भाव से कहा कि वे उनकी पूंछ हटाकर निकल जाये। जब भीम उनकी पूंछ को हटाने लगा तो यह देखकर हैरान रह गया कि पूंछ हिली भी नहीं। तब हनुमानजी अपने वास्तविक स्वरूप में आये और बोले तुम वीर नहीं महाबली हो परन्तु तुम्हें अहंकार शोभा नहीं देता है। इसके बाद हनुमानजी भीम को महाबली होने का वरदान देकर वहां से चले गये और जिस जगह वे लेटे थे वहां मंदिर बनकर उनकी पूजा की जाने लगी है। इस पहाडी को भीम पहाड़ी के नाम से जाना जाता है तथा वहां एक लुभावना झरना भी बहता है। आज स्थल पवनपुत्र हनुमान जी का एक महत्वपूर्ण स्थल हो गया है जहां वर्ष भर श्रृद्धालु ही नहीं वरण सैलानी भी इस स्थल को देखने के लिए आते हैं। यह मंदिर हनुमानजी के दर्शनों के लिए प्रातः 5 बजे से रात्री 10 बजे तक खुला रहता है। हर मंगलवार एवं शनिवार को भक्त बड़ी संख्या यहां दर्शनार्थ आते हैं।